अहं का रिसाव – पुष्पा जोशी : Moral Stories in Hindi

        घर में तनाव का माहौल था। आठ बजे तक कोई उठा नहीं था। ऑंखें बन्द करने से दिन रात में तब्दील नहीं हो जाता।घर मे कुल पॉंच सदस्य थे। महेन्द्र,सुधा उनका बेटा रौनक, बहू शुभि और दो साल का पोता आरव।आज सिर्फ तीन सदस्य रह गए, शुभि कल रूठकर अपने मायके चली गई थी।

उसका मायका और ससुराल एक ही गॉंव मे था। सुधा हिम्मत करके उठी। कई दिनों के बाद चाय बनाने के लिए तपेली गैस पर रखी ही थी, कि राधा की आवाज आई-‘मालकिन बरतन रखने का सीका दे दीजिये, बरतन मांजकर रख दूॅं।’ सुधा की कमर में तकलीफ थी,झुक नहीं पाती थी, इसलिए बरतन

ठीक से जमा नहीं पाई,सब बेतरतीब रख दिए।वे बुदबुदाई -‘काश ये कमर की तकलीफ न होती, तो मैं झुककर आराम से बरतन जमा देती।’महेन्द्र जो सुधा के पीछे पीछे ही उठकर रसोई मे आकर खड़े हो गए थे। उनकी बुदबुदाहट सुनकर हॅंस दिए। सुधा चिढ़कर बोली- ‘मैं परेशान हो रही हूँ और

आपको मजा आ रहा है, आखिर आप क्या चाहते हैं?’  ‘मैं कहना चाह रहा हूँ- तुम झुक नहीं पा रही हो और बरतन ठीक से नहीं जमने के कारण परेशान हो। हमारे परिवार भी रोज के कलह के कारण अस्तव्यस्त हो गया है।अगर तुम अपनी सोच को बदलकर, अहं का स्तर कम कर, बहू को बेटी मानने

लगो, तो परिवार भी व्यवस्थित चलने लगे। शुभि हर काम व्यवस्थित करती है।’ सुधा ने विचार किया, सही तो कह रहे हैं महेन्द्र वह जबसे आई है न तो मुझे कोई काम करना पड़ता है न कभी उसने ऊंची आवाज में बात की, फिर मैं ही क्यूँ….। सुधा उस दिन शाम को शुभि को लाने के लिए उसके मायके जा

रही थी उसका अहं धीरे-धीरे रिस रहा था।
प्रेषक-
पुष्पा जोशी
स्वरचित, मौलिक

लघुकथा
शीर्षक-*अहं का रिसाव*

Leave a Comment

error: Content is protected !!