मायका पराया ससुराल अपना – करुणा मलिक

कार की खिड़की से पीछे छूटते पेड़ों को देखते हुए अवनि की आँखों से बहने वाले आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। ड्राइवर सीट पर बैठे उसके पति, निशित ने एक बार भी उसे चुप कराने की कोशिश नहीं की। वह जानता था कि यह वो सैलाब है जिसे बह जाने देना ही बेहतर है। यह आँसू दुख के कम और एक भ्रम के टूटने के ज़्यादा थे।

अवनि आज पूरे दो साल बाद अपने मायके, कानपुर गई थी। शादी के बाद यह उसकी पहली लंबी छुट्टी थी। जब उसने अपनी सास, सुमित्रा जी से कहा था कि वह एक हफ्ते के लिए माँ के पास जाना चाहती है, तो सुमित्रा जी ने न केवल खुशी-खुशी हामी भरी थी, बल्कि उसके बैग में अपनी समधिन के लिए बनारसी साड़ी और घर की बनी मठरियाँ भी रखी थीं।

अवनि पूरे रास्ते यही सोचती गई थी कि कैसे वह माँ की गोद में सिर रखकर सोएगी, कैसे पापा के साथ सुबह की चाय पिएगी और अपने छोटे भाई, अमन के साथ पुरानी बातों पर झगड़ेगी। उसे लगा था कि वह अपनी थकान उतारने उस जगह जा रही है जिसे दुनिया ‘सुरक्षित पनाह’ कहती है—मायका।

लेकिन पिछले अड़तालीस घंटों ने अवनि की रूह को छलनी कर दिया था।

जब वह घर पहुँची, तो स्वागत तो हुआ, पर उसमें एक अजीब सी औपचारिकता थी। जिस कमरे को वह ‘मेरा कमरा’ कहती थी, वह अब अमन का स्टडी रूम बन चुका था। उसकी किताबों की जगह अमन के वीडियो गेम्स ने ले ली थी। उसकी पुरानी पेंटिंग्स, जो उसने दीवारों पर लगाई थीं, उतारकर स्टोर रूम में फेंक दी गई थीं।

“अरे बेटा, अब तुम तो पराई हो गई हो, साल-छह महीने में एक बार आओगी। अमन को जगह की ज़रूरत थी, इसलिए हमने सोचा कि खाली कमरे का क्या करना,” माँ ने चाय का कप पकड़ाते हुए बड़ी सहजता से कहा था।

अवनि को बुरा लगा, पर उसने दिल को समझाया कि यह तो होता ही है। लेकिन असली धक्का उसे रात के खाने पर लगा।

बातों-बातों में पापा ने कहा, “अवनि, सुना है निशित का प्रमोशन हुआ है? अब तो पैकेज बहुत अच्छा हो गया होगा?”

“जी पापा, सब ठीक है,” अवनि ने मुस्कुराते हुए कहा।

“बेटा, दरअसल अमन अब एमबीए करना चाहता है। फीस बहुत ज़्यादा है। मैं रिटायरमेंट के करीब हूँ, लोन मिलना मुश्किल है। मैं सोच रहा था कि अगर तुम निशित से बात करके पाँच-छह लाख का इंतज़ाम करवा देतीं… आखिर वह भी तो अमन को भाई मानता है।”

अवनि के हाथ से निवाला छूट गया। वह अभी घर की देहरी पर बैठी ही थी कि पैसों की बात आ गई। उसे याद आया कि शादी के वक्त भी ससुराल वालों ने कोई माँग नहीं की थी, पर उसके पापा ने अपनी इज़्ज़त के नाम पर जो खर्च किया था, उसका ताना वे आज तक उसे देते थे।

“पापा, अभी हमने घर की ईएमआई शुरू की है। निशित पर पहले से ही बहुत बोझ है। मैं उनसे कैसे कहूँ?” अवनि ने धीरे से कहा।

तभी माँ, जो अब तक बड़े प्यार से सब्जी परोस रही थीं, का स्वर बदल गया। “अरे, तो हक़ से माँग न। पत्नी है तू उसकी। या फिर वहां तेरी कोई चलती नहीं है? हमने सोचा था बेटी बड़े घर में ब्याही है तो बुढ़ापे का सहारा बनेगी, पर तू तो आते ही हाथ खड़े कर रही है।”

अवनि सन्न रह गई। वह सहारा बनने आई थी, या सौदा करने?

अगली सुबह माहौल और तनावपूर्ण हो गया। अमन, जिसे वह राखी पर अपनी सेविंग्स से महंगे गिफ्ट भेजती थी, वह उससे ठीक से बात भी नहीं कर रहा था क्योंकि उसे पता चल गया था कि दीदी पैसे नहीं दे रहीं।

हद तो तब हो गई जब शाम को अवनि ने अपनी अलमारी (जो अब अमन की थी) में अपनी एक पुरानी डायरी ढूँढनी चाही। माँ ने उसे रोक दिया।

“अवनि, वहां अमन के ज़रुरी कागज़ात रखे हैं। तुम बार-बार चीज़ें इधर-उधर मत करो। मेहमान की तरह आई हो, आराम से रहो।”

‘मेहमान’। यह शब्द अवनि के सीने में तीर की तरह चुभा। जिस घर की ईंट-ईंट को उसने अपनी हंसी और आंसुओं से सींचा था, आज वहां उसे ‘मेहमान’ कहा जा रहा था। उसे अहसास हुआ कि मायका तब तक ही अपना होता है जब तक आप वहां के नियमों और उम्मीदों पर खरे उतरते हैं। जैसे ही आप ‘ना’ कहते हैं, खून के रिश्ते पानी हो जाते हैं।

उसने उसी वक्त निशित को फोन किया और वापस लेने आने को कहा। माँ-पापा ने उसे रोकने की खास कोशिश नहीं की, शायद इसलिए क्योंकि ‘उम्मीद’ का सौदा पूरा नहीं हुआ था।

अब, कार जब उसके शहर, पुणे की सीमा में दाखिल हुई, तो अवनि का दिल भारी था। उसे लग रहा था कि अब उसका कोई घर नहीं है। मायका अब उसका रहा नहीं, और ससुराल… ससुराल को तो समाज हमेशा ‘दूसरा घर’ ही कहता आया है, जहाँ बहुएं सिर्फ काम करने और वंश बढ़ाने के लिए होती हैं। उसे एक अजीब से अकेलेपन ने घेर लिया था।

कार घर के गेट पर रुकी। रात के दस बज चुके थे। अवनि ने सोचा था कि सब सो गए होंगे। उसके पास चाबी थी, वह चुपचाप अंदर चली जाएगी।

लेकिन जैसे ही निशित ने गेट खोला, सामने का नज़ारा देखकर अवनि ठिठक गई।

ड्राइंग रूम की बत्ती जल रही थी। उसकी सास, सुमित्रा जी, सोफे पर बैठीं चश्मा लगाए दरवाज़े की ओर ही देख रही थीं। उनके पास सेंटर टेबल पर खाने की प्लेटें ढकी हुई रखी थीं।

“आ गए?” सुमित्रा जी ने किताब बंद करते हुए राहत की सांस ली। “कितनी देर कर दी बेटा? फोन भी नहीं उठाया तुम दोनों ने। मैं कब से चिंता कर रही थी।”

अवनि चुप रही। उसकी आँखें सूजी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ था। उसे डर था कि अगर वह बोली तो रो पड़ेगी।

सुमित्रा जी अपनी जगह से उठीं और अवनि के पास आईं। उन्होंने एक पल के लिए अवनि के चेहरे को गौर से देखा। एक अनुभवी माँ की नज़र ने बिना कुछ कहे ही सब कुछ पढ़ लिया। मायके की चमक के बजाय बेटी के चेहरे पर छाई यह वीरानी उन्हें सारी कहानी बयां कर गई।

“खाना खाया रास्ते में?” सुमित्रा जी ने पूछा।

निशित ने जवाब दिया, “नहीं माँ, बस आ ही रहे हैं सीधे।”

“जाओ, हाथ-मुँह धो लो। मैंने कढ़ी-चावल बनाए हैं, अवनि को पसंद हैं न,” सुमित्रा जी ने अवनि के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

वह स्पर्श… वह स्पर्श वैसा नहीं था जैसा अवनि ने सोचा था। वह औपचारिक नहीं था। उसमें एक अपनापन था, एक चिंता थी। अवनि वॉशबेसिन पर गई और चेहरे पर पानी के छींटे मारे। उसे याद आया कि मायके में माँ ने पूछा भी नहीं था कि उसे खाने में क्या पसंद है, बस जो बना था, वही परोस दिया था।

डिनर टेबल पर अवनि चुपचाप खाना खा रही थी। निशित अपने कमरे में फ्रेश होने चला गया था। सुमित्रा जी सामने बैठीं उसे देख रही थीं।

“अवनि,” सुमित्रा जी ने कोमलता से पुकारा।

अवनि ने नज़रें उठाईं।

“जानती हो बेटा, जब एक लड़की की शादी होती है, तो उसे लगता है कि उसका एक घर छूट गया और वह दूसरे घर में जा रही है। लेकिन सच तो यह है कि लड़कियाँ अपना घर कभी नहीं छोड़तीं, वे अपना घर ‘ढूँढने’ निकलती हैं,” सुमित्रा जी की आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी।

अवनि की आँखों में फिर से पानी भर आया।

सुमित्रा जी ने अपनी कुर्सी खिसकाई और अवनि के पास आकर बैठ गईं। उन्होंने अवनि का हाथ अपने हाथों में ले लिया।

“मैं नहीं जानती वहां क्या हुआ, और न ही मुझे जानने की ज़रूरत है। लेकिन तेरी आँखों का खालीपन बता रहा है कि तुझे वहां वो नहीं मिला जिसकी तुझे उम्मीद थी। देख अवनि, मैं तेरी सगी माँ नहीं हूँ। न मैंने तुझे नौ महीने पेट में रखा। लेकिन जिस दिन तू इस घर की देहरी लांघ कर अंदर आई थी, उसी दिन मैंने तय कर लिया था कि यह घर अब मेरा नहीं, तेरा है।”

अवनि सिसकने लगी। “माँ जी… मुझे लगा था मायका ही सब कुछ होता है। लेकिन वहां… वहां मुझे लगा जैसे मैं कोई एटीएम मशीन हूँ। किसी को मेरी परवाह नहीं थी। मेरा कमरा, मेरी चीज़ें… सब पराया हो गया।”

सुमित्रा जी ने उसे अपने गले लगा लिया। अवनि अपनी सास के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोई। आज वह ‘बहू’ नहीं थी, आज वह एक टूटी हुई बेटी थी जिसे एक माँ संभाल रही थी।

“रो ले बेटा, जितना रोना है रो ले। दिल हल्का कर ले,” सुमित्रा जी ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा। “पर एक बात याद रखना। खून के रिश्ते नसीब से मिलते हैं, पर दिल के रिश्ते हम खुद बनाते हैं। हो सकता है वहां तुझे परायापन मिला हो, लेकिन यह घर… यह दीवारें, यह रसोई, यह आंगन… यह सब तेरा है। यहाँ तुझे अपनी जगह बनाने के लिए किसी को कुछ देने की ज़रूरत नहीं है। तू बस तू है, और इतना ही काफी है।”

अवनि को महसूस हुआ कि सुमित्रा जी की बाहों में जो गर्माहट है, वह उसे जन्म देने वाली माँ की बाहों से कहीं ज़्यादा सुकून देने वाली है। वहां अपेक्षाएँ थीं, यहाँ स्वीकृति थी। वहां शर्तें थीं, यहाँ समर्पण था।

“माँ जी,” अवनि ने सिसकियों के बीच कहा, “मुझे माफ कर दीजिए। मैं हमेशा सोचती थी कि ससुराल कभी मायके की जगह नहीं ले सकता।”

सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए उसके आँसू पोंछे। “पगली, ससुराल को मायके की जगह लेनी भी नहीं चाहिए। हर रिश्ते की अपनी जगह होती है। पर हाँ, ‘घर’ वही होता है जहाँ तेरा मन बिना किसी डर के, बिना किसी मुखौटे के साँस ले सके। अगर तुझे यहाँ सुकून मिलता है, तो यही तेरा असली घर है।”

उस रात, अवनि अपने बेडरूम में लेटी छत को देख रही थी। निशित गहरी नींद में था। अवनि ने महसूस किया कि उसके अंदर का तूफान अब शांत हो चुका है। उसे याद आया कि कैसे सुमित्रा जी ने उसके लिए कढ़ी बनाई थी क्योंकि वह जानती थीं कि अवनि जब भी उदास होती है, उसे कढ़ी-चावल पसंद आते हैं। उसे याद आया कि कैसे पिछले महीने जब वह बीमार थी, तो सुमित्रा जी ने पूरी रात जागकर उसके माथे पर पट्टियाँ रखी थीं।

मायके में उसे यह साबित करना पड़ रहा था कि वह एक अच्छी बेटी है—पैसे देकर, झुककर, अपनी इच्छाओं को मारकर। लेकिन यहाँ… यहाँ वह जैसी थी, वैसी ही स्वीकार्य थी।

सुबह हुई। सूरज की किरणें खिड़की से छनकर अंदर आ रही थीं। अवनि की नींद रसोई से आती बर्तनों की खनक से खुली। वह जल्दी से उठी और रसोई में गई।

सुमित्रा जी चाय बना रही थीं।

“अरे, तू क्यों उठ गई इतनी जल्दी? थोड़ी देर और सो लेती,” सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

अवनि ने जाकर पीछे से सुमित्रा जी को गले लगा लिया और उनके कंधे पर सिर रख दिया।

“नींद पूरी हो गई माँ। अपने घर में नींद बहुत अच्छी आती है।”

सुमित्रा जी के हाथ ठिठक गए। उनकी आँखों में नमी तैर गई। उन्होंने पलटकर अवनि का माथा चूमा।

“हाँ बेटा, अपने घर में ही सुकून मिलता है।”

उस दिन अवनि ने अपनी पुरानी डायरी में, जिसे वह मायके से नहीं ला पाई थी, एक नया पन्ना जोड़ा—मन के भीतर। उसने समझ लिया था कि घर किसी पते या शहर का नाम नहीं है। घर वह जगह है जहाँ आपको अपनी उपयोगिता साबित न करनी पड़े। जहाँ आपको ‘मेहमान’ नहीं, बल्कि ‘हिस्सा’ माना जाए।

कानपुर का वह घर, जहाँ उसका बचपन बीता था, अब एक यादों का एल्बम बनकर रह गया था। लेकिन पुणे का यह घर, जहाँ उसे पहले डर और संकोच लगता था, अब उसकी मज़बूत ज़मीन बन गया था। उसने महसूस किया कि रिश्तों के पौधे को खून से ज़्यादा ‘प्रेम’ और ‘सम्मान’ के पानी की ज़रूरत होती है।

उस शाम अवनि ने घर की नेमप्लेट पर लगी धूल साफ की। उस पर लिखा था—’सुमित्रा विला’। अवनि मुस्कुराई। उसने मन ही मन सोचा कि यह सिर्फ विला नहीं, यह उसकी छाँव है।

जब वह चाय लेकर बालकनी में बैठी, तो निशित ने पूछा, “अब कैसा लग रहा है?”

अवनि ने चाय की चुस्की ली और एक सुकून भरी मुस्कान के साथ कहा, “निशित, पता है? लोग कहते हैं बेटी पराया धन होती है। पर मुझे लगता है बेटी वहां की होती है, जहाँ उसे ‘धन’ नहीं, ‘इंसान’ समझा जाए। मेरा मायका पराया हो गया, पर देखो… मेरी ससुराल आज मेरा ‘घर’ बन गई।”

हवा का एक झोंका आया, जो ठंडक नहीं, एक मीठा एहसास लेकर आया था। अवनि को अब किसी पुराने कमरे या पुरानी चीज़ों का अफ़सोस नहीं था। क्योंकि उसे रिश्तों की नई और सच्ची परिभाषा मिल गई थी। वह समझ गई थी कि कोख का रिश्ता बड़ा होता है, पर कर्म और मर्म का रिश्ता उससे भी गहरा होता है।

मूल लेखिका :

करुणा मलिक

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