यह रचना मेरी प्रिय सखी मंजू को समर्पित है ।वह अब इस दुनिया में नहीं है ।कभी उसने कहा था कि मेरे लिए भी लिखिए न दीदी ।मेरी समवयसका थी वह लेकिन मुझे दीदी ही कहती ।दो दशक बीत गए उसे दुनिया से गये हुए ।आज बहुत याद आ रही है न जाने क्यों?हम दोनों पड़ोसी थे।दोनों के पिता एक ही आफिस में थे।
हमे सरकारी क्वाटर मिला हुआ था ।वह हमारे उपर के तल्ले पर रहती थी ।हमारी माँ और उसकी माँ से बहनापा था।इसलिए मै उनको मौसी कहती ।हमारी और उनकी दोस्ती इतनी गहरी की एक साथ खाना पीना, खेलना स्कूल जाना परिवार के साथ सिनेमा जाना इत्यादी होता ।
मंजू बहुत प्यारी और मिलनसार लड़की थी।न जाने कैसे दुनिया की नजर लग गई उसे ।उस दिन स्कूल में एकदम चुप चुप थी वह।मुझे बेचैनी होने लगी ।ऐसी चुप तो कभी नहीं रहती थी वह ।आज क्या हो गया? बहुत कुरेदा उसे ।”बताओ न मंजू क्या बात है?
“वह मेरे गले लग गई और फूट फूट कर रोने लगी ।मैंने उसके आंसू पोछे और कहा जो भी बात है साफ साफ कहो।उसने जो बताया वह उसी के शब्दों में “दीदी,कल मेरे चाचा जो मेरे पिता जी के चचेरे भाई हैं वह गांव से आये हुए थे ।घर के सभी लोग बहुत खुश हुए ।अच्छी तरह उनका स्वागत हुआ ।
बढिया खाना बना ।गपशप हुआ ।मेरे लिए सूट का कपड़ा लाये थे ।लाल चटक रंग ।मुझे बहुत पसंद आया ।उनहोंने पूछा “अच्छा लगा तुम को? और भी ला दूँगा “।रात हुई ।सभी लोग सोने चले गये ।तीन बेड रूम का हमारा क्वाटर जो कभी खिलखिलाता रहता था उस रोज एक दम मायूस हो गया ।
रात के एक बजे होंगे ।मै नींद मे बेसुध थी।तभी मुझे किसी के अपने उपर होने का आभास हुआ ।मै चिललाई।उनहोंने मेरे मुंह को अपने हथेलियों से दबा दिया ।वह मेरे चाचा थे।वह एकदम वहशीपन पर उतर आए थे।और मेरी मर्जी पूछने लगे ।मन किया कि जोर दार थप्पड़ लगा दूं ।मुँह नोच लूँ उनका।पर मै अवश थी उनके पंजों के पकड़ से।मै तड़पती रही ।
वह अपनी इच्छा पूरी कर के अलग हो गया ।साथ ही धमकी दे गया कि अगर मैंने किसी से यह बात कही तो वह मुझे और मेरे माता-पिता को जिन्दा नहीं छोड़ेगा ।मै बहुत डर गई ।आज सुबह ही वह चला गया है ।उसके लिए मेरे मन मे आदर के शब्द नहीं हैं ।
मैंने घर में किसी को कुछ नहीं बताया है दीदी ।पर मैं तड़प रही हूँ ।क्या करूं? ।मैंने उसे समझाया “अभी चुप रहो ।समय आने पर देखते हैं ।घर आकर मैंने अपनी माँ को बताया ।माँ ने कहा-यह तो बहुत गलत बात है ।लेकिन कुछ हल समझ में नहीं आ रहा था।मेरी उम्र पन्द्रह थी और मंजू तेरह साल की ।
लेकिन मंजू उम्र से कुछ अधिक ही समझदार थी ।वह अब हँसना खिलखिलाना भूल गयी थी ।एकदम चुप चाप रहने लगी थी ।मौसी ने आकर मेरी माँ से अपनी समस्या बताई “आजकल मंजू को न जाने क्या होता जा रहा है ।न ठीक से खाना खाती है न बात करती है।इतना गुमसुम तो कभी नहीं रहती थी वह ।माँ भी क्या कहती ।
जान तो सबकुछ रही थी लेकिन समस्या का हल कैसे निकलेगा यह किसी को समझ में नहीं आ रहा था।तीन महीने बीत गए ।उसे स्कूल मे उल्टियाँ होने लगी ।पेट भी कुछ उभार पर आ गया ।एक दिन प्रिंसिपल ने उसे बुलाया ।पूछा ” साफ साफ बताओ मंजू? “मंजू ने रोते हुए सबकुछ उगल दिया ।फिर उसके माता-पिता को बुलाया गया ।और स्कूल से निकाल दिया गया ।
मेरा मन नहीं लग रहा था उसके बिना ।पर उसका घर से निकलना बंद कर दिया गया ।मेरे घर के लोग भी मना करने लगे कि उससे न मिलूं ।फिर जीवन आगे बढ़ गया ।पापा की बदली दूसरे शहर में हो गई ।हम सब वहां से चले गये ।मेरी पढ़ाई और फिर शादी हो गई थी ।लेकिन मंजू को मै भूल नहीं पायी।
वह मेरे दिल दिमाग पर छाई रहती ।बचपन से मुझे डायरी लिखने का शौक था ।और पिता जी के उत्साह बढाने पर स्कूल के दिनों से ही कुछ कुछ लिखने लगी थी ।मंजू हंसती “क्या पढ़ाई लिखाई में डूबी रहती हो दीदी “कुछ छपता भी है क्या? कभी मेरे लिए, हमारे दोस्ती पर भी तो कुछ लिखो ” मंजू की बात पर मै मुसकुराते हुए कह देती ” समय आने दो जरूर लिखेंगे “।
आज यह कैसा समय आया था ।मै अपनी गृहस्थी में मगन थी।माँ का फोन आता लेकिन मंजू के बारे में कुछ पता नहीं था।मै एकबार अपने भतीजे के मुंडन में जब मायके गई तो माँ ने बताया कि मंजू का परिवार भी इसी शहर में आ गया है ।मैने उत्साह से पूछा “मंजू कैसी है? कहाँ है?उसकी शादी हो गई होगी? “माँ एकदम चुप हो गयी थी ।
फिर थोड़ी देर बाद कहा “मंजू ने एक दिन शाम को सलफास की ढेर सारी गोलियां खा ली ।और जबतक अस्पताल ले जाया गया तो डाक्टर ने जबाब दे दिया ।वह दुनिया से चली गई ।बाद में माँ से ही मालूम हुआ कि उसका अबारशन करा दिया गया था ।लेकिन डाक्टर ने कहा अब वह कभी माँ नहीं बन सकती।
फिर वह पागलो की तरह व्यवहार करने लगीं थी ।कभी जोर शोर से चिल्लाने लगती ” मुझे बचाओ, बचाओ।वह हम सभी को मार डालेगा “मर्ज बढ़ता गया ।वह अपने कपड़े फाड़ देती ।कभी खुद के बाल नोचना लगती थी।लेकिन क्या वह सचमुच पागल थी?
शायद नहीं ।पागल नहीं थी वह।लेकिन उसे दौरा पड़ता था।पागल होती तो आत्म हत्या कैसे करती? उसके माता-पिता भी किसी से नहीं मिलते ।बदनामी के डर से घर में कैद हो गये थे ।खैर ।मै बहुत दुःख महसूस कर रही थी उसके लिए ।आज उसके लिए लिखने का मन होने लगा था ।
एक सवाल मन में बार बार आता है क्या “इस गुनाह की माफी “हो सकती है कभी? शायद कभी नहीं ।जिस गुनाह ने एक हँसते खेलते जिंदगी बर्बाद कर दी।पाठक ही बताएं? इस गुनाह की माफी नहीं दे सकती कोई भी ।बस ।
उमा वर्मा ।नोयेडा ।स्वरचित ।मौलिक ।