नियति का खेल – रश्मि सिंह

शिखा-मम्मी कल सुमन की शादी है, मेरे पास कोई ढंग के कपड़े नहीं है, आप तो जानती हो कितने बड़े घर की है वो तो थोड़ा ठीक ठाक बनकर जाऊँगी।

उमा (शिखा की माँ)-जानती हूँ तुम दोनों बचपन की सहेलियाँ हो, उसने कभी अपनी अमीरी को तुम दोनों की दोस्ती के बीच नहीं आने दिया, उसकी शादी में उसकी बेस्ट फ्रेंड का जाना ज़रूरी है। मैं अभी अपनी दुकान में पुराने बचे कपड़ों से रात में लगकर बढ़िया सी ड्रेस बना दूँगी। 

शिखा-माँ तुम्हारे हाथ में बेहतरीन हुनर है, इसी से तो हमारी रोज़ी रोटी चल रही है। 

उमा-अच्छा ठीक है अब तू ख़ाना खाकर सोजा, कल सुबह तेरी ड्रेस तैयार हो चुकी होगी।

सुबह उठते ही शिखा घर से लगी छोटी सी दुकान में गई, जहां उसकी माँ अभी भी सिलाई करने में लगी हुई थी।

उमा-आ मेरी लाडो देख ड्रेस कैसी है।

 ड्रेस को देखते ही शिखा की आँखों में चमक आ जाती है और वो उत्साहित होते हुए कहती है कि माँ तुम्हारे जैसा कोई नहीं, पुराने कपड़ों से कोई ऐसी ड्रेस भी बना सकता है भला।

उमा-अब तो मेरी लाडो शान से जायेगी अपनी सहेली की शादी में। 

शिखा शाम को तैयार होकर सभी दोस्तों के साथ सुमन की शादी में पहुँचती है और वहाँ पहुँचते ही गरिमा (सुमन की माँ) उसे सुमन के कमरे में ले जाती है। 

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सुमन, शिखा को देखकर कहती है कि तू तो आज क़हर ढाह रही है, कही सब मेरी जगह तुझे ही ना देखते रह जाए।

शिखा-आंटी जी लग रहा है कुछ जल रहा है। इसको मुझसे जलन हो रही है।

 ये बात सुन सब ज़ोर से हँसने लगते है। कुछ देर बाद बारात के आगमन के बाद शिखा सुमन को जयमाला के लिए स्टेज पर ले जाती है। दूसरी तरफ़ दूल्हे के साथ खड़ा एक सुंदर नवयुवक पीयूष, जो पूरी बारात में अलग नज़र आ रहा था, बार-बार शिखा को देखे जा रहा था। पूरी शादी में वो शिखा को देखने और उसके पास जाने के बहाने ढूँढ रहा था, पर शिखा को ये अच्छा नहीं लग रहा था। 




शिखा जयमाला की रस्म के बाद ख़ाना खाकर घर के लिए निकल गई और पीयूष उसे हर जगह ढूँढ रहा था।

कुछ दिन बाद जब सुमन पगफ़ेरे के लिये अपने मायके आयी तो शिखा के घर गई और नाराज़गी जताते हुए बोली-तू मेरी बेस्ट फ्रेंड है और शादी पूरी होने से पहले ही चली आयी। 

शिखा-यार मुझे वहाँ एक लड़का बहुत घूर रहा था जहां मैं जा रही थी वो भी आस पास आ जाता इसलिए मैं लौट आयी। 

इतने में उमा जी चाय नाश्ते के साथ आयी और सुमन के हालचाल लेने लगी। 

सुमन-मैं बिल्कुल ठीक हूँ और मेरी एक बात सुनकर आपकी तबियत भी बिल्कुल दुरुस्त हो जाएगी।

उमा-अच्छा ऐसी भी क्या बात है बता तो जरा।

सुमन-आंटी मेरी शादी में इनका एक दोस्त आया था जिसका नाम पीयूष है बहुत ही सभ्य और बुद्धिमान लड़का है, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में क्लास वन ऑफिसर है। पिता जी रेलवे से रिटायर्ड है और मम्मी हाउसवाइफ है, बहुत बड़े घर के लोग है। उसे शिखा इतनी पसंद आयी है कि उसने उसी रात अपनी मम्मी और इन्हें बोल दिया था कि शादी करेगा तो सिर्फ़ शिखा से।

शिखा-तू उसी लड़के की बात कर रही है जिसकी वजह से मैं तेरी शादी बीच में छोड़कर आ गई थी।

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सुमन-किसी को पहली मुलाक़ात में ही ग़लत समझ लेना ठीक नहीं है शिखा।एक बार मिल तो ले।

उमा-पर सुमन तू तो जानती है कि शिखा के पापा के जाने के बाद कैसे हम अपना गुज़ारा कर रहे है तो हम इतने बड़े घर में रिश्ता कैसे जोड़ पाएँगे। 

रिश्ते दिल से जुड़ते है रुपए-पैसों से नहीं। दरवाज़े के बाहर से सुमन के पति प्रतीक की आवाज़ आयी। पीयूष ने अपने घर में बात कर ली है उसके घरवाले भी राज़ी है बस एक बार दोनों परिवार बैठकर बात कर लें। 




उमा जी के मन में एक हिचक थी वो इस बात पर भरोसा नहीं कर पा रही थी कि एक सिलाईवाली की बेटी इतने बड़े घर में जाएगी। 

दो दिन बाद शिखा और पीयूष के परिवार वाले मंदिर में मिलते है ।

सुजाता (पीयूष की माँ)-उमा जी हमे तो शिखा पसंद है क्योंकि हमें तो सुमन ने सब बता दिया है शिखा के बारे में। अब अगर पीयूष और शिखा अकेले में कुछ देर बात कर लेते तो ठीक रहता।

उमा जी को ये सब चमत्कार से कम नहीं लग रहा था क्योंकि मैं तो शिखा के लिये पीयूष जैसा राजकुमार कभी ना ढूँढ पाती। उमा जी ने भी हामी भर दी।

पीयूष और शिखा पास के पार्क में जाकर बैठते है। 

पीयूष- सबसे पहले तो मैं आपसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ कि उस दिन शादी में आपको बहुत असहज कर दिया था , पर यक़ीन मानिए आप जैसी खूबसूरत लड़की मैंने कही नहीं देखी, और जब सुमन ने आपके गुणों के बारे में बताया तो मैं तो फैन हो गया आपका। आपने माफ़ कर दिया ना मुझे।

शिखा को उसके  बात करने के अन्दाज़ और चेहरे पर बिखरी मुस्कान ने मोह लिया था उसने कहा- हाँ जी मैंने आपको माफ़ किया पर अब कभी ऐसा मत करिएगा।

पीयूष- अब छुप छुपकर देखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।

शिखा अपने दुपट्टे को कसकर पकड़ लेती है और शर्माते हुए कहती है देर हो गई है क्या अब चला जाए।




पीयूष और शिखा दोनों वापस अपने पैरेंट्स के पास आ जाते है। उमा शिखा के चेहरे का नूर देखकर समझ जाती है कि शिखा को पीयूष पसंद है।

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सुजाता (पीयूष की माँ)-अब आगे की तैयारियाँ शुरू की जाए। 

उमा- अभी इतनी जल्दी कैसे, अभी तो हमे थोड़ा वक़्त चाहिए सब कैसे इतना जल्दी कर पाऊँगी।

सुजाता (पीयूष की माँ) उमा की झिझक समझ कर कहती है आप बस जयपुर आ जाइए वहाँ हम मिलकर तैयारी कर लेंगे। 

उमा और शिखा को ये सब काल्पनिक लग रहा था ऐसा लग रहा था जैसे पलक झपकते ही उन्हें किसी ने फ़र्श से अर्श पर ला दिया हो। 

उमा को पकड़ते हुए सुमन-आंटी देखा इसे कहते है नियति का खेल। शिखा और आपने अंकल के जाने के बाद इतनी मेहनत, ईमानदारी से सब सम्भाला है उसको देखकर भगवान ने भी आपकी क़िस्मत में चार चाँद लगा दिए। अब हमारी शिखा बहुत खुश रहेगी, पीयूष बहुत अच्छा लड़का है।

एक महीने बाद शिखा और पीयूष की शादी खूब धूमधाम से संपन्न होती है और शिखा अपने ससुराल पहुँच जाती है। वो दिन और आज का दिन है शिखा आज भी अपने ससुराल में बहुत खुश है उसके एक बेटा है, और वो हर संडे पीयूष के साथ माँ से मिलने आती है। यहाँ शिखा की क़िस्मत बचपन में पढ़ी सिंड्रेला की कहानी याद दिलाती है, पर ये कहानी काल्पनिक नहीं मौलिक है।

आदरणीय पाठकों, 

कहते है क़िस्मत चमकते देर नहीं लगती और जब क़िस्मत का ताला खुलता है तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है, लेकिन इसका मतलब ये क़तई ना समझा जाये कि क़िस्मत के सहारे ही बैठा रहा जाए। क़िस्मत भी उनका साथ देती है जो कठिन परिश्रम में विश्वास करते है, क्योंकि कहा भी गया है-




“यूँ ही नहीं होती हाथ के लकीरों के आगे उँगलियाँ,

रब ने भी क़िस्मत से पहले मेहनत लिखी है।”

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स्वरचित एवं अप्रकाशित (मौलिक)

रश्मि सिंह

लखनऊ।

#नियति

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