“दीदी, मैं तुम्हें रोक नहीं रहा… बस सच बता रहा हूँ,” राघव ने शांत आवाज़ में कहा, “तुम नौकरी करती हो, अपने पैरों पर खड़ी हो—ये बहुत अच्छी बात है। लेकिन जीवन सिर्फ अपने पैरों पर खड़े होने से नहीं चलता। जीवनसाथी और परिवार भी चाहिए। कल को मेरी शादी हो जाएगी, मैं अपने घर में व्यस्त हो जाऊँगा।
मम्मी-पापा की उम्र भी हो रही है। फिर मेरी शादी में मेरी बहन ही मेरे नेग-चार नहीं करेगी, तो कौन करेगा? मैं नहीं चाहता कि मेरी शादी में सब लोग तुम्हें घूरें, ताने दें, सवाल करें। मैं चाहता हूँ कि मेरी शादी में मेरी दीदी हँसते हुए, आत्मसम्मान के साथ मायके आए।”
नीरजा ने राघव के चेहरे को देर तक देखा। उसका छोटा भाई अब बच्चा नहीं रहा था। उसकी बातों में अपनी बड़ी बहन के लिए चिंता थी।
नीरजा ने वर्षों से सबके सामने अपना दुख नहीं बताया था, मगर कुछ बातें ऐसी होती हैं जो चेहरे पर लिखी रहती हैं। तलाक के बाद नीरजा ने जैसे अपना जीवन दो हिस्सों में बाँट लिया था—एक ऑफिस की वाली नीरजा, और दूसरी घर में सबकी “समझदार” बेटी, जो परिवार की खुशियों के खातिर चुप रहकर सब सह लेती है।
“राघव, मैं किसी के ताने से डरकर शादी नहीं कर रही,” नीरजा धीरे से बोली। “मैं बस… थक गई हूँ। हर रिश्तेदार मुझे ऐसे देखता है जैसे मैं मायके मे बोझ हूँ । कभी-कभी लगता है मैं अपने ही घर में मेहमान बन गई हूँ।”
राघव उसकी हथेली अपने हाथ मे लेते हुये कहा “तो फिर दीदी… अब अपने लिए सोचो। लोगों को जवाब देने के लिए नहीं—अपने मन को सुकून देने के लिए।”
उस रात नीरजा बहुत देर तक जागती रही। उसे अपना बीता हुआ समय याद आया—वो शादी जो जल्दबाज़ी में हुई थी, वो रिश्ता जो बाहर से सही दिखता था पर अंदर से खोखला था, और वो तलाक जिसके बाद दुनिया ने उसे लाचार और , “कमज़ोर” समझ लिया। उसने खुद को संभाला, नौकरी में खुद को झोंक दिया, लेकिन मन के किसी कोने में खालीपन अब भी रहता था। वह तय कर चुकी थी कि कोई भी फैसला “दूसरों की जुबान” के लिए नहीं होगा—पर सच यह भी था कि आत्मसम्मान हर इंसान को चाहिए, और वह चाहती थी कि उसके भाई की शादी में उसका सिर झुका न रहे।
अगले दिन सुबह नीरजा ने माँ से कहा, “माँ… अगर सही इंसान मिले, तो मैं शादी के लिए तैयार हूँ।”
माँ के चेहरे पर यह खबर सुन बहुत शुकुन नजर आया । यह खबर सुन पिताजी ने कहा , “तुम सच में तैयार हो?”
नीरजा ने सिर हिलाया। “हाँ… पर इस बार मैं अपना फैसला खुद लूँगी।”
राघव इस काम में लग गया जैसे वह किसी मिशन पर हो। उसने रिश्ते देखे, बात की, मिलने का तय किया। कई लोग बड़े सभ्य बनकर आते, लेकिन उनके सवालों में छिपी कठोरता नीरजा को साफ दिख जाती—“पहले तलाक क्यों हुआ?” “आपके अंदर कमी तो नहीं?” “आप दोबारा एडजस्ट कर पाएँगी?”
नीरजा हर बार मुस्कुराकर जवाब देती और फिर घर आकर शांत हो जाती। राघव उसकी चुप्पी समझता था, इसलिए ज़ोर नहीं डालता। वह बस कहता, “दीदी, सही इंसान आएगा… और वो तुम्हें जज नहीं करेगा।”
काफी दिन बीत गए। घर में धीरे-धीरे वही पुरानी बातें उठने लगीं—“अब कौन करेगा इससे शादी?” “लड़की उम्र निकालती जा रही है।” “वो नौकरी करती है, पर घर संभालेगी क्या?”
नीरजा के कानों में ये बातें काँटे की तरह चुभतीं, लेकिन वह बाहर से शांत रहती। उसे बस एक ही चीज़ की तलाश थी—सम्मान। सहानुभूति नहीं, उपकार नहीं, सिर्फ बराबरी का सम्मान।
एक शाम जब राघव ऑफिस से लौटा, उसका चेहरा चमक रहा था। “दीदी… एक कॉल आया है।”
“फिर कोई रिश्ता?” नीरजा ने हल्की थकान से पूछा।
“नहीं,” राघव ने कहा,
उसने स्पीकर ऑन किया। दूसरी ओर से आवाज़ आई, “नमस्ते… मैं कबीर बोल रहा हूँ। मैं नीरजा जी को कॉलेज के दिनों से जानता हूँ। हम दोनों एक ही बैंक में हैं। मुझे उनका पहला विवाह और तलाक—सब पता है। मैं उनकी इज्ज़त करता हूँ, और चाहता हूँ कि अगर वो चाहें तो मैं उनके जीवन में साथी बनकर रहूँ। मैं उन्हें खुश रखूँगा, और सबसे ज़रूरी—मैं उन्हें अपने घर में आत्मसम्मान के साथ रखूँगा ।”
नीरजा को लगा जैसे किसी ने उसके मन पर जमी धूल धीरे से हटाई हो। कबीर की आवाज़ में दिखावा नहीं था। न कोई “दया” की झलक, न किसी तरह की जल्दबाज़ी। सिर्फ सादगी और साफ़ इरादा।
राघव ने फोन काटा तो नीरजा चुप थी।
“दीदी?” राघव ने पूछा।
नीरजा ने धीरे से कहा, “मुझे उससे मिलना है… पर एक शर्त पर।”
“क्या?”
“मैं अपनी पूरी बात साफ़-साफ़ रखूँगी। मैं किसी के एहसान पर जिंदगी नहीं जीना चाहती। अगर वो मुझे बराबरी से देखता है, तभी आगे बढ़ूँगी।”
दो दिन बाद नीरजा और कबीर एक कैफे में मिले। कबीर साधारण कपड़ों में था, आँखों में एक स्थिर आत्मविश्वास। नीरजा ने औपचारिक बातें किए बिना सीधे कह दिया, “कबीर… मैं तलाकशुदा हूँ। मेरा अतीत है। और मैं उसे छुपाकर नहीं जीऊँगी। मुझे कोई ऐसा इंसान चाहिए जो मुझे अपना ‘साथी’ समझे।”
कबीर ने बिना हड़बड़ाए जवाब दिया, “ नीरजा। तुम्हारा अतीत तुम्हारी सच्चाई है, और सच्चाई से डरना मुझे नहीं आता। मुझे बस ये जानना है—तुम अपने भविष्य से क्या चाहती हो?”
नीरजा ने पहली बार किसी पुरुष के सामने खुद को छोटा महसूस नहीं किया। वह बोली, “मैं सम्मान चाहती हूँ। और मैं नौकरी नहीं छोड़ूँगी। मैं घर भी बनाऊँगी, पर अपनी पहचान मिटाकर नहीं।”
कबीर मुस्कुराया। “मुझे एक साथी चाहिए था, और उसके लिए मुझे लगता है तुम परफेक्ट हो । तुम नौकरी करती हो—ये तुम्हारी ताकत है। और अगर कभी थक जाओ, तो मैं तुम्हारे कंधे बनूँगा… बस यही रिश्ता होना चाहिए।”
उस दिन नीरजा को एहसास हुआ कि दुनिया मे हर इंसान एक जैसा नहीं होता । मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू हुआ। एक महीना… फिर दूसरा। नीरजा ने कबीर को करीब से देखा—वह झूठे वादे नहीं करता था, निभाने की आदत रखता था। छोटी-छोटी बातों में उसका सम्मान दिखाई देता—कॉल करने से पहले मैसेज, नीरजा के काम के समय का ध्यान, उसकी राय को अहमियत।
लेकिन जब कहानी मे क्लाइमेक्स ही न तो फिर कहानी कैसी कबीर तो तैयार था लेकिन कबीर के घरवाले राजी नहीं थे। वह उनका इकलौता बेटा था। “तलाकशुदा लड़की लड़की से उसकी माँ ने अपने बेटे कि शादी करने से साफ साफ मना कर दिया , “लोग क्या कहेंगे? हमारे रिश्तेदार को हम कैसे मुँह दिखाएँगे?”
कबीर ने आज पहली बार अपने घरवाले के सामने आवाज़ ऊँची की, “लोग मेरे घर नहीं चलाएंगे, माँ। मैं चलाऊँगा। और मैं शादी नीरजा से ही करूँगा।”
कबीर के पिता ने नरमी से समझाने की कोशिश की, “बेटा, सोच-समझकर…”
“मैंने सोच लिया है,” कबीर ने कहा, “मैं उस इंसान के साथ रहना चाहता हूँ जो मेरे साथ ईमानदार है। और नीरजा ईमानदार है।”
नीरजा को जब यह सब पता चला, तो उसने कबीर से कहा, “मैं नहीं चाहती कि तुम अपने घर से लड़कर मुझसे शादी करो । मैं तुम्हारे परिवार कि दुश्मन नहीं बनना चाहती।”
कबीर ने जवाब दिया, “मैं लड़ नहीं रहा, नीरजा। मैं अपने परिवार को समझा रहा हूँ कि सम्मान से बड़ा कुछ नहीं। और तुम मेरे लिए सम्मान हो।”
एक दिन कबीर के माता-पिता ने नीरजा को मिलने बुलाया। नीरजा उनके सामने सिर झुकाकर नहीं बैठी, बल्कि सहजता से बैठी। उसने अपनी बात साफ रखी—“मैं आपकी बहू बनूँगी, पर आपकी इज्ज़त भी रखूँगी और अपनी भी। मैं आपसे सिर्फ इतना चाहती हूँ कि मुझे अतीत से नहीं, वर्तमान से तौलें।”
कबीर की माँ ने उसकी आँखों में देखा। शायद उन्हें पहली बार समझ आया कि तलाक “दाग” नहीं, कभी-कभी गलत रिश्ते से बाहर निकलने की हिम्मत होती है।
आखिरकार वे मान गए। शादी सादगी से हुई—ना बड़े तामझाम, ना दिखावा। नीरजा ने शादी वाले दिन भारी गहने नहीं पहने, बस एक हल्की-सी लाल साड़ी और माथे पर छोटा सा बिंदी। उसने खुद को दुल्हन नहीं, बल्कि जिंदगी की नई शुरुआत की तरह देखा।
कबीर के घर में कदम रखते ही नीरजा ने सबसे पहले मंदिर में दीपक जलाया और फिर सास के पैर छुए। सास ने उसके सिर पर हाथ रखा तो नीरजा की आँखों में नमी आ गई। वह नमी डर की नहीं थी, अपनापन मिलने की थी।
कुछ महीनों बाद नीरजा के भाई राघव की शादी तय हो गई। घर में फिर चहल-पहल शुरू हो गई। वही चाची, वही रिश्तेदार, वही पड़ोसी—जिनकी जुबानें पहले नीरजा के पीछे ताने मारने के लिए खुलती थीं, अब तारीफ कर मुस्कुरा रहे थे।
राघव बार-बार कहता, “दीदी, इस बार तुम मेरी शादी में ऐसे आना कि कोई तुम्हें देखकर सवाल पूछने की हिम्मत न करे।”
नीरजा ने बस इतना कहा, “अब कोई सवाल पूछेगा भी तो फर्क नहीं पड़ेगा।”
राघव की शादी के दिन नीरजा अपने पति कबीर के साथ मायके पहुँची। हाथ में मिठाई का डिब्बा, चेहरे पर शांति। वह घर के अंदर ऐसे चली जैसे वह कोई बोझ नहीं, घर की रौनक हो। उसने भाई के सिर पर प्यार से हाथ रखा, भाभी का स्वागत किया, और माँ के पास बैठकर मेहमानों को संभाला।
चाची ने एक कोने में धीरे से कहा, “अरे, नीरजा तो बहुत निखर गई है…”
दूसरी रिश्तेदार बोली, “हाँ, लगता है सही घर मिल गया।”
नीरजा ने सब सुन लिया, पर उसके चेहरे पर कोई कटाक्ष नहीं आया। बस एक हल्की मुस्कान थी—क्योंकि अब उसे किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं थी।
फेरे शुरू होने से पहले राघव ने अपनी बहन की तरफ देखा। “दीदी… नेग-चार?”
नीरजा ने मुस्कुराकर थाल उठाया, टीका किया, और भाई के हाथ में शगुन रखा। उसकी उँगलियाँ काँपी नहीं। उसकी आँखें शर्म से झुकी नहीं। वह सीधे खड़ी थी—पर इस बार सिर्फ अपने पैरों पर नहीं, अपने सम्मान पर।
और अगली सुबह , नीरजा बालकनी में खड़ी होकर आसमान की तरफ देखने लगी। जीवन ने उसे दोबारा मौका दिया था—और इस बार वह मौका “समाज की जुबान बंद” कराने के लिए नहीं, अपने भीतर की टूटी हुई स्त्री को जोड़ने के लिए था।
कबीर उसके पास आया। “क्या सोच रही हो?”
नीरजा ने धीमे से कहा, “बस ये… कि आत्मसम्मान सच में इंसान की सोच बदल देता है ।
कबीर ने उसका हाथ थाम प्यार से गले लगा लिया ।”
नीरजा ने पहली बार महसूस किया—अब वह मायके भी आएगी, ससुराल भी रहेगी, और हर जगह… सिर ऊँचा रहेगा।
मूल लेखिका : अर्चना खंडेलवाल