“पापा, कितनी बार कहा है आपसे कि जब मेरे घर में पार्टी चल रही हो, तो अपने इस गमछे और खादी के कुर्ते में बाहर मत आया कीजिए! मेरे क्लाइंट्स बैठे थे वहाँ। मिस्टर खुराना, जो खुद लंदन रिटर्न हैं, उनके सामने आप हाथ में वो स्टील का टिफिन लेकर आ गए? ‘बेटा लड्डू खा ले’… यह गाँव नहीं है पापा, यह कॉर्पोरेट वर्ल्ड है। यहाँ इमेज ही सब कुछ है। मेरी सालों की मेहनत पर आपने आज पानी फेर दिया!”
समीर का चेहरा गुस्से से लाल था। उसकी आवाज़, जो आमतौर पर बोर्ड रूम में नपी-तुली होती थी, आज अपने ही पिता पर बज्र बनकर गिर रही थी।
सामने खड़े रामेश्वर जी, जिनके चेहरे पर झुर्रियों का जाल और आँखों में एक अनकहा डर था, ने अपनी पकड़ में उस स्टील के टिफिन को थोड़ा और कस लिया। उन्होंने धीरे से कहा, “बेटा, वो… मुझे लगा तू दिन भर से काम में लगा है, भूखा होगा। और फिर ये गोंद के लड्डू तेरी माँ ने भेजे थे, सोचा गरम-गरम हैं तो…”
“तो क्या?” समीर ने उनकी बात काट दी। “तो आप वेटर बन कर मेहमानों के बीच घुस जाएंगे? वेटर भी यूनिफॉर्म में होते हैं पापा। आप समझ क्यों नहीं रहे? मेरा स्टेटस, मेरा रुतबा… यह सब मैंने अपनी मेहनत से बनाया है। आपके उस खेत की मिट्टी यहाँ के इटालियन मार्बल पर शोभा नहीं देती। प्लीज, अब आप अपने कमरे में ही रहिएगा। मुझे और तमाशा नहीं चाहिए।”
समीर झटके से मुड़ा और ड्राइंग रूम की तरफ चला गया, जहाँ धीमी आवाज़ में जैज़ संगीत बज रहा था और शहर के नामी-गिरामी लोग वाइन के ग्लास टकरा रहे थे। रामेश्वर जी वहीं खड़े रह गए। उनकी आँखों के कोर गीले हो गए, पर उन्होंने उन्हें बहने नहीं दिया। उन्होंने चुपचाप अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और बिस्तर के किनारे बैठ गए। उनके हाथ में वह टिफिन अब किसी बोझ जैसा लग रहा था।
यह कहानी उस घर की है जहाँ दीवारों पर महंगे पेंटिंग्स तो थे, लेकिन रिश्तों का रंग फीका पड़ चुका था। रामेश्वर जी एक साधारण किसान थे। उन्होंने अपनी पूरी जवानी हल जोतते और फसल काटते बिता दी थी, सिर्फ इसलिए ताकि उनका बेटा समीर, उस धूप और धूल से दूर, वातानुकूलित कमरों में बैठ सके। समीर पढ़ने में होशियार था। गाँव के स्कूल से शहर के कॉलेज, और फिर एमबीए—हर सीढ़ी पर रामेश्वर जी ने अपनी ज़मीन का एक टुकड़ा बेचा था।
आज समीर एक मल्टीनेशनल कंपनी का वीपी (Vice President) था। उसने शहर के पॉश इलाके में पेंटहाउस ले लिया था। जब उसने रामेश्वर जी को अपने पास रहने के लिए बुलाया, तो गाँव में सबको लगा कि रामेश्वर का बुढ़ापा सुधर गया। लेकिन हकीकत इस चारदीवारी के भीतर कुछ और ही थी।
पार्टी बाहर शबाब पर थी। मिस्टर खुराना, जो समीर के बॉस थे और आज के मुख्य अतिथि भी, सोफे पर बैठे थे। समीर हर मुमकिन कोशिश कर रहा था उन्हें इम्प्रेस करने की।
“समीर, तुम्हारी प्रेजेंटेशन तो अच्छी थी, लेकिन असली टेस्ट तो अब है। हमें उस जापानी डेलीगेशन के साथ डील साइन करनी है। उन्हें सादगी और कल्चर पसंद है, लेकिन हमारे पास दिखाने को सिर्फ ये आर्टिफिशियल लाइफस्टाइल है,” मिस्टर खुराना ने वाइन का घूंट भरते हुए कहा।
समीर ने हंसते हुए कहा, “सर, आप चिंता न करें। मैं सब हैंडल कर लूँगा। हम उन्हें बेस्ट 5-स्टार होटल में डिनर कराएंगे।”
तभी समीर की पत्नी, नमिता, रसोई से बाहर आई। उसने समीर को इशारे से साइड में बुलाया।
“समीर, पापा जी ने सुबह से कुछ नहीं खाया है। मैं उनके लिए खाना कमरे में भिजवा दूँ?”
समीर ने चिढ़कर कहा, “हाँ, भिजवा दो। और देखना, वो बाहर न आएं। खुराना सर अभी भी यहीं हैं।”
रामेश्वर जी अपने कमरे में खिड़की के पास बैठे थे। खिड़की से शहर की जगमगाती रोशनी दिख रही थी, लेकिन उन्हें अपने गाँव का वह दिया याद आ रहा था जो आंधी में भी फड़फड़ाता रहता था। उन्हें लगा कि शायद वे यहाँ आकर गलत कर गए। बेटा बड़ा आदमी बन गया है, अब उसे ‘बाप’ की नहीं, एक ‘अदृश्य साये’ की ज़रूरत है जो रहे तो सही, पर दिखाई न दे।
अचानक, समीर के घर की बिजली चली गई। बैकअप जनरेटर में कुछ तकनीकी खराबी आ गई थी। पूरा पेंटहाउस अंधेरे में डूब गया। लिफ्ट बंद, एसी बंद। मेहमानों में थोड़ी खलबली मच गई। समीर पसीने-पसीने हो गया। वह फोन पर मेंटेनेंस वालों पर चिल्ला रहा था।
“पापा!” नमिता की आवाज़ आई। “पापा, आप कहाँ हैं?”
रामेश्वर जी ने अपने कमरे से टॉर्च निकाली, जो वे हमेशा अपने साथ रखते थे—गाँव की आदत थी। वे टॉर्च लेकर बाहर आए। ड्राइंग रूम में अफरा-तफरी थी।
“अरे, कोई मोमबत्ती जलाओ!” किसी ने कहा।
रामेश्वर जी ने टॉर्च की रोशनी छत की तरफ की, जिससे कमरे में एक मध्यम सी रोशनी फैल गई। उन्होंने बहुत ही शांत स्वर में कहा, “घबराइए मत। अभी रोशनी आ जाएगी। तब तक खुली हवा के लिए बालकनी का दरवाजा खोल देते हैं।”
मिस्टर खुराना, जो गर्मी और अंधेरे से परेशान हो रहे थे, उन्होंने रामेश्वर जी को देखा। कुर्ता-पायजामा पहने, कंधे पर गमछा रखे, वह बुजुर्ग व्यक्ति इस घबराहट के माहौल में सबसे शांत था।
रामेश्वर जी ने देखा कि खुराना साहब पसीने से तर-बतर हैं। वे उनके पास गए और अपना गमछा (जो बिलकुल साफ और धुला हुआ था) आगे बढ़ाते हुए बोले, “साहब, हवा नहीं लग रही होगी। इससे हवा कर दूँ? या पसीना पोंछ लीजिए, साफ है।”
समीर, जो अभी फोन रखकर लौटा था, यह देखकर सन्न रह गया। “पापा! आप फिर…?”
लेकिन इससे पहले कि समीर कुछ बोलता, खुराना साहब ने वह गमछा ले लिया और अपना चेहरा पोंछा। “शुक्रिया बड़े भाई साहब। आज की ये पॉलिएस्टर की दुनिया में सूती कपड़े का सुख तो हम भूल ही गए हैं।”
रामेश्वर जी मुस्कुराए। “साहब, सुकून तो सादगी में ही है। ये एसी की हवा शरीर को ठंडा करती है, पर मन तो खुली हवा में ही जुड़ाता है।”
अगले पंद्रह मिनट तक बिजली नहीं आई। उस अंधेरे और टॉर्च की रोशनी में, मिस्टर खुराना और रामेश्वर जी के बीच बातें शुरू हो गईं। समीर रोकने की कोशिश करना चाहता था, उसे डर था कि उसके पिता फिर कुछ ‘गंवारू’ बोल देंगे।
खुराना ने पूछा, “आप करते क्या थे गाँव में?”
रामेश्वर जी ने उत्साह से बताया, “जी, खेती। मिट्टी से सोना उगाते थे। आपको पता है साहब, जिस गेहूं की रोटी आप खाते हैं, उसे उगने में चार महीने और किसान का पसीना लगता है। आजकल तो लोग ‘ऑर्गेनिक’ के नाम पर न जाने क्या-क्या खाते हैं, पर असली स्वाद तो उस बाजरे की रोटी और गुड़ में है जो खेत की मेड़ पर बैठकर खाया जाता है।”
खुराना साहब मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे। “बाजरे की रोटी और गुड़? अरे, मुझे बरसों हो गए वो स्वाद चखे। मेरी दादी बनाती थीं।”
रामेश्वर जी की आँखों में चमक आ गई। “साहब, अगर आप बुरा न मानें, तो मेरे पास घर का बना थोड़ा गुड़ और गोंद के लड्डू हैं। मेरी पत्नी ने भेजे हैं। चखेंगे?”
समीर का दिल हलक में आ गया। वही लड्डू, जिसके लिए उसने पिता को अपमानित किया था। उसने सोचा अब खुराना साहब भड़क जाएंगे।
लेकिन खुराना साहब ने हाथ आगे बढ़ा दिया। “अरे, नेकी और पूछ-पूछ? लाइए भाई साहब।”
रामेश्वर जी ने टिफिन खोला। खुराना साहब ने एक लड्डू उठाया और खाया। उनके चेहरे पर जो भाव आया, वह किसी महंगी वाइन को पीने पर भी नहीं आया था।
“अद्भुत! यह स्वाद… यह तो शुद्ध देसी घी और अपनापन है। समीर!” खुराना ने समीर को आवाज़ दी।
समीर डरते-डरते पास आया। “य-यस सर?”
“समीर, तुम मुझे इम्प्रेस करने के लिए इटालियन डिनर प्लान कर रहे थे? अरे, असली खज़ाना तो तुम्हारे घर में है। तुम्हारे पिता जी। तुम्हें पता है, जापानी डेलीगेशन को क्या चाहिए? उन्हें ‘ईमानदारी’ और ‘जड़ें’ (Roots) चाहिए। जो इंसान अपनी मिट्टी से जुड़ा हो, वही भरोसेमंद होता है।”
बिजली आ गई। कमरे में फिर से चकाचौंध रोशनी हो गई। लेकिन इस बार समीर की नज़रें झुकी हुई थीं। उसने देखा कि उसके ‘हाई-प्रोफाइल’ बॉस उसके ‘गंवार’ पिता के साथ बैठकर हंस रहे थे। रामेश्वर जी उन्हें बता रहे थे कि नीम का दातुन दांतों के लिए कितना अच्छा होता है, और खुराना साहब ध्यान से सुन रहे थे।
पार्टी खत्म होने के बाद, जब खुराना साहब जाने लगे, तो उन्होंने रामेश्वर जी के पैर छुए। “काका, अगली बार आऊँगा तो वो बाजरे की रोटी पक्की रही।”
रामेश्वर जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
दरवाजा बंद हुआ। घर में फिर सन्नाटा छा गया। समीर अपनी जगह खड़ा था। रामेश्वर जी चुपचाप अपना टिफिन उठाकर कमरे की ओर मुड़े। उन्हें लगा, बात खत्म हो गई। बेटा शायद फिर नाराज़ होगा।
“पापा…” समीर की आवाज़ आई।
रामेश्वर जी ठिठक गए। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। “जा रहा हूँ बेटा, बस वो लड्डू का डब्बा मेज पर छूट गया था।”
समीर तेज़ी से चला और पिता के पैरों में गिर पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगा।
“समीर? अरे, क्या हुआ बेटा?” रामेश्वर जी घबरा गए। उन्होंने झुककर बेटे को उठाने की कोशिश की।
“मुझे माफ कर दीजिए पापा,” समीर ने सिसकते हुए कहा। “मैं इतना अंधा हो गया था कि मुझे हीरा और पत्थर का फर्क ही समझ नहीं आया। मैंने उस झूठी इज्जत के लिए आपका अपमान किया, जिसने अपनी इज्जत बेचकर मुझे यहाँ तक पहुँचाया। मैं भूल गया था कि मेरी ये सूट-बूट वाली हस्ती, आपके उस धोती-कुर्ते की बदौलत ही खड़ी है।”
रामेश्वर जी की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने समीर को उठाया और सीने से लगा लिया। “पगले, बाप कभी बेटे से नाराज़ होता है क्या? मैं तो बस डरता था कि कहीं मेरे कारण तुझे तेरे दोस्तों में शर्मिंदा न होना पड़े। मैं अनपढ़ हूँ न बेटा, मुझे ये शहरी तौर-तरीके नहीं आते।”
समीर ने पिता के आँसू पोंछे। “नहीं पापा, अनपढ़ आप नहीं, मैं हूँ। मैंने किताबें तो पढ़ लीं, पर संस्कार भूल गया। वो टिफिन… वो लड्डू कहाँ हैं?”
“वो तो खुराना साहब ने दो-चार खा लिए, बाकी बचे हैं,” रामेश्वर जी ने भोलेपन से कहा।
समीर ने वह टिफिन खोला और एक लड्डू निकालकर अपने मुंह में रख लिया। “दुनिया का सबसे बेहतरीन खाना यही है पापा। और आज से आप कमरे में बंद नहीं रहेंगे। अगली बार जब मेरे दोस्त आएंगे, तो मैं उन्हें गर्व से मिलाऊँगा—मेरे पिता, जो मिट्टी से सोना उगाना जानते हैं।”
नमिता, जो दूर खड़ी यह सब देख रही थी, मुस्कुरा दी। आज उस पेंटहाउस में पहली बार ‘घर’ जैसा महसूस हो रहा था।
समीर ने उस रात सीखा कि इज्जत कपड़ों से नहीं, किरदार से मिलती है। और जड़ें चाहे कितनी भी पुरानी और मैली क्यों न लगें, पेड़ को खड़ा रखने की ताकत उन्हीं में होती है। जिस ‘गंवारपन’ से वह भाग रहा था, असल में वही उसकी सबसे बड़ी विरासत थी।
अगले दिन सुबह, समीर ने ऑफिस जाने से पहले अपने पिता के साथ बालकनी में बैठकर चाय पी। उसने भी आज गमछा कंधे पर डाल रखा था—सिर्फ पिता को यह महसूस कराने लिए कि उनका बेटा अब सच में बड़ा हो गया है।
सीख: आधुनिकता का अर्थ अपनी संस्कृति और माता-पिता का अपमान करना नहीं है। जो अपनी जड़ों का सम्मान नहीं करते, वे चाहे कितनी भी ऊँचाई पर पहुँच जाएं, अंदर से खोखले ही रहते हैं।
मूल लेखिका : करुणा मलिक