घर के आँगन में तुलसी के पास खड़ी इंदु की उंगलियाँ काँप रही थीं। सामने बरामदे में बैठी उसकी जेठानी नीलम चाय की चुस्की लेते हुए फिर वही बात दोहरा रही थी—वो बात जो सालों से इंदु के कानों में काँटे की तरह चुभती आई थी।
“अरे इंदु, बेटियाँ हैं तुम्हारी… ज्यादा पढ़ा-लिखाकर क्या करेगी? आखिर जाना तो पराए घर ही है। बस सिलाई-कढ़ाई सीख जाएँ, घर का काम कर लें… बहुत है,” नीलम ने ऐसे कहा जैसे दुनिया का सबसे बड़ा सच बोल दिया हो।
इंदु ने नीलम की तरफ देखा, फिर नजरें नीचे कर लीं। जवाब देने के लिए शब्द उसके पास थे, पर घर की शांति बचाने का बोझ भी उसी के कंधों पर था। नीलम का स्वभाव था—मौका मिले तो बात में ताना घोल देना। और इंदु का स्वभाव… चोट खाकर भी मुस्कुरा देना।
नीलम के दो बेटे थे—हर्ष और करण। घर में उनका ऐसा रुतबा था जैसे वही वारिस हों, वही घर का भविष्य। नीलम को पूरा यकीन था कि “बेटे ही असली सहारा” होते हैं। वह अक्सर अपने देवर यानी इंदु के पति से भी कह देती—“तुम्हारी बेटियाँ क्या करेंगी? मेरा हर्ष-करण तो आगे चलकर दुकान संभालेंगे, पैसे भी लाएँगे और मेरा बुढ़ापा भी सँभालेंगे।”
इंदु के दो बेटियाँ थीं—पल्लवी और स्वरा। दोनों शांत, संस्कारी, पढ़ाई में तेज़। पल्लवी का सपना था नर्सिंग ऑफिसर बनने का और स्वरा चाहती थी कि वह कंप्यूटर साइंस में कुछ बड़ा करे। इंदु और उसका पति अभय—दोनों ने तय किया था कि बेटियों के सपने ‘समाज’ के डर से नहीं टूटेंगे। पर घर के भीतर ही एक दीवार थी—नीलम की तानों की दीवार।
समय बीतता गया। बच्चे बड़े होने लगे। नीलम के बेटे हर समय दोस्तों के साथ, मोबाइल और बाइक में उलझे रहते। दुकान पर बैठने का नाम लेते ही उनका चेहरा उतर जाता।
“मम्मी, अभी तो उम्र है एन्जॉय करने की,” हर्ष हँसकर कह देता।
“बिजनेस तो हो जाएगा,” करण कंधे उचका देता।
नीलम उन्हें डाँटती जरूर थी, पर अंदर से उसे भरोसा था—“मेरा खून है, संभाल लेंगे।”
और इंदु… वह रोज़ बेटियों के लिए जागती। सुबह टिफिन, फिर स्कूल की फीस, फिर ट्यूशन, फिर लाइब्रेरी। कई बार घर के खर्चों में तंगी आती, मगर इंदु ने अपने गहनों में से एक जोड़ी झुमके बेचकर भी बेटियों का कोचिंग फॉर्म भर दिया। अभय ने उसे रोका तो इंदु ने बस इतना कहा, “ये झुमके नहीं, इनके सपनों के पंख हैं।”
बोर्ड का रिजल्ट आया। पल्लवी पूरे जिले में टॉप कर गई। स्वरा भी मेरिट में। घर में मिठाई बँटी, पर नीलम ने मिठाई खाते हुए भी ताना मारने का मौका नहीं छोड़ा—
“अच्छा है… पढ़-लिख गईं। अब देखो ससुराल में काम आएगा। पर पैसा तो आखिर बेटे ही लाते हैं, इंदु।”
इंदु मुस्कुरा दी—पर इस बार मुस्कान में जवाब छिपा था। उसने सोचा—“वक्त ही जवाब देगा।”
कुछ सालों में पल्लवी सरकारी अस्पताल में नर्सिंग ऑफिसर बन गई। स्वरा एक नामी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। दोनों बेटियाँ नौकरी के साथ-साथ घर भी संभालतीं—माता-पिता के लिए समय निकालतीं, दवाइयाँ भेजतीं, घर की जरूरतें पूरी करतीं। और सबसे बड़ी बात—कभी अहंकार नहीं दिखाया।
उधर नीलम के बेटे… बिगड़ते गए। दुकान पर बैठना तो दूर, उन्होंने घर से भी दूरी बना ली। रात के दो-तीन बजे लौटना, सुबह उठने में देरी, झूठ बोलना, पैसे माँगना—यह सब नीलम के लिए रोज़ का दर्द बन गया।
नीलम का पति रमेश कई बार चीख पड़ता, “कहाँ जा रहा है ये घर? तुम्हारा लाड़-प्यार हमें ले डूबेगा!”
नीलम भीतर ही भीतर टूटती, पर बाहर से दिखाती—“मेरे बेटे हैं, सुधर जाएँगे।”
कभी-कभी वह इंदु की बेटियों को देखकर जल भी जाती। क्योंकि जिन बेटियों को वह “पराया धन” कहती थी, वही घर में रोशनी की तरह चमक रही थीं।
फिर एक दिन अचानक सब बदल गया।
एक दोपहर नीलम रसोई में काम कर रही थी कि उसे तेज़ चक्कर आया। हाथ से प्लेट छूटकर टूट गई। वह वहीं बैठ गई, सांस फूलने लगी। रमेश घबरा गया। हर्ष को कॉल किया—फोन बंद। करण को कॉल—“मैं दोस्तों के साथ बाहर हूँ।”
रमेश ने इंदु को आवाज दी। इंदु दौड़कर आई और नीलम को संभाला। नीलम की हालत देखकर इंदु ने तुरंत कहा, “भैया, आप परेशान मत होइए, मैं पल्लवी को फोन करती हूँ।”
पल्लवी ड्यूटी पर थी। कॉल उठते ही उसने सिर्फ इतना पूछा, “माँ जैसी हालत है?”
इंदु ने कहा, “बहुत घबराहट है, सांस फूल रही है।”
पल्लवी ने एक सेकंड भी नहीं गंवाया। “तुरंत अस्पताल ले जाइए। मैं इमरजेंसी में डॉक्टर को अलर्ट कर देती हूँ। और हाँ, नीलम बड़ी अम्मा को पानी मत पिलाइए अभी।”
रमेश और इंदु ने नीलम को अस्पताल पहुँचाया। वहाँ पल्लवी पहले से मौजूद थी—हालाँकि वह ड्यूटी में थी, फिर भी उसने अपनी सीनियर से बात की, सारी औपचारिकताएँ खुद संभालीं, टेस्ट करवाए, डॉक्टर से बात की, और एक अनुभवी नर्स को नीलम के पास लगा दिया।
नीलम बेड पर लेटी काँप रही थी। आँखों में डर था। तभी उसने देखा—पल्लवी उसके माथे पर हाथ रख रही है, जैसे कोई बेटी रखती है।
“बड़ी अम्मा, घबराइए मत। मैं यहीं हूँ,” पल्लवी ने कहा।
नीलम की पलकों से आँसू बह निकले। उसके मन में पहला ख्याल आया—“मेरे बेटे कहाँ हैं?”
रात हुई। अस्पताल की ठंडी रोशनी में रमेश कुर्सी पर बैठा ऊँघ रहा था, इंदु पास खड़ी थी, और पल्लवी बार-बार रिपोर्ट देख रही थी। स्वरा भी ऑफिस से सीधे अस्पताल आ गई—हाथ में फल और दवाइयों की लिस्ट लेकर। उसने बिल की औपचारिकताएँ पूरी कीं, दवा मंगवाई, और रमेश से बोली, “फूफा जी, आप चिंता मत कीजिए।”
नीलम की आँखों में जैसे कोई परदा हट गया। जिस घर में वह हमेशा बेटियों को “कम” समझती रही थी, आज वही बेटियाँ उसके लिए ढाल बनकर खड़ी थीं। और उसके अपने बेटे… कहीं नहीं।
सुबह जब नीलम की हालत स्थिर हुई, उसने धीमी आवाज़ में पूछा, “हर्ष… और करण… आए?”
रमेश ने कड़वाहट से कहा, “रात भर फोन किया… एक ने उठाया नहीं, दूसरे ने कहा—‘कल आऊँगा।’”
नीलम ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। उसे अपनी ही बातों की गूँज सुनाई दी—“बेटे ही सहारा होते हैं।”
और आज उसका सहारा कौन था? इंदु की बेटियाँ।
तीन दिन अस्पताल में रहे। पल्लवी दिन में ड्यूटी संभालती, फिर दौड़कर बड़ी अम्मा के पास आती। स्वरा घर से कपड़े, जरूरी सामान, खाना… सब व्यवस्थित करती। इंदु हर समय साथ रहती, जैसे वर्षों पुराना रिश्ता हो। नीलम को यह सब किसी एहसान जैसा नहीं लगा—यह प्यार था, बिना शर्त वाला।
जब नीलम डिस्चार्ज होकर घर आई, तब भी बेटों का अता-पता नहीं था। दो दिन बाद हर्ष और करण आए, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
“मम्मी कैसी हो? अब ठीक हो?”
बस इतना कहकर वे कमरे में चले गए और मोबाइल में लग गए।
नीलम का दिल जैसे भीतर से टूट गया। वह उठकर इंदु के कमरे में गई। इंदु कपड़े तह कर रही थी। नीलम ने पहली बार बिना ताने, बिना घमंड के कहा, “इंदु…”
इंदु चौंककर बोली, “जी दीदी?”
नीलम की आँखें भर आईं। “मैंने तुझे बहुत सताया है… तेरी बेटियों को कम समझा… ताने मारे… आज समझ आया कि औलाद बेटा-बेटी नहीं होती… औलाद बस औलाद होती है। और जो इंसानियत निभाए… वही असली सहारा।”
इंदु की आँखें भी नम हो गईं। उसने नीलम का हाथ थाम लिया। “दीदी, छोड़िए… जो हुआ सो हुआ। बस अब से घर में ऐसा मत कहिए कि बेटियाँ बेकार हैं।”
नीलम ने सिर हिलाया। “नहीं कहूँगी। मैं… माफी मांगने नहीं आई, मैं सच कबूल करने आई हूँ। पल्लवी और स्वरा… उन्होंने मुझे बेटी की तरह संभाला। मैं उन्हें अपना मान चुकी हूँ।”
इंदु ने धीरे से कहा, “मान लीजिए… पर उन्हें भी तो आपके प्यार की जरूरत है। वे चाहती हैं कि आप उन्हें स्वीकार करें।”
उस शाम नीलम ने घर में सबके सामने पहली बार कहा, “आज से ये दोनों मेरी बेटियाँ हैं।”
हर्ष-करण ने चौंककर देखा। रमेश ने सख्त नजर से अपने बेटों की तरफ देखा। और पल्लवी-स्वरा के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान खिली, जिसमें जीत नहीं, अपनापन था।
नीलम ने दोनों को पास बुलाकर माथा चूमा। “मैंने गलत सोचा था। पढ़ाई किसी का हक है। और बेटियाँ… बेटियों को बोझ कहना सबसे बड़ी नासमझी है।”
पल्लवी ने विनम्रता से कहा, “बड़ी अम्मा, हम आपकी बेटियाँ बनकर नहीं आए थे… हम बस इंसान बनकर आए थे।”
नीलम का गला भर आया। “और तुमने मुझे इंसान बनना सिखा दिया।”
कुछ दिन बाद नीलम ने एक और फैसला लिया। उसने हर्ष और करण को बैठाया और साफ कहा, “अब बस। तुम दोनों को अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। वरना जिंदगी तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी।”
पहली बार उसकी आवाज़ में माँ का लाड़ नहीं, माँ की चेतावनी थी। रमेश ने भी साथ दिया। बेटों ने टालने की कोशिश की, पर अब घर में कोई उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला रहा था।
वक्त लगा, पर बदलाव शुरू हुआ। दुकान पर बैठने की शुरुआत करण ने की, हर्ष ने धीरे-धीरे जिम्मेदारी उठाई। शायद उन्हें भी समझ आ गया कि माँ को “माँ” समझने के लिए पहले “बेटा” बनना पड़ता है।
और घर के कोने में बैठी इंदु… मन ही मन मुस्कुरा रही थी। क्योंकि उसे कभी बदला नहीं चाहिए था, बस सच की जीत चाहिए थी—कि बेटियाँ कम नहीं होतीं।
नीलम की आँखों से उतर चुकी चर्बी सिर्फ अहंकार की नहीं थी, यह उस सोच की भी थी जो समाज ने सालों से औरतों के भीतर भर रखी थी।
एक दिन नीलम ने मोहल्ले की औरतों के सामने खुद कहा, “घर को रोशन करने के लिए बेटा जरूरी नहीं… समझ जरूरी है। बेटियाँ भी दीपक हैं—अगर उन्हें जलने दिया जाए।”
और सच में, उस घर में अब तानों की जगह एक नई भाषा बोलने लगी—सम्मान की भाषा।
मूल लेखिका : विधि जैन