सैरोगेट-माँ” – सीमा वर्मा

हरिहर पुर निवासिनी मृणाल की शादी हंसापुर के अमीर घराने के प्रभास जी से तब तय हुआ था जब वह पंद्रह वर्ष की थी।

और जिसे उस अपरिपक्व बच्ची ने अपने पिछले जन्म के किसी पुण्य कर्म का फल समझ कर सहर्ष स्वीकार कर लिया था।

विवाह की पहली शर्त होती है — समर्पण और समन्वय जिस पर आज भी हम दोनों ,

मैं मृणाल और मेरे पति प्रभासजी पूरी तरह से खरे उतरते हैं।

आज भी वे मेरे चेहरे को देख कर सब समझ जाते हैं। उन्हें कुछ भी पूछने की आवश्यकता नहीं होती।

बाकी की चीजें जो उनके पल्ले नहीं पड़ती हैं वे मैं उन्हें बता देती हूँ।

खैर ये तो आज के हालात हैं।

अब चलती हूँ,

उन दिनों में जब मैं अप्रतिम सौन्दर्य की मालकिन इस बड़े से हवेली नुमा घर की नयी बहू बन कर कदम रख रही थी।

फिजाओं में खुशबू तैर रही थी। मै सज – धज कर पूर्ण समर्पण करने कमरे में प्रभास जी का इन्तजार कर रही थी। 

हर चीज की तरह इंतज़ार के पलों का भी समापन हुआ।

जिसके कुछ ही घंटो मैं हवा में तैरती हुई से सीधे यथार्थ के कठोर जमीन पर आ गिरी।

यह तो बाद में एक बड़े रहस्य पर से पर्दा हटा था।

मैं बहुत जल्दी ही इस बात से अवगत हो गई कि ,

अपनी गृहस्थी की शुरुआत मैंने एक ऐसे आदमी के साथ की है जो निहायत गंभीर किस्म के दुखी और गमगीन इन्सान हैं कारण? 

“वे पुरुषोचित गुणों” से वंचित थे। 

ऐसा नहीं था कि परिवार वाले इस से अनभिज्ञ थे वरन् वे तो उनका इलाज करा के थक चुके थे ।

शायद इसी कारण से प्रथम रात्रि में ही मेरे किसी काम में बाधा ना डालते हुए उन्होंने मुझे पूर्ण स्वतंत्र करने की बात कही थी।



जरा सा भी कुछ नहीं छिपाते हुए बेहिचक मेरी आँख में आँख डाल कर सीधे-सीधे कह दिया था,

” मृणाल तुम मेरी तरफ से पूर्ण स्वतंत्र हो और जब जो चाहे कर सकती हो,

मैं नहीं चाहता तुम इन बातों से अनभिज्ञ रहो ,

तुम चाहो तो मुझे छोड़ कर भी जा सकती हो मैं सारी जिम्मेदारी अपने उपर ले लूंगा”।

फिर मैं चाह कर भी कहाँ कुछ कर सकी थी?

“ना ही छोड़ पाई ,ना ही परिस्थितियों का तिरस्कार कर पाई”

अति निर्धन परिवार से मैं और वे उच्च घराने के अमीर।

जाती भी कहाँ और किसके बल पर?”।

जबकि सच्ची वास्तविकता यह थी कि मुझे लाया ही गया था हवेली को वारिस देने की खातिर।

अब फूल को अगर खिलना है तो कंही, कैसे भी और किसी समय खिल सकता है?।

खैर मुझे हर पल यह आभास होता ऊपर से सब कुछ सामान्य रहते हुए भी कंही ना कंही मेरी हर गतिविधि पर निगाह रखी जाती।

कुछ दिनों के उपरांत एक संगीत के मास्टर साहब मुझे संगीत सिखाने आने लग गए थे। 

फिर एक दिन सासु मां मेरे कमरे में आ कर दबी और महीन आवाज में मुझे समझाते हुए बोली,

” देखो मृणाल मैं चाहती हूँ,

तुम मुझे हवेली का वारिस दो।

लेकिन मैं शुद्धता वादी हूँ हमारी एक एलीट क्लास है धन सम्पत्ति में भी हम कुबेर हैं,

बुद्धि कौशल में भी हमारा वर्चस्व बना हुआ है”।

और इस तरह के असंख्य उदाहरण तुम्हें मिल जाएगें तो बस जरा अपनी आंख और कान खुले तथा जबान का कम इस्तेमाल करना”।

मांजी अपनी जगह पर सच्ची थीं।

उनके नामी खानदान को लेकर कही उनकी सारी बातें अक्षरश सत्य थीं।

और ऐसी बड़ी- बड़ी बातें मैं नहीं जानती थी सो चुपचाप बस उनके आगे दोनों हाँथ जोड़ दिए थे।

इसके कुछ ही दिनों बाद उनके सहयोग और आशीर्वाद से मैं बाथरूम में उल्टियां कर रही थी।

और सासु माँ बहुत स्नेह से मेरी कमर सहला रही थीं ।

                   लेकिन मेरे अन्दर कोई डर

और पाप नहीं था तो लिहाजा मैं नीडर और स्वतंत्र हो कर रहती हूँ।

जब कभी तसल्ली के साथ मुड़ कर पीछे देखती हूँ तो फिर से जिंदगी जीने जैसा ही अहसास होता है।

मेरी संतान सलामत रहे यही प्रार्थना मैं हर वक्त ईश्वर से करती रहती हूँ।

स्वरचित / सीमा वर्मा

 

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!