शादी या समझौता – अर्चना खंडेलवाल

“तू पढ़-लिख गई, नौकरी कर रही है, अपने पैरों पर खड़ी है—बहुत अच्छा,” माँ ने चाय का कप टेबल पर रखते हुए कहा, “पर जीवन सिर्फ अपने दम पर चल लेने का नाम नहीं है। हर स्त्री को कभी न कभी किसी का साथ चाहिए होता है। और तुझे शादी करनी होगी।”

अदिति ने लैपटॉप की स्क्रीन से नज़र हटाए बिना हल्के से कहा, “माँ, मुझे ‘किसी का’ साथ चाहिए, ‘किसी पुरुष का सहारा’ नहीं। और मैं किसी से कम नहीं हूँ।”

“अरे, सहारा और साथ में फर्क है,” माँ ने तुरंत बात पकड़ी। “तेरी मामी की सहेली आज शाम को आ रही है—पति और बेटे के साथ। लड़का मुझे पसंद है, और तुझे भी पसंद करना है।”

अदिति की उंगलियाँ कीबोर्ड पर रुक गईं। “आप फिर शुरू हो गईं? और वैसे भी… उस लड़के का पैकेज कम है। आपसे मेरी पहले ही बात हो चुकी है, मुझे वो पसंद नहीं।”

माँ ने उसके सामने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा, “तूने उसे देखा कहाँ है? सिर्फ पैकेज सुनकर मना कर दिया। जब तू कहती है कि तू अपनी इच्छाएँ खुद पूरी कर सकती है, तो लड़का कम या ज्यादा कमाए, उससे तुझे फर्क क्यों पड़ना चाहिए? और सुन—मैं और तेरे पापा ने उसे पसंद कर लिया है। शाम को तैयार हो जाना।”

अदिति ने एक गहरी सांस ली। उसे यह बहस पुरानी लग रही थी, मगर हर बार नए तरीके से शुरू हो जाती थी। उसने करियर में बहुत मेहनत की थी—स्टार्टअप में प्रोडक्ट मैनेजर, नई-नई जिम्मेदारियाँ, तेज़ काम, बड़ा सपना। उसे अपनी आज़ादी से प्यार था। शादी की बात उसे डराती नहीं थी, लेकिन “दबाव” उसे चुभता था।

“माँ, आप मुझे पसंद करने के लिए क्यों मजबूर करती हैं?” वह धीमे स्वर में बोली।

माँ ने नरम पड़ते हुए कहा, “मजबूर नहीं कर रही। बस… तेरे लिए अच्छा चाहती हूँ।”

शाम हुई। घर में हलचल बढ़ गई। पापा ने ड्रॉइंग रूम ठीक करवाया, माँ ने स्नैक्स तैयार किए। अदिति ने अनमने मन से हल्का सा सूट पहना और बालों को सलीके से बांध लिया। मन में उसने ठान लिया था—मैं बस औपचारिकता निभाऊँगी, फिर साफ़ मना कर दूँगी।

डोरबेल बजी।
माँ ने जल्दी से दरवाज़ा खोला।

सामने एक साधारण सा परिवार था—सुसंस्कृत, शांत, बिना शोर। लड़का, जिसका नाम ‘समीर’ था, गहरे रंग की शर्ट में बिल्कुल आम-सा दिख रहा था, लेकिन उसकी आँखों में अजीब-सी स्थिरता थी। वह बैठते ही नम्रता से बोला, “नमस्ते अंकल-आंटी, आपको परेशान किया, रास्ते में थोड़ा ट्रैफिक था।”

“अरे नहीं, कोई बात नहीं,” पापा मुस्कुराए।

माँ ने चाय-पानी पूछा। बातचीत शुरू हुई—परंपरागत सवाल नहीं, बल्कि सामान्य बातें। समीर की माँ ने अपनी बहू के बारे में बातें नहीं कीं, बल्कि अदिति के काम में दिलचस्पी दिखायी। “आप प्रोडक्ट में हैं? बहुत अच्छा। मेरे बेटे को भी टेक पसंद है,” कहकर उन्होंने अदिति को सहज कर दिया।

अदिति ने खुद को हैरान पाया। कोई ताना नहीं, कोई ‘कितना कमाती हो’ नहीं, कोई ‘कितने बजे घर आती हो’ नहीं। समीर भी कम बोल रहा था, लेकिन जब बोलता तो बात में वजन होता।

कुछ देर बाद माँ ने संकेत से कहा, “तुम दोनों थोड़ा बात कर लो।”
अदिति और समीर बालकनी में आ गए।

सड़क की हल्की आवाज़, ऊपर खुला आसमान। अदिति ने तय किया कि अभी ही साफ कर दूँ।

“देखिए समीर,” उसने सीधे कहा, “मेरी सैलरी… ठीक-ठाक नहीं, काफी ज्यादा है। मुझे पता नहीं आपका पैकेज कितना है, पर जो भी है—मम्मी ने कहा था कम है। मुझे ये पूछना जरूरी लगता है… क्या आपको इससे हीनता महसूस होगी?”

समीर जैसे चौंका नहीं, बस हल्का सा मुस्कुराया। “ये सवाल मुझे बुरा भी लग सकता था,” उसने कहा, “पर मैं समझता हूँ कि आप क्यों पूछ रही हैं। कई बार महिलाओं को अपने ही घर में अपने काम का मूल्य साबित करना पड़ता है।”

अदिति ने उसकी तरफ देखा।

समीर ने आगे कहा, “मैं एक सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हूँ। मेरी कमाई फैंसी नहीं है। पैकेज की भाषा मेरे क्षेत्र में नहीं चलती। लेकिन मैं अपने काम से खुश हूँ। मुझे अपना पेशा सम्मान देता है… और मैं चाहता हूँ कि मेरे घर में मेरी पत्नी के काम को भी उतना ही सम्मान मिले।”

अदिति के भीतर जैसे एक कठोर परत पिघली। “पर लोग…” वह बोलते-बोलते रुक गई।

“लोग क्या?” समीर ने उसके वाक्य को पूरा किया। “लोग ये कहेंगे कि लड़की ज्यादा कमाती है? या ये कि लड़का कम कमाता है? लोग तो हर हाल में कुछ न कुछ कहेंगे। सवाल यह है कि हम अपने रिश्ते में किसे जगह देंगे—लोगों को या एक-दूसरे को?”

अदिति को लगा जैसे किसी ने उसके मन की सबसे पुरानी उलझन को छू लिया हो।

“आपके घर में… मेरी आज़ादी?” उसने फिर पूछा, इस बार आवाज़ में बचाव नहीं, ईमानदारी थी।

समीर ने कहा, “आजादी का मतलब मनमानी नहीं, भरोसा है। आप अगर मीटिंग के लिए देर से लौटेंगी, मैं आपका रास्ता नहीं रोकूंगा। आप अगर प्रमोशन के लिए शहर बदलना चाहेंगी, हम बात करेंगे। और अगर कभी मेरा करियर आपको पीछे खींचेगा, तो हम मिलकर रास्ता निकालेंगे।”

अदिति ने धीरे से कहा, “और अगर शादी के बाद मेरी सैलरी और बढ़ गई…?”

समीर ने हल्की हँसी के साथ कहा, “तो हम केक काटेंगे। और क्या?”
फिर गंभीर होकर बोला, “रिश्ते पैसे से नहीं, समझदारी से चलते हैं। पैसे सिर्फ सुविधाएँ देते हैं, सम्मान नहीं। सम्मान रोज़-रोज़ के व्यवहार से बनता है।”

अदिति को पहली बार लगा कि उसे कोई “कन्विंस” नहीं कर रहा, बस “समझ” रहा है। उसकी आँखें पल भर को नम हुईं। उसने खुद को संभालकर कहा, “मैं शादी के नाम से डरती नहीं हूँ… मैं उस सोच से डरती हूँ जहाँ मेरे सपने शादी के बाद ‘एडजस्ट’ कहलाने लगते हैं।”

समीर ने कहा, “सपने एडजस्ट नहीं होते, सपनों का साथ दिया जाता है। और अगर कभी आपको लगे कि मैं उस साथ में कम पड़ रहा हूँ, आप मुझे बोल दीजिए। चुप मत रहिएगा।”

यह वाक्य अदिति को अंदर तक छू गया। “चुप मत रहिएगा”—वही तो वह चाहती थी। एक ऐसा रिश्ता जहाँ उसे अपने मन की बातें छुपानी न पड़ें।

अंदर ड्रॉइंग रूम में बातचीत अब भी चल रही थी। समीर के पिता ने पापा से कहा था, “हम दिखावे में नहीं, संस्कार में भरोसा रखते हैं। लड़की की पढ़ाई और नौकरी हमारे लिए गर्व की बात है।”

अदिति और समीर वापस अंदर आए तो माँ ने अदिति की आँखों में कुछ बदला हुआ देखा। वह समझ गई कि बेटी का ‘ना’ इतना आसान नहीं रहा।

रात को मेहमान चले गए। माँ रसोई में बर्तन रखने लगी, और अदिति अपने कमरे में आकर बिस्तर पर बैठ गई। लैपटॉप बंद था। पहली बार उसे लगा कि उसके भीतर कोई फैसला खुद-ब-खुद आकार ले रहा है, बिना दबाव के।

माँ ने दरवाजा खटखटाया। “अदिति?”

“आ जाइए,” अदिति ने कहा।

माँ अंदर आई और धीरे से पूछा, “कैसा लगा?”

अदिति ने कुछ देर चुप रहकर कहा, “माँ… वो अच्छा इंसान है।”
फिर उसने जोड़ दिया, “और ये बात मैं पैकेज देखकर नहीं कह रही।”

माँ के चेहरे पर राहत आ गई, लेकिन उसने तुरंत उत्साह नहीं दिखाया, जैसे डर रही हो कि कहीं बेटी पलट न जाए। “तो…?”

अदिति ने सिर झुकाकर कहा, “मैं हाँ कहने के लिए तैयार हूँ… लेकिन एक शर्त पर।”

माँ चौंकी। “क्या शर्त?”

“शादी के बाद भी मेरा करियर मेरा रहेगा,” अदिति ने साफ कहा। “मेरे फैसले मैं खुद लूँगी। और अगर किसी दिन मुझे लगे कि मेरे सपने दब रहे हैं, तो मैं बोलूँगी—और समीर सुनेंगे। बस… यही शर्त है।”

माँ ने उसकी पीठ थपथपाई। “ठीक है। मैं भी यही चाहती हूँ कि मेरी बेटी खुश रहे। और मैं मानती हूँ—तुझे साथ चाहिए, सहारा नहीं।”

अदिति ने पहली बार माँ की बात पर बिना प्रतिरोध के सिर हिलाया। उसे लगा, माँ भी बदल रही है—या शायद माँ हमेशा से ही चाहती थी, बस शब्दों में ठीक से कह नहीं पाती थी।

अगले दिन समीर का मैसेज आया—“कल की बातचीत अच्छी लगी। कोई भी सवाल हो, पूछिएगा।”
अदिति ने पहली बार जवाब लिखा—“मुझे भी अच्छा लगा। और हाँ… मैं चुप नहीं रहूँगी।”

कुछ हफ्तों बाद सगाई तय हुई। रिश्तेदार आए, किसी ने फुसफुसाकर कहा, “लड़का कम कमाता है।”
माँ ने पहली बार जवाब दिया, “कमाई से घर नहीं, समझ से घर चलता है।”
पापा ने हँसकर जोड़ दिया, “और हमारी बेटी तो कमाएगी ही—पर अब अकेले नहीं, साथ में।”

अदिति ने दूर से यह सुना तो उसे हँसी भी आई और आँखें भी भीग गईं। उसे लगा, यह जीत किसी लड़के को चुनने की नहीं है—यह जीत उस सोच को चुनने की है जहाँ स्त्री का सम्मान उसके वेतन से नहीं, उसके अस्तित्व से तय होता है।

सगाई के दिन समीर ने बस एक छोटा सा वाक्य कहा, जब अदिति ने अंगूठी पहनी—
“तुम्हारे सपने मेरे लिए जिम्मेदारी नहीं, प्रेरणा हैं।”

अदिति ने मन ही मन कहा—अब शादी “समझौता” नहीं, “साथ” बनेगी। और इस बार वह अपने ही घर में, अपने ही फैसलों के साथ, सिर उठाकर जिएगी।

मूल लेखिका : अर्चना खंडेलवाल

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