कौन अपना, कौन पराया!” –  रूचिका राणा

 “देखा! मयूरविहार वाले जीजा जी का फोन अभी तक नहीं आया।” श्रीमान जी ने अपने मोबाइल की स्क्रीन को ऊपर नीचे स्क्रॉल करते हुए कहा।

     “आप से कब बात हुई थी उनकी….?”

   “मैंने ही किया था उस दिन हॉस्पिटल से, जिस दिन डिस्चार्ज होने वाला था।”

      “तो इसमें हैरानी वाली कौन सी बात है… जब आपकी सगी बहन को ही डेढ़ महीने तक आपकी खैर-खबर पूछने की फुर्सत नहीं मिली! वह तो फिर भी दूर के रिश्ते के ही बहनोई ठहरे आपके!” श्रीमती जी ने भी मौके पर चौक्का मारते हुए, श्रीमान जी को सुना ही दिया।

      “हां यार! और वह देखो किशोर….”

“कौन वो आपका दोस्त, जो आपके ही गांव का है….”

      “हां! पर अब रहता तो यहीं दिल्ली में ही है। जानती हो…. जब उसके पापा का ऑपरेशन हुआ था, पूरे दस दिन तक मैं उसे सुबह हॉस्पिटल छोड़ता था और शाम को खाना पहुंचाने भी मैं ही जाता था और वापसी में उसे घर भी छोड़ कर आता था। और यहां मुझसे मिलना तो दूर, एक बार फोन भी नहीं किया कि भाई तबीयत कैसी है…. जिंदा भी है या नहीं…. या कोई जरूरत तो नहीं है…. सब मतलब के यार हैं बस!”

       “तो इसमें कौन सी नई बात है!! आपने तो इस धरती पर जन्म ही लिया है पर-सेवा के लिए।” श्रीमती जी ने अब अवसर देखकर श्रीमान जी को लपेटे में ले ही लिया।

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       “तुम मेरा मजाक उड़ा रही हो!!” श्रीमान जी थोड़ा झुंझलाते हुए बोले।

      “मैं भला क्यों आप का मजाक उड़ाउंगी….” श्रीमती जी अपनी हंसी को दबाते हुए बोलीं।




       “नहीं! नहीं! तुम भी मजाक उड़ा लो मेरा….!” इस बार श्रीमान जी थोड़ा गुस्से में लगे, तो श्रीमती जी ने स्थिति को संभालते हुए कहा-  “तो क्या हुआ, अगर उन लोगों ने आपके बुरे समय में आपका साथ नहीं दिया… मैं तो थी न आपके साथ….बुरे समय में अपने ही काम आते हैं।” श्रीमती जी कुछ गंभीर होते हुए बोलीं।

     श्रीमान जी का मन थोड़ा पसीज गया। पास ही बैठी श्रीमती जी के थोड़ा और नजदीक खिसक आए और बोले-  “ठीक कहा तुमने, यह बुरा समय ही तो होता है…. जो हमें दिखा देता है कि वास्तव में कौन अपना है और कौन पराया। मैं निरा बुद्धू, बाहरी दुनिया को ही अपनी दुनिया समझता रहा। हमेशा बाहर वालों के लिए खुद को खर्च करता रहा…वह भी उस समय, जब मेरे परिवार को… मेरे बच्चों को… तुम्हें… मेरी ज्यादा जरूरत थी। अकेला छोड़ दिया मैंने तुम्हें अपने बच्चों को संभालने के लिए, हर उस मोड़ पर… जब तुम्हें मेरी जरूरत होती थी। जानती हो मुझे लगता था, कोई भी… अगर कोई भी…मुझसे कोई मदद मांगे, तो मैं उसे शिकायत का मौका न दूं। लेकिन मैंने कभी तुम्हारी शिकायतें नहीं सुनी, सब सुनकर भी अनसुना कर दिया। कैसे मैं गलती पर गलती करता रहा और तुम अकेले ही सब कुछ संभालती रहीं, मेरा घर… मेरे बच्चे…यहां तक कि मुझे भी! उस दिन जितनी सीरियस हालत थी मेरी, अगर तुम मुझे हॉस्पिटल न ले जाती, तो……!!!”

   “तो क्या…..? देखिए जी, ऐसा-वैसा ना बोलिए मेरे श्रीमान जी के लिए!” श्रीमती जी ने श्रीमान जी के होठों पर उंगली रख कर, उन्हें चुप कराते हुए कहा।

      एक हल्की-सी मुस्कान श्रीमान जी की होठों पर तैर गई और बोले- “बीमार था…बहुत बीमार था, पर मैं सब देख रहा था… तुम कैसे दो दिन तक, बिना कुछ खाए, इधर से उधर, कभी इस डॉक्टर के पास, तो कभी उस डॉक्टर के पास भागदौड़ कर रही थीं।”

      उस दिन को याद करके उन दोनों की ही आंखों में आंसू छलक आए।

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      “यही तो जिंदगी की सच्चाई है श्रीमान जी और इस दुनिया की भी। यहां काम की बातें समझ में आती हैं… पर देर से, धीरे-धीरे। कभी-कभी तो इतनी देर से कि हमारे पास पछतावा करने के अलावा और कुछ नहीं बचता। और जो मैं आपके लिए करती हूं न, यही तो होता है पति-पत्नी का रिश्ता। अगर दोनों में से कोई एक परेशानी में हो, तो दूसरे के गले से निवाला नहीं उतरता।” श्रीमती जी ने श्रीमान जी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा।

  “एकदम सही कहा आपने! अच्छी बातें जरा देर से समझ आती हैं और अब जब समझ में आ गई हैं, तो हम आपको वचन देते हैं कि हमारा बाकी का जीवन अब आप की खिदमत में ही गुजरेगा….” श्रीमान जी ने सोफे पर से उठ कर बड़े ही नाटकीय अंदाज में कहा तो श्रीमती जी अपनी हंसी रोक ना पाई।

_ समाप्त _

#अपने_तो_अपने_होते_हैं 

स्वरचित व सर्वाधिकार सुरक्षित, मौलिक

लेखिका – रूचिका राणा

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