दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद मंजू ने शहर जाकर आगे की पढ़ाई करने के लिए अपने बाबुजी से कहा।
” बाबुजी, मैं प्रतिमा की तरह छात्रावास में रहकर पढूँगी।”
प्रतिमा दूसरे गाँव की श्रीवास्तव परिवार की बेटी थी।
” अरे बेटा, उन लोगों की बात अलग है।…”
इतना ही बोल पाये कि दादी उधर से आकर लगी प्रवचन देने-
जब- तक शादी ब्याह हो नहीं जाता, तब- तक अकेले भला बाहर रहना… बाबा… रे.. बाबा। सोचना भी मत। फिर कहीं घर- वर नहीं मिला तो जीवन भर कुँआरी लड़की घर में बैठाना पड़ेगा।
मंजू को दादी की बात बिल्कुल बेतुकी लगी।
मंजू माँ के पास जाकर अपनी फरियाद सुनाने लगी।
माँ भी उसी राह की पथिक निकली।
” तुम्हें पढ़ना ही है न तो पढ़ो। प्रायवेट परीक्षा भी तो दे सकती हो?”
सभी ने माँ की बातों का समर्थन किया।……
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मंजू तीन भाइयों के बीच एकलौती बेटी थी। बड़ा भाई कुछ नहीं करता था। गाँव में ही रहता था, लेकिन मंजू के दो भाई शहर में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। पिता आर्थिक रूप से सम्पन्न थे- अच्छी खेती- बाड़ी के साथ सरकारी राशन- वितरण का काम भी करते थे।
मंजू उदास बैठी थी। भाभी ने उसके भारी मन को हल्का करने के लिए मजाकिया अंदाज में कहा-
“ननद रानी, बिना सिन्दूर पहरुआ के आप कहीं बाहर नहीं जा सकती। मांग का सिन्दूर एक सुरक्षा कवच है। अग्नि की तरह दहकता रहता है। नजदीक आने की किसी की हिम्मत नहीं होती।”
मंजू की आँखों से दो मोटे- मोटे आँसू गालों पर लुढ़क आए। मंजू सोचने लगी- क्या शहर जाकर पढ़ाई करने के लिए शादी करनी पड़ेगी? भैया लोग पढ़ रहे हैं और…
” भाभी, क्या आपको आगे पढ़ने की इच्छा नहीं थी?”
” अपनी इच्छा होने से क्या होता है?”
” अब तो आप पढ़ सकती है?”
” तुम्हारे भैया शादी के बाद आई.ए. करके छोड़ दिए और हमें पढ़ने देंगे?”
तब इस सिन्दूर का क्या फायदा जो जीवन में बाधक ही बने।”
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एक दिन मौका देखकर मंजू ने अपने बाबुजी से कहा-
” बाबुजी, आप भाभी को तो पढ़ा सकते हैं?”
बाबुजी चौक गये।
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“अरे तुम्हें खुद पढ़ना है या भाभी को पढ़ाना है।”
और हँसने लगे।
मंजू समझ गयी कि मेरी बात का मजाक बनाया जा रहा है।……
मंजू प्रायवेट रूप से अपनी पढ़ाई जारी रखी। शहर में पढ़ रहे भाइयों से उसे पूरा सहयोग मिला और वह स्नातक कर ही गयी। अच्छे नम्बरों से सफल हुई थी। जिस काँलेज से उसने फाॅर्म भरा था, उस काॅलेज के प्रिंसिपल भी इसकी सफलता से खुश थे कि प्रायवेट से पढ़ाई करके भी काॅलेज में पाँचवी स्थान पर है।
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अब मंजू की शादी के लिए लड़के की तलाश शुरू हो गयी। रूप- गुण से सम्पन्न मंजू की शादी एक इंजीनियर से हुई। काफी दान- दहेज के साथ बाबुजी ने अपनी बेटी को विदा किया।……….
शादी की पहली रात ही पति ने कहा-
” मेरे पिता जी ने जबरदस्ती शादी तुम से कर दी है। मैं किसी और से प्यार करता हूँ। तुम इस घर की बहू के साथ- साथ लोगों के लिए भी मेरी पत्नी रहोगी, लेकिन मैं दिल से तुम्हें अपना नहीं सकता हूँ।”
मंजू के सारे सपने उस सुहाग- सैया पर ही टूट कर बिखर गया। एक- एक कर सारे जेवर अपने शरीर से उतारने लगी और सोचती रही कि मेरे मांग का सिन्दूर तो उधार का है। क्या इस उधार के सिन्दूर में भी वही ताकत है?
दोनों पलंग के एक- एक किनारे पकड़कर सो गये। किसे नींद आई और किसे नहीं ये तो वही जाने।
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दरवाजे पर दस्तक हुइ,
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भाभी..भाभी…सुबह हो गयी, आप उठकर तैयार हो जाइए।…
फिर चिड़ियों की चहचहाहट सुन भोर होने का एहसास हुआ।….
नहाकर आईना के सामने चांदी की डिबिया लिए सोच रही रही है- आखिर इस उधार के सिन्दूर से कितना दिन अपनी मांग भरूँगी?
और वह बिना लगाए ही डिबिया को वापस स्थान पर रख दिया।
आज पहली रसोई की रस्म…
मंजू को सासू माँ रसोई घर में ले गयी।
” तुम सिर्फ खीर बना दो फिर मैं आकर सबकुछ देख लूँगी। हाँ खीर गुड़ में बनाना। ये सारी सामग्री है।”
कहकर जैसे ही मुड़ी, उसकी नजर मंजू की मांग पर पड़ी।
” अरे तुमने अपनी मांग नहीं भरी? रिश्तेदारों से घर भरा है, देखेंगे तो क्या सोचेंगे?”
मंजू खामोशी से सासू माँ को देखने लगी।
” तुम्हें नहाकर सबसे पहले अपनी मांग भरनी है। आज मैं भर देती हूँ ,कल से ध्यान रखना।”
कैसे कहती मंजू कि मैंने जानबूझ कर नहीं भरा। सास की खुशियों को आज ग्रहण लगाना नहीं चाहती थी।
एक- एक कर सारी रस्में पूरी होती गयीं और मंजू बदनाम होती गयी—–
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कैसी बहू है? सिन्दूर का महत्व ही नहीं समझती। रोज भूल जाना, ये तो सम्भव नहीं है। दिमाग की भी ठीक ही लग रही है। कहीं माँ- बाप ने जबरदस्ती तो…..
एक बार तो मंजू को मन हुआ कि मैं चिल्लाकर कह दूँ कि….
पर खामोश रही।
पाँच दिन बाद दुरागमन के लिए जाना था। उस दिन के बाद फिर कभी मंजू ने अपने पति से बात नहीं की। रात में दोनों पलंग के किनारों पर लेटे रात बिता देते थे।
मंजू अपने मायके गयी। सिन्दूर की डिबिया और शादी का ‘सिंहोरा’ मंजू ने ससुराल में ही छोड़ दिया था। माँ इस सब देखकर काफी हैरान हुई और बेटी को डांटने लगी।
आज मंजू अपने सारे गुब्बार निकाल देना चाहती थी–
सिन्दूर…जिस सिन्दूर को जीवन का सुरक्षा- कवच कहा जाता है। यदि वो सिन्दूर उधार का हो तो वह किसी का कवच बनने के बजाए उसके आत्मसम्मान पर बार- बार प्रहार करता रहता है। मुझे ऐसे सिन्दूर से अपनी मांग नहीं भरनी है।
मंजू की घोषणा सुन सभी स्तब्ध रह गये। मंजू ने सबकुछ बता दिया और साथ ही वहाँ दुबारा जाने से मना भी कर दिया।
इस घटना से मायके ससुराल वाले दोनों आहत हुए। मंजू के ससुर जी आकर क्षमा प्रार्थना करने लगे।….
मुझे माफ कर दो बेटी। वह मना कर रहा था, लेकिन कोई ठोस वजह नहीं बताया था। मुझे यह सब नहीं पता था। माफी माँगने से जो हो गया उसे तो बदला नहीं जा सकता है। ससुर जी अपने घर चले गये। पति भी अपनी नौकरी पर चला गया और मंजू मायके में परित्यक्ता का नाम लिए अपने भविष्य की योजना बनाने में व्यस्त हो गयी। इतना सब होने के बाद भी माँ- बाप यही चाहते थे कि मंजू सिन्दूर लगाना न छोड़े। मांग में सिन्दूर को देखकर कोई भी कुछ सवाल करने की हिम्मत नहीं करेगा।
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मंजू क्रोध से बिफर उठी।
” मैं ने कहा न कि मुझे सिन्दूर का कवच नहीं चाहिए। मैं अपनी रक्षा स्वयं कर सकती हूँ। मैं सबको स्वयं बताना चाहूँगी कि औरत किसी की मोहताज नहीं है। मैं ने नौकरी के लिए फाॅर्म भरा था, मुझे कल ही शहर जाना है। मैं किसी पर बोझ बनकर नहीं रह सकती।”
मंजू का फैसला सुनकर सभी अवाक रह गये।
स्वरचित
पुष्पा पाण्डेय
राँची, झारखंड।