माता-पिता को सिर्फ रोटी और छत नहीं, प्यार और सम्मान चाहिए… – अर्चना खंडेलवाल

रमा और गोविंद जी भीतर ही भीतर घुट रहे थे, लेकिन उनकी घुटन से नेहा बिल्कुल बेखबर थी। उसे बस यही भरोसा था कि अब सास-ससुर उसके खिलाफ कोई फैसला नहीं ले सकते, क्योंकि बैंक खाते और प्रॉपर्टी के कागज़ उसी की पकड़ में थे। उसके लिए पैसा ताकत था—और ताकत के आगे रिश्ते अक्सर हार जाते हैं।

पिछली रात उसने पति अमित से भी कह दिया था, “देखो, तुम्हारे मां-बाप अब हमारे ऊपर हावी नहीं हो सकते। उनके पास विकल्प ही क्या है? घर हमारा, खर्च हमारा… और अगर ज्यादा बोले तो मैं तो कहती हूं इन्हें दूसरे बेटे के पास भेज दो।”

अमित ने सिर हिलाकर हामी भर दी थी। वह ऑफिस की थकान, पत्नी की तीखी बातें और घर के झंझट से बचने के लिए अक्सर चुप रहना ही ठीक समझता था। उसे लगता था कि दो-चार बातें सहकर घर चलता रहे तो क्या बुरा है।

लेकिन घर भीतर से कब टूटना शुरू हो जाता है, यह किसी को तब तक समझ नहीं आता जब तक छत सिर पर होती है और रसोई में गैस जलती रहती है।

अगली सुबह देर तक चाय नहीं आई। सात साल का बेटा वेद स्कूल बस के इंतज़ार में पेंसिल घुमाता बैठा था। टिफिन भी खाली पड़ा था। नेहा ने दो बार आवाज लगाई—कोई जवाब नहीं।

उसका पारा चढ़ गया। वह दनदनाती हुई सीधे रमा जी के कमरे की तरफ बढ़ गई। दरवाज़ा खुला था। अंदर गोविंद जी एक पुराना सूटकेस खोलकर कपड़े जमा रहे थे और रमा जी अलमारी से कुछ जरूरी सामान निकाल रही थीं। उनके चेहरे पर किसी तरह का शोर नहीं था, बस एक ठहरी हुई शांति थी—जैसे फैसला हो चुका हो।

नेहा की आवाज कमरे में चाबुक की तरह गूंजी, “ये क्या कर रहे हैं आप लोग? सुबह से चाय नहीं बनी है और वेद का टिफिन भी पैक नहीं हुआ! उसकी बस आने वाली है! आपको कुछ फिक्र है या नहीं?”

रमा जी ने धीरे से नेहा की तरफ देखा। आंखों में गुस्सा नहीं था, बस वह थकान थी जो अपमान के बाद आती है। वे हल्की-सी मुस्कान के साथ बोलीं, “बहू, अब तुम्हारा घर तुम जानो। तुम्हें अपने बेटे का टिफिन पैक करना है तो कर लो। ये घर तुम्हारी जिम्मेदारी है।”

नेहा को लगा जैसे किसी ने उसके नीचे से ज़मीन खींच ली हो। “क्या मतलब? आप लोग… सामान क्यों पैक कर रहे हैं?”

गोविंद जी ने सूटकेस बंद करते हुए कहा, “हम जा रहे हैं।”

“घर छोड़कर जा रहे हैं?” नेहा की आवाज ऊंची हो गई।

इसी वक्त पास वाले कमरे से अमित बाहर आया। “क्या हो रहा है?” उसने हड़बड़ाकर पूछा। जैसे ही उसने सूटकेस देखा, उसका चेहरा सख्त हो गया। “ये क्या नाटक है? कहां जा रहे हो आप लोग?”

गोविंद जी उठ खड़े हुए। उनकी उम्र साठ पार थी, लेकिन आवाज में आज वर्षों बाद एक दृढ़ता थी। “नाटक नहीं है, अमित। फैसला है।”

अमित ने तिरछे स्वर में कहा, “फैसला? इस घर में आपको जगह मिली हुई है। और कौन रखेगा आपको? छोटा भाई तो आपकी खबर भी नहीं लेता। ये तो गनीमत है कि मैं आपको घर में रख रहा हूं, खाना दे रहा हूं।”

गोविंद जी की आंखों में एक पल के लिए जलन सी चमकी। फिर वह शांत होकर बोले, “हां बेटा, तू हम पर बहुत अहसान कर रहा है। खाना और छत तो हमें कहीं भी मिल जाएगी। लेकिन माता-पिता को सिर्फ रोटी और छत नहीं चाहिए। उन्हें प्यार और सम्मान चाहिए… वो तो हमें यहां कभी मिला ही नहीं।”

रमा जी ने हल्के से जोड़ दिया, “और बेटे, तू हमें रख नहीं रहा। तू तो उसी छत के नीचे रह रहा है, जो हमने अपनी जिंदगी की कमाई से बनाई थी। हमने इसे तुम्हारे नाम इसलिए किया था कि हमारा परिवार सुरक्षित रहे… हमने यह नहीं सोचा था कि वही कागज़ हमारे खिलाफ हथियार बन जाएंगे।”

नेहा बीच में कूद पड़ी, “हां तो क्या? घर आपके पैसे से बना, तो क्या हम पर एहसान करते रहेंगे? आप लोग तो बस हर बात में दखल देते हैं। और मैं घर चलाती हूं, बच्चे को संभालती हूं, काम वाली को देखती हूं—सब मैं करती हूं!”

रमा जी पहली बार थोड़ी कठोर हुईं, “घर चलाना और घर में राज चलाना—इन दोनों में फर्क होता है बहू। तुमने हमसे घर चलाने में मदद नहीं मांगी, तुमने हमें घर में बेइज्जत कर के रखा। चाय बनाना, टिफिन बनाना, तुम्हारे लिए काम था नहीं—तुम्हारे लिए ‘हमारा इस्तेमाल’ था।”

नेहा ने ताना मारा, “अरे वाह, अब आप लोग भावुकता दिखाएंगे? आपको पता है आजकल महंगाई क्या है? आप दोनों खाते हैं, खर्च बढ़ता है… फिर भी हम रख रहे हैं।”

गोविंद जी ने धीरे से सिर हिलाया, “ठीक है। अगर हम बोझ हैं, तो हम खुद अपना बोझ उठाएंगे। अब तुम अपना देखो, हम अपना।”

अमित के भीतर झुंझलाहट और डर दोनों उभर आए। “आप लोग ये ड्रामा करके मुझे अपराधी साबित करना चाहते हो, ताकि पड़ोस वाले कहें—देखो बेटा मां-बाप को घर से निकाल रहा है?”

गोविंद जी का स्वर भारी हो गया, “नहीं, अमित। निकाल तुमने नहीं, तुम्हारे घर के माहौल ने निकाला है। हर दिन ताने, हर बात पर चोट, हर छोटी बात में ‘तेरा-मेरा’… ये सब मिलकर इंसान का मन घर से बाहर कर देते हैं।”

रमा जी ने बेटे की तरफ देखा। “हमने तुम्हें बड़ा किया है। हमें पता है तुम बुरे नहीं हो। लेकिन तुमने चुप रहकर गलत को बढ़ावा दिया। बहू जब हमें ‘काम की मशीन’ समझती थी, तब तुम्हें कहना चाहिए था—‘ये मेरे मां-बाप हैं।’ तुमने नहीं कहा।”

अमित का चेहरा उतरा। वह कुछ बोलना चाहता था, पर शब्द नहीं मिले।

वेद स्कूल बैग लटकाए दरवाजे पर आ गया। “दादी… आप कहीं जा रहे हो?” उसकी मासूम आंखें सूटकेस पर टिक गईं।

रमा जी ने वेद को गोद में ले लिया। उसका माथा चूमकर बोलीं, “नहीं बेटा… दादी बस थोड़े दिन… बाहर रहेंगी।” उनकी आवाज कांप गई, लेकिन उन्होंने खुद को संभाल लिया।

नेहा ने घड़ी देखी। “बस की टाइमिंग हो रही है। टिफिन तो बना ही नहीं। अब क्या बच्चे को भूखा भेजूं?”

गोविंद जी ने नेहा की तरफ देखा—एकदम आखिरी बार समझाने की कोशिश करते हुए, “बहू, ये भी तो सोचो… अगर हमने तुम्हारे घर का काम नहीं किया तो तुम्हें अपना काम खुद करना पड़ेगा। यही तो गृहस्थी है। सास-ससुर को कामवाली समझकर रखोगी, तो एक दिन वो कामवाली भी छुट्टी ले लेगी।”

नेहा ने मुंह बनाया, “तो चले जाइए। मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

रमा जी ने धीरे से कहा, “फर्क पड़ेगा। बस आज नहीं, कल। जब वेद पूछेगा—मेरे दादा-दादी क्यों नहीं रहे? तब।”

गोविंद जी ने सूटकेस उठाया। “हमने एक छोटा सा घर किराए पर देख लिया है। ज्यादा दूर नहीं। हमारी पेंशन है। थोड़ा बहुत किराया भी आता है। हम अपना खर्च खुद उठा लेंगे। हम किसी पर बोझ नहीं बनेंगे।”

अमित ने झट से कहा, “ये सब दिखावा मत करो। आप लोग कहां रहोगे? कौन देखेगा? आपकी दवाई? आपकी उम्र…?”

गोविंद जी ने बेटे की तरफ देखा, “तू देखना चाहता है तो सम्मान के साथ देख। मजबूरी के साथ नहीं। हम अभी जा रहे हैं क्योंकि हमें इस घर में ‘अपना’ महसूस नहीं होता। और अपना महसूस कराना तुम्हारी जिम्मेदारी भी थी, बहू की भी।”

रमा जी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया। फिर नेहा की तरफ देखा—“बहू, काश तुमने हमें बस दो प्यार के बोल दे दिए होते। हम तुम्हारे दुश्मन नहीं थे। हम तो चाहते थे कि तुम भी बेटी की तरह इस घर में हंसो। लेकिन तुमने हमें बंधन समझा, और हमारे काम को अपना अधिकार।”

नेहा के चेहरे पर एक पल के लिए झेंप आई, फिर उसने खुद को सख्त कर लिया। “ठीक है, जाइए। लेकिन ये याद रखिए, घर का मालिक अमित है।”

गोविंद जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “मालिक वही होता है, जो घर संभाल सके। सिर्फ कागज़ पर नाम होने से कोई मालिक नहीं बनता। और घर पैसे से नहीं, रिश्तों से चलता है।”

वे दोनों दरवाजे की तरफ बढ़ गए। अमित ने एक कदम आगे बढ़ाकर कहा, “रुकिए… मैं आपको नहीं जाने दूंगा।”

रमा जी ने बेटे की तरफ देखा, “रोको मत बेटा। रोकने से रिश्ता नहीं बचता। रिश्ता बचता है—सम्मान से।”

वे निकल गए।

दोपहर में नेहा ने आनन-फानन में टिफिन बनाया, वेद को बस में बैठाया। घर में पहली बार उसे सच में एहसास हुआ कि काम वाली आएगी तो भी घर में खालीपन रहेगा। चाय का कप उसने खुद रखा, पर स्वाद नहीं आया। रात में जब अमित ऑफिस से लौटा तो न घर में रमा जी की हल्की खांसी थी, न गोविंद जी का अखबार पलटने की आवाज। बस दीवारों में एक सन्नाटा था।

अगले दो-तीन दिन नेहा ने ऐसे ही काटे। काम वाली कभी आती, कभी छुट्टी कर देती। वेद शाम को पूछता, “दादी कब आएंगी?” अमित चुप रहता। नेहा झल्लाती, “पढ़ाई कर!” पर अंदर कहीं कुछ चुभता था।

चौथे दिन स्कूल से वेद रोता हुआ आया। किसी बच्चे ने उसे कह दिया था—“तेरे दादा-दादी को तेरी मम्मी ने घर से निकाल दिया।”

वेद ने रोते-रोते नेहा से पूछा, “मम्मी, क्या आपने दादी को निकाल दिया?”

नेहा का गला सूख गया। उसने पहली बार महसूस किया कि बच्चों की नजर में ‘सही’ और ‘गलत’ पैसे से तय नहीं होता।

उसी शाम अमित ने पहली बार कड़े स्वर में कहा, “नेहा, अब बस। मैं मां-पापा से मिलने जा रहा हूं। और अगर तुम्हें ये घर बचाना है, तो चलो मेरे साथ।”

नेहा ने तड़पकर कहा, “मैं… मैं क्यों जाऊं?”

अमित ने शांत मगर सख्त आवाज में कहा, “क्योंकि गलती हम दोनों की है। मां-पापा को हमने सम्मान नहीं दिया। और अब अगर हम नहीं सुधरे, तो वेद हमारे हाथ से निकल जाएगा—वो भी रिश्तों की कड़वाहट सीखकर।”

नेहा के भीतर कोई जिद टूटने लगी। वह चुपचाप तैयार हुई और अमित के साथ उस छोटे से किराए के घर के बाहर पहुंच गई।

दरवाजा खोला तो गोविंद जी सामने थे। उनका चेहरा थका था, पर आंखों में आत्मसम्मान की चमक थी। रमा जी अंदर से निकल आईं। वे नेहा को देखकर ठिठक गईं।

नेहा की आवाज पहली बार धीमी थी, “मम्मी जी… पापा जी… मैं… मैं माफी मांगने आई हूं।”

रमा जी की आंखें भर आईं। “माफी? इतनी आसानी से?”

नेहा ने सिर झुका लिया। “आसान नहीं है। पर वेद… वो रोया। उसे लगा मैंने उसका प्यार छीन लिया। मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा मुझे गलत समझे। और… सच कहूं तो… घर सच में खाली लग रहा है।”

गोविंद जी ने गहरी सांस ली। “खालीपन तब समझ आता है, जब अपने दूर चले जाते हैं।”

अमित आगे बढ़ा, “पापा, मां… मैं भी माफी चाहता हूं। मैं चुप रहा। मैंने गलत को रोकने के बजाय उसे बढ़ने दिया।”

रमा जी ने बेटे का हाथ पकड़ लिया, “बेटा, हमें घर वापस चाहिए नहीं… हमें परिवार वापस चाहिए।”

नेहा की आंखों से आंसू बहने लगे। “मैं सीख रही हूं… मुझे समय दीजिए। मैं वादा करती हूं—अब आप मेरे लिए ‘काम’ नहीं होंगे, आप मेरे लिए अपने होंगे। और… मैं वेद से आपका रिश्ता नहीं तोड़ूंगी।”

गोविंद जी ने धीरे से कहा, “ठीक है। हम वापस तभी आएंगे, जब घर में ‘इज्जत’ की जगह बनेगी। हम तुम्हारे गुलाम नहीं, तुम्हारे बुजुर्ग हैं। और बुजुर्गों को सिर्फ खाना नहीं… सम्मान चाहिए।”

नेहा ने सिर हिलाया। “मैं समझ गई।”

उस रात रमा जी ने वेद के सिर पर हाथ फेरा। वेद ने झट से उनके गले लगकर कहा, “दादी, घर चलो ना।”

रमा जी की आंखों से आंसू टपक पड़े, “चलेंगे बेटा… धीरे-धीरे।”

और उसी “धीरे-धीरे” में पहली बार उस परिवार को उम्मीद दिखी—कि पैसा ताकत जरूर होता है, लेकिन घर की असली ताकत वही है जो रिश्तों को जोड़कर रखे, तोड़े नहीं।

मूल लेखिका 

अर्चना खंडेलवाल 

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