आज सुबह से ही किशोरी के छोटे-से घर में लोगों का आना-जाना लगा हुआ था।सभी आकर उसे बधाई देते और कहते,” वाह किशोरी! तेरी बेटी ने तो कमाल कर दिया।” जवाब में वो सिर्फ़ मुस्कुरा देती क्योंकि वो जानती थी कि कल तक यही लोग तो मेरी बेटी को मर जाने की बद्दुआ देते रहे थे और आज…।
किशोरी आसपास के घरों में झाड़ू-बरतन का काम करती थी और उसका पति महतो रिक्शा चलाता था।ईश्वर ने उसकी गोद में दो बच्चे तो दिये थे लेकिन वो साल भर से अधिक जी नहीं पाए थे।फिर एक बेटी हुई तो वो बहुत खुश हुई लेकिन जब डाॅक्टर ने बताया कि उसकी बेटी अंधी पैदा हुई है तो उसका खिला चेहरा मुरझा गया।तब महतो बच्ची को गोद में लेकर बोला,” किशोरी…आज इसकी वजह से हम दोनों माता-पिता कहलाए हैं..बस भगवान इसे सलामत रखे।”
” लेकिन ये देख नहीं सकती तो कैसे..।” किशोरी के मस्तक पर चिंता की लकीरें देखकर महतो ने उसे विश्वास दिलाया,” ईश्वर पर भरोसा रख..सब ठीक हो जायेगा।”
फिर तो किशोरी बड़े जतन से अपनी बेटी स्मृति का पालन-पोषण करने लगी।परेशानियाँ तो बहुत आईं, लोगों ने उसे ताने भी बहुत दिये।उसे यह भी कहा गया कि बेटी को मार दे लेकिन सभी की बातों को अनसुना करके वो अपने पथ पर चलती रही।महतो तो काम से लौटता तो सबसे पहले बेटी को ही देखता और उसकी बातें सुनता।
धीरे-धीरे स्मृति अपना काम स्वयं करने लगी।वो पढ़ना चाहती थी लेकिन…।तब किशोरी ने अपने साहब की मदद से एक ब्लाइंड स्कूल में बेटी का दाखिला करवा दिया जहाँ वो मन लगाकर अक्षरों को पहचानना सीखने लगी।साथ ही,नई-नई चीजों को सीखने की उसकी उत्सुकता भी बढ़ती गई।
देखते-देखते स्मृति चौदह साल की हो गई।पढ़ाई के साथ-साथ वो कभी-कभी अपनी माँ के कामों में भी हाथ बँटाने लग गई थी।एक दिन किशोरी जब बेटी को स्कूल छोड़ने गई तब टीचर ने उसे रोककर कहा,” स्मृति की रुचि क्रिकेट खेलने में है।उसे सभी क्रिकेटर के नाम मालूम है और मैच की भी पूरी जानकारी है।किसी भी क्रिकेटर का नाम सुनती है तो उसकी पूरी जानकारी ज़बानी हमें बता देती है।क्या आप उसे क्रिकेट खेलने देंगी?”
” मेरी बेटी और क्रिकेट? ये कैसे हो सकता है मैडम..हम गरीब लोग इतना पैसा कहाँ से..?” किशोरी ने अपनी चिंता व्यक्त की।तब टीचर बोली,” आपको बस अनुमति देनी है और उसे मैदान तक ले जाना है, बाकी सारी व्यवस्था हमारी संस्था करेगी।” किशोरी तो खुशी-से फूली नहीं समाई।उसने बेटी को गले से लगा लिया।घर आकर महतो को बोली तो पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ।अगले दिन वो खुद बेटी के स्कूल गया और टीचर को बोला,” मैडम जी..आप जो कहेंगी, हम सब करेंगे।बस आप हमारी बिटिया की इच्छा पूरी कर दीजिये।उसके शब्दों में प्रार्थना थी और आँखों में खुशी के आँसू।
बस उसी दिन से स्मृति अपनी पढ़ाई के बाद का पूरा समय क्रिकेट के मैदान पर बिताने लगी।हालांकि मुहल्ले वाले अभी भी किशोरी और उसकी बेटी पर छींटे कसने से बाज नहीं आते थे लेकिन स्मृति उनपर कान न देकर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ती गई।भारतीय दृष्टिबाधित क्रिकेट संघ( Cricket association for blind in India) की तरफ़ से जब उसे uniform मिला तो उसे लगा जैसे उसके पैरों को पंख लग गये हों।उसका जिलास्तरीय क्रिकेट टीम में चयन हुआ। उसने चार मैच खेले और सभी में उसका प्रदर्शन प्रशंसनीय रहा।फिर उसका राज्यस्तरीय क्रिकेट टीम में चयन हुआ जहाँ उसके प्रदर्शन की खूब सराहना की गई।और फिर जब T20 world cup cricket की टीम में उसे शामिल किया गया तब तो…।उस दिन महतो पत्नी से बोला,” किशोरी…मैं कहता था ना कि भगवान पर भरोसा रखो…देखो, आज उन्हीं की कृपा से हमारी बेटी देश का नाम रौशन करने जा रही है…।”
” अच्छा..सब भगवान की कृपा..मेरी मेहनत कुछ नहीं…।” हँसते हुए स्मृति ने ठिठोली की तो उसके घर में हँसी के पटाखे फूटने लगे थे।
स्मृति की टीम जब सभी विरोधी टीम के छक्के छुड़ा कर फ़ाइनल में पहुँची तो पूरा देश महिला ब्लाइंड क्रिकेट टीम के विजयी होने की प्रार्थना करने लगे।स्मृति के माता-पिता के साथ-साथ बाकी खिलाड़ियों के माता-पिता भी उनकी सफलता की कामना करने लगे।
अंततः वो शुभ दिन आ गया, स्मृति की टीम ने विरोधी टीम को पराजित करके विश्वकप अपने नाम कर लिया और पूरे देश को संदेश दिया,” बेचारी नहीं हैं हम..अपने सपनों में उड़ान भरना जानते हैं हम!”
टेलीविजन पर स्मृति के विजयी होने और उसकी प्रशंसा देख-सुनकर ही लोग किशोरी को बधाई देने आ रहे थें।
जन्मांध होना कोई अभिशाप नहीं है।ईश्वर एक कमी देता है तो अन्य कई खूबियाँ भी देता है।उसी को निखार करके आगे बढ़ते रहना ही जीवन है।किशोरी और महतो ने भी अपनी बेटी की शारीरिक कमी को दोष न मानकर उसे संपूर्ण जीवन जीने की स्वतंत्रता दी।
विभा गुप्ता
स्वरचित, बैंगलुरु