बहु तुमने यह साड़ी क्यों पहन रखी है? जब मैंने तुम्हे यह पहनने को मना किया था और कहा भी था कि मैंने
तुम्हारे लिए बहुत ही कीमती साड़ी ला कर रख दिया है तो तुम्हे क्या जरूरत थी इसे पहनने क़ी। तुमने यह
भी नहीं सोचा कि ऐसी हल्की साड़ी पहनकर विधि – व्यवहार करोगी तो हमारी कितनी बेइज्जती होंगी
और मना करने के बाद भी इस साड़ी को पहन ली।सविता जी लगातार अपनी बहु को डांटे जा रही थी।
यह भी नहीं सोच रही थी कि वहाँ पर उनकी ननद और बहु की भाभी भी खड़ी है। जब बहु ने देखा कि माँ
जी का बोलना रुकने वाला नहीं है तो उसने उनकी बात को बीच मे ही काटते हुए कहा- जी माँ जी आपने
पहनने को मना किया था, परन्तु विधि – व्यवहार करते वक़्त तो नईहर की साड़ी ही पहनी जाती है तो मैने
पहन लिया। यह सुनते ही सविता जी और गुस्सा हो गईं और बहु की भाभी का बिना लिहाज किए उन्होंने
कह दिया, मुझे मत बता मुझे सब रिवाज़ पता है,परन्तु तेरी भाभी कोई ढंग की साड़ी लाती तब तो तू उसे
पहन कर चौका पर बैठती। सविता जी अभी और कुछ कहती ही कि बहु की भाभी ने कहा – बबुनी जी माँ
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जी सही कह रही है। आप उन्ही की लाई साड़ी पहन लीजिए। आज बाबू का जनेऊ है सभी जान पहचान
वाले आए है तो आपका हल्की साड़ी पहनना अच्छा नहीं लगेगा। यहाँ तो आपका भारी जराऊ साड़ी
पहनना ही अच्छा होगा, वरना आपके ससुराल वालों की बड़ी बेइज्जती होंगी। माँ जी मुझे माफ कर
दीजिये। मै इससे कीमती साड़ी नहीं ला पाई। आप सभी को तो पता ही है इनके भैया कितने बीमार थे,
उनके इलाज मे सारी जमा पूंजी खत्म हो गईं यहाँ तक की मेरे गहने तक बिक गए। इनकी दवाईयो का
खर्च और घर का खर्च किसी तरह से पापा के पेंशन से चल रहा है। आज मेरे भांजे का जनेऊ है और मै
उनके लिए ढंग के उपहार भी नहीं ला सकी। आप सभी बड़ो का और भगवान का आशीर्वाद रहा तो
उनकी शादी मे चौका की साड़ी कीमती ले आउंगी, तब बबुनी जी आप उसे पहनकर विधि – व्यवहार कर
लीजिएगा। यह कहते – कहते उनकी आँखो मे आँसू आ गया।उन्हें रोते हुए देखकर सविता जी की ननद
को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने सविता जी से कहा – तुममें कब सुधार होगा? तुम्हारे इसी व्यवहार के
कारण, हर सामान मे मीन – मेख निकालने के कारण तुम्हारी भाभी ने तीज – त्यौहार भेजना बंद कर दिया.
अब तुम बहु की भाभी के साथ भी ऐसा ही करके उसका भी नईहर छूड़ाना चाहती हो। ननद की बातो को
सुनकर सविता जी ने बहु की ओर घूरकर देखा। उन्हें अपनी तरफ गुस्से से देखते हुए देखकर बहु ने कहा –
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नहीं माँ जी आज मै आपकी बात नहीं मानूंगी। मै ससुराल की इज्जत रखने के लिए नईहर की साड़ी और
अपनी भाभी के प्यार की बेइज्जती नहीं करूंगी।चाहे घर की जैसी भी परिस्थिति रही हो, लेकिन आजतक
मेरी भाभी मेरे यहाँ तीज, खिचड़ी भिजवाना कभी भी नहीं भूलती है। आपको उस सामान की कीमत
दिखाई देती है और मुझे अपनी भाभी का प्यार दिखाई देता है। माँ जी उपहार की कीमत नहीं देखी जाती,
उसमे छिपे हुए प्यार को देखा जाता है। अतः मै रिवाज़ के अनुसार विधि – व्यवहार करते वक़्त अपने
नईहर की ही साड़ी पहनुंगी। बहु के अटल इरादे को देखकर और अपनी ननद की कड़वी परन्तु सही बात
को सुनकर सविता जी को भी समझ आ गया कि नईहर गरीब हो या अमीर, एक बेटी के लिए वहाँ का
उपहार सबसे कीमती होता है।
लतिका पल्लवी
वाक्य – उपहार की क़ीमत नहीं दिल देखा जाता है