काम करते-करते मैं बड़बड़ाती जा रही थी, ‘इस लड़के से कुछ कहना ही बेकार है। ज़रा से काम के लिए कितनी बातें सुनाता है। बिलकुल ऐसे बात करता है जैसे मुझसे भी बड़ा हो। सही बात है, इसे बिलकुल मोह नहीं है किसी से।’ छोड़ो, मैं भी किसके पीछे पड़ी हूँ । आने दो तानी को, उसी से ही करवा लूंगी।’
मन उखड़ गया था सुबह की बात याद करके। दरअसल, मेरी एक सहेली ने उसके घर पर हुई पार्टी में खींची हुई मेरी एक फोटो मुझे भेजी थी। काफी अच्छी थी। सोचा अपनी DP चेंज कर लेती हूँ। पर पता नहीं क्या प्रॉब्लम आ रही थी कि DP चेंज ही नहीं हो पा रही थी। तनय ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था, मैंने वहीं जाकर उसे पकड़ लिया, बेटे ज़रा देखो तो क्या प्रॉब्लम आ रही है।
मेरी DP ही चेंज नहीं हो पा रही है। तनय मेरी ओर बेबसी से देख कर बोला, ‘अभी ही देखना है क्या ?’ अब मेरे अंदर तो उतावली थी अपनी फोटो पर कमैंट्स पाने की, मैंने कहा, ‘हाँ अभी ही चाहिये। जल्दी से कर दो।’ तनय शुरू हो गया, ‘मम्मी, आपको क्या लगता हैं मैं खाली बैठा हूँ। अरे, अगर लैपटॉप पर नहीं भी हूँ तो दिमाग में दसियों काम चल रहे हैं।
प्लानिंग चल रही है। ऑफिस के लोगो साथ फोन चल रहा है। आपको पता तो है कल ही डेलीगेशन आ रहा है। मैं अभी मेंटली बहुत बिजी हूँ मम्मी। इतनी डिपेंडेंसी क्यों है आपको। ये सब आप खुद क्यों नहीं सीखती हैं, समझाया था न उस दिन आपको कि कैसे करना होता है। थोड़ा और एक्स्प्लोर करिये, आ जाएगा।
इतना बुरा लगा मुझे। ज़रा से काम के लिए दस बातें सुना दीं । क्यों ज़रा भी मोह नहीं इसको। निर्मोही कहीं का। हाँलाँकि इसके पापा नहीं मानते । कहते हैं कि ‘नहीं, निर्मोही नहीं है ये। इसकी जान हम सबके अंदर ही अटकी है। बस, ये अपना लाड़-प्यार बिलावजह दिखाने में विश्वास नहीं रखता। तुम भी तो गलत समय पर पहुंचती हो इसके पास’।
जाने ये लड़का ऐसा कैसे है। बाकी दोनों बच्चे – तनिमा और तनुज – तो मम्मी-मम्मी कहते नहीं अघाते । बात-बात पर गले ही लग जाते हैं। पर ये घर आकर न गले लगेगा न पीछे-पीछे घूमेगा। उल्टा इसके किसी काम में ज़रा सी गड़बड़ी हो जाए तो सबकी सीरियस वाली क्लास ले लेता है।
वैसे मेरा एक मन यह भी समझ रहा था कि इस समय तो ग़लती मेरी ही थी। देख तो रही हूँ, लड़का कब से दिन-रात लगा है। इसके ऑफिस में आठ-दस लोगो का डेलीगेशन आ रहा है जापान से। इम्पोर्टेन्ट जगह पर है, तो ज़िम्मेदारी भी इसी की बनती है कि सब ठीक से निपट जाए। मैं भी गलत समय पर ही काम बोल देती हूँ इसको।
पर माँ का ग़ुरूर भी तो कोई चीज़ होती है, कि मेरे बच्चों पर मेरा हक़ है। बच्चे आकर गले लगते हैं, आगे-पीछे डोलते हैं तो माँ के दिल को कितना सुकून मिलता है। पर ये ऐसा कुछ भी नहीं करता। क्या वाकई में निर्मोही है ये ?
पहला खटका तब लगा था जब मेरे घर में किसी बच्चे का जन्मदिन था। मेरे घर की बर्थडे पार्टीज का बच्चे इंतज़ार किया करते थे । ज़ाहिर है, इतने बड़े संयुक्त परिवार में जब इतने सारे हाथ मिल कर काम करते थे, तो पार्टी में आने वाले मेहमान बच्चों का दिल खुश करने के इंतज़ाम भी खूब बढ़िया होते थे।
हम तीनों ही बहुएं एक से बढ़कर एक नए आइडियाज पर काम करने में और खूब सुन्दर सजावट करने में माहिर थीं। उस समय खाने का सामान भी बच्चों की पसंद से घर पर ही बनता था क्योंकि बाहर से मंगवाने के ऑप्शंस तब नहीं के बराबर होते थे। इसके बावजूद हम बिल्कुल नए-नए तरीके से खाने पीने की चीज़ें बना कर खिलाते थे। नए नए गेम्स भी खिलाते थे।
अरे हाँ, याद आया, यह छोटी देवरानी की बिटिया के जन्मदिन की बात है। तब वो शायद फोर्थ स्टैण्डर्ड में आयी थी। तनय नाइन्थ क्लास में था तब। हमेशा की तरह घर के सारे बच्चे स्कूल से आकर, खाना खाकर सजावट के काम में जुट गए थे। बड़ा प्यारा दृश्य होता था हमारे यहाँ । बड़ी देवरानी तरह-तरह के केक बनाने में माहिर थीं।
वो डॉल को केक में सेट करने की जद्दोज़हद में लगी थीं। छोटी देवरानी ने ढेर सारे गुब्बारे फुला कर पूरी ज़मीन ही बड़े बड़े रंगीन गुब्बारों से पाट दी थी। अब वे झालरें बनाने के लिए रंगीन पट्टियां काट रही थीं। मेरी ड्यूटी उन पट्टियों से सुन्दर झालर बनाने की थी। ऐसे में पापाजी और अम्माजी भी वहीं आ जाते थे।
उनके भी एक्सपर्ट कमैंट्स आ रहे थे। मैंने अपनी आदत के मुताबिक सबसे पहले स्टीरियो पर जन्मदिन के रौनक बिखेरने वाले गीत लगाए। फिर रंगीन पट्टियों को गोंद से चिपका-चिपका कर झालरें बनानी शुरू की।
पापा भी मुझे कलर कॉम्बिनेशन में राय दे रहे थे, ‘गुलाबी के साथ नीला लगाओ। हरे के साथ तो नारंगी अधिक अच्छा लगेगा।’ लड़कों का काम था स्टूल, मेज आदि पर चढ़-चढ़ कर उन रंगीन झालरों गुबारों और स्टिकर्स से पंखों, दीवारों, छत को सजाना। और गेम्स की तैयारी करना।
मेरा ध्यान गया कि सब बच्चे हैं, पर तनय नहीं है। कमरे में जाकर देखा ये आराम से लेटा गेम खेल रहा था। मैं तो चौंक ही गयी। ‘अरे तनय, तुम यहां हो। चलो, सब बच्चे बाहर डेकोरेशन में लगे हैं और तुम यहाँ हो, जल्दी आओ बेटा’ कहते हुए मैं बाहर आकर अपने काम में लग गयी।
थोड़ी देर बाद मैंने फिर ध्यान दिया कि यह लड़का अभी भी बाहर नहीं आया था। फिर अंदर जाकर बुलाया इसको। जवाब आया, ‘हाँ, आता हूँ।’ पर उठने के कोई आसार नहीं दिख रहे थे।
इधर मेरा अभी काफी काम पड़ा था। ट्राई कलर सैंडविचेज़ बनाने थे, भठूरे तलने थे। काम के बीच-बीच में मैं देख कर आती रही, पर ये भाईसाहब वैसे ही पड़े रहे। उस दिन पहली बार इसने कुछ डेकोरेशन नहीं करवाया।
वही वह पॉइंट था जब मैंने ये रीअलाइज़ कर लिया था कि मेरा छोटू बेटा अब बड़ा हो गया है और अब इससे, इसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं करवाया जा सकता।
बाद में धीरे-धीरे सारे सबको यह समझ आ गया था कि तनय भैया की चीज़ें बिना उसकी इज़ाज़त के नहीं छूनी हैं। उसके सामने तमीज़ से रहना है। अगर इसके पीछे किसी ने चुपचाप इसकी चीज़ें ज़रा भी उलट पलट भी करीं, तो भी तनय भैया को पता नहीं कैसे पता चल जाता है।
हांलांकि किसी को ज़रुरत पड़ने पर तो वो अपनी महंगी से महंगी चीज़ भी तुरंत खुद ही लाकर पकड़ा देता था । पर कोई भी चीज़ लापरवाही से हैंडल करने पर अच्छी-खासी क्लास भी ले लेता था। हर गलत बात पर डाँट ज़रूर पड़ जाती थी।
वैसे डरती तो मैं भी थी इससे। मुझे तो अक्सर डाँट पड़ जाती थी कि आप लाड़-प्यार में तनुज और तनिमा को बहुत बिगाड़ रही हैं। थोड़ा टाइट रखिए दोनों को।
कल सुबह ही ये इन्हें कोरबा गए हैं ऑफिस के काम से। थोड़ी इनको चिंता हो रही थी कि इनके पीछे मुझे अकेले सब सम्हालने में थोड़ी दिक्कत हो जायेगी। इनकी टेंशन देख-देख कर तानी और तनुज तो हंस रहे थे। ‘पापा, आप इस बात पर परेशान हो रहे हैं।
अरे, मम्मी अकेले थोड़े ही हैं। हम लोग हैं न। तानी अपने पापा की ज़्यादा ही लाड़ की लली है। अपने पापा के कंधे पर सर टिकाते हुये बोली, ‘डोंट वरी मिस्टर रतन, आपके पीछे आप की वाईफ का पूरा ध्यान रखा जाएगा’।
जब घर में सब साथ में थे, तब तो हारी-बीमारी तक में सब मिलकर सम्हाल लेते थे। अब सभी किसी न किसी मजबूरी वश बाहर हैं और यहाँ रहने वाले रह गए हैं बस हम पांच प्राणी। उसमे से भी जब तक ये वापस आएंगे, हम चार ही हैं। मैं और तीनों बच्चे। कोई बात नहीं तानी और तनुज से मदद ले लूंगी। तनय से तो कोई उम्मीद रखना बेकार ही है।
आज सुबह आँख खुली तो पूरा शरीर टूट रहा था। पलंग से उठा भी नहीं जा रहा था। तनुज ऑफ़िस जाते समय मुझे बिस्तर पर देख चौंक गया। ‘अरे मम्मी, क्या हुआ ? लेटी कैसे हैं ? तबियत खराब है क्या? माथा छू कर देखा, अरे, आपको तो तेज़ बुखार है। पूरा हाल बताइये, डॉक्टर अंकल के घर जाकर दवाई ले आता हूँ ।
फिर अपने दोस्तों को फोन पर बताता हुआ कि आधे घंटे बाद पहुँचूँगा, मेरे माथे पर चुम्बन अंकित कर वह पड़ोस में डॉक्टर के घर चला गया। मैं कहना चाह रही थी, ‘बेटे, बस एक कप चाय देदे मुझे मैं उठ जाऊंगी। पर वह तो पल में ही ये जा और वो जा।
अब तनिमा की प्रतीक्षा थी मुझे। दिल कर रहा था, बस एक कप गरम चाय मिल जाये तो मैं उठ सकूँगी। तनिमा का कॉलेज का यह पहला वर्ष है। इसीलिए शायद जब कॉलेज जाने के लिए तैयार हो रही होती है तो घर में हाला-डोला सा आ जाता है। कभी ‘मम्मी ये वाली कुर्ती प्रेस कर दो’, तो कभी ‘मम्मी, इसके साथ की चुन्नी ढूंढ दो’। यही सब चलता रहता है।
अगले नंबर पर तानी कमरे में आईं। ‘हाय मम्मी, क्या हो गया। hawww, फिर झुक कर मेरे चिपकते हुए बोली, ‘मेरी मम्मी को नज़र लग गयी है पक्का। वो गईं और दो पल बाद मैंने देखा की वो मेरी नज़र उतार रही थीं।
‘ये क्या कर रही है, पागल हुई है क्या?’ मन किया चांटा ही लगा दूँ। अब तानी बिना मुझे उठाये, सिर्फ खुद को सम्हाल, कॉलेज चली जाएँ तो वही मेरे लिए बड़ी सहायता हो जायेगी। ऐसे में चाय के लिए कहकर मैं उसे धर्मसंकट में नहीं डाल सकती थी। ‘मम्मी, जल्दी बताओ, आप के लिए क्या बना दूँ? सैंडविच बना दूँ ? या कटलेट बना दूँ।
आमलेट ?’ मैं और घबरा गयी। ये पागल लड़की कुछ बनाएगी तो जाने क्या बन के आएगा। रसोई में भी बुरी तरह गंदगी मचा देगी। इससे तो अच्छा है मैं इन सबके जाने के बाद खुद कुछ लेकर खा लूंगी। नहीं, नहीं, गुड़िया, मैं बिलकुल ठीक हूँ। तू जा। तेरा रिहर्सल है न आज।’ मैंने उसे पुचकार कर आँखें बंद कर लीं।
‘अच्छा, मम्मी आप मेरे लिए परेशान मत होना मैं वहीं कुछ खा लूंगी। बस, अपना पर्स थोड़ा ढीला कर दो।’ मेरे कमरे से ही तानी अपनी दोस्त को फोन लगा रही थी, जो रोज़ उसे पिकअप करने आती है। ‘राधिका, कहाँ है तू आलरेडी सवा आठ हो गया है।,
हाँ, जल्दी आ।’ फोन रख तानी मेरी ओर पलट कर बोले ‘मम्मी’ मुझे देर हो जायेगी, पापा को फोन कर देती हूँ ——, तानी की बात अभी पूरी भी नहीं हो पायी थी कि मुझे अपने बगल में तनय की रोबीली आवाज़ सुनायी दी, ‘एक मिनट तनिमा’ क्या भैया?’ तानी की सहमी सी आवाज़ आयी। शायद तानी के बजाय तनिमा के सम्बोधन से ही वह मामले की गंभीरता को समझ गयी थी।
मेरे साइड टेबल पर झुकते हुए तनय ने चाय का कप रखा। फिर मेरे मुँह में थर्मामीटर लगाते हुए बोला, ‘पापा को क्यों परेशान करना है? आज देर से नहीं आओगी तुम। प्रैक्टिस ख़तम होते ही घर आना है। साढ़े बारह तक घर पहुँच जाओगी न? ‘नहीं भैया कैसे ? प्रैक्टिस के बाद ही तो सबका डिसकशन होता है ।
तानी ने प्रतिवाद करना चाहा। ‘कोई बात नहीं। प्रैक्टिस में तो जा रही हो न। डिस्कशन फोन से कर लेना। घर आकर स्विगी से या वहीं से कुछ खाने के लिए लेकर आना। मैं पौने एक तक निकल जाऊंगा।
उसके बाद से तुम मम्मी के पास रहना। फीवर चेक करती रहना और दवाई देना। सधी हुई गंभीर आवाज़ में तानी को निर्देश मिल रहे थे। ‘लेकिन भैया’ तानी ने कुछ कहना चाहा, पर तनय ने उसे रोक दिया। ‘मेजर और माइनर में फर्क करना तुम्हे अब आना चाहिए तानी। जाओ।’
तनय ने मेरी गर्दन के नीचे हाथ डाल मुझे सहारा देकर उठाया और पीठ के पीछे तकिये का सहारा देकर बैठा दिया। चाय का कप मेरे हाथों में पकड़ा कर, प्लेट में दो ब्रिटैनिया मारी बिस्किट्स रखे। और फिर प्यार से मेरा माथा सहलाने लगा। मैंने पूछा, ‘चाय किसने बनायी?’ ‘मैंने’ उसका धीमे स्वर में जवाब आया। ‘
तुम्हे आती है बनानी ?’ उसने कहा, ‘युटुब पर देख कर बनायी, आपको सुबह सुबह चाय पीने की आदत है न।’ जाने क्यों मेरी आँखें झिलमिला उठीं। पर जब वह खिड़की पास खड़ा होकर फ़ोन से बात कर रहा था तभी मैंने उस से छुपा कर आँखें पोंछ लीं।
उसकी फोन की बातें सुन कर मुझे याद आया कि अरे, आज ही तो इसके जापानी डेलीगेट्स आ रहे हैं जिनके लिए ये इतने दिनों से तैयारी कर रहा है। फोन बंद होते ही मैंने कहा, ‘आज तो तुम्हारे डेलीगेट्स आ रहे हैं न बेटा। तुम जल्दी से ऑफ़िस जाओ। मैं बिलकुल ठीक हूँ, अभी दवाई से बुखार उतर जाएगा बस। शाम तक तुम सब आ ही जाओगे।’
नहीं मम्मी, सारी तैयारी तो हो ही चुकी है। मैंने अभी का भी इंतज़ाम कर दिया है । टीम ऑफ़िस पहुँच गयी है। डेलीगेट्स के आने के पहले ही मैं भी पहुँच जाऊंगा। तब तक मैं आपके पास रहूंगा। दोपहर में तानी आ जायेगी और छह बजे तक तनुज को बुला लेता हूँ। कह आकर उसने तनुज को फोन लगाया। ‘हाँ तनुज, कब तक पहुंचोगे। जल्दी आना और उसे भी इंस्ट्रक्शंस की लिस्ट —-
थोड़ी ही देर बाद मेरे लिए एक प्लेट में दो टोस्ट बटर आ गए। साथ में था, बोर्नविटा मिला हुआ दूध। देख कर मैंने सर हिलाते हुए मुँह बनाया तो डाँट पड़ी मुझे, बिलकुल जैसे मम्मी डांटती थीं खाना खिलाने के लिए। चाय-नाश्ता और दवा खिला कर मुझे सुला दिया गया।
बीच-बीच में मेरी नींद उचटती तो मैं अधमुंदी आँखों से देखती वो मेरे बिस्तर पर ही बैठ कभी अपने लैपटॉप पर झुका काम कर रहा होता, कभी ऑफिस वालों को कुछ समझा रहा होता। कभी महरी को बर्तनो का शोर न करने के लिए बोल रहा होता।
दोपहर में तनिमा आ गयी थी। उसके आते ही तनय कमरे में आया, ‘मम्मी, कुकर में खिचड़ी है अभी तानी आपको गरम-गरम ही खिला देगी।
मेरी आँखें आश्चर्य से फ़ैल गयीं, ‘तुमने’?
वह मुस्कुराते हुए बोला, ‘जैसी भी बनी हो खा लीजियेगा’ । मैंने देखा, तानी बड़े भैया के सारे निर्देशों का ठीक से अनुसरण कर रही थी। मैं खाने के लिए मना करती तो मुझे डाँट लगाती कि ठीक है, फिर भैया को फोन करती हूँ मैं।
तीसरे पहर तबियत थोड़ी सुधरी तो सोचा धीरे-धीरे जाकर कुछ काम समेट लूँ। जाकर देखा तो रसोई संवरी हुई थी। समझ गयी थी आज महरी का बड़े भैया से सबका पड़ा है। वाशिंग मशीन लगाने गयी कि कपड़ों का ढेर न इकट्ठा हो जाए। वहां पहुंच कर फिर एक सुखद आश्चर्य मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। गंदे कपड़ों की टोकरी ख़ाली थी।
धुले कपड़े अरगनी पर सूख रहे थे। सोच रही थी क्या यह वही लड़का है जिसको कभी घर का कोई काम करने को बोलती थी तो टस से मस नहीं होता था। पर आज मुझे न करना पड़े इसलिए इतना कुछ कर लिया इसने।
रात तक मैं काफी स्वस्थ हो चुकी थी। अगली सुबह ही यह आ गए थे। दोनों छोटे वाले – तनुज और तनिमा – अपने पापा के इर्द-गिर्द लदे हुए, शॉपिंग का सामान देखने में लगे थे। और मेरा निर्मोही? वो तो बस अपने पापा के पाँव छूकर छूमंतर हो चुका था।
सब कुछ वापस ढर्रे पर आते ही फिर अपने उसी अनुशासित रूप में आ गया था। तनुज को डाँट पड़ रही थी कि ऑफिस से लंच के बाद अपने दोस्तों संग बाहर न निकल जाया करे। उसका फोन नो रिप्लाई रहता है तो, कॉल बैक क्यों नहीं करता।
तानी को घुड़की मिल रही थी कि लड़कों संग दोस्ती करने से पहले अच्छी तरह से उन्हें समझना चाहिए कि वो किस तरह के लड़के हैं।
मैं मंत्रमुग्ध सी अपने निर्मोही बेटे को देखे जा रही थी। मुझे अब उससे कोई शिकायत नहीं थी उससे, क्योंकि मुझे इनकी बात समझ आ गयी थी कि यह निर्मोही नहीं है। मेरा बेटा तो अपने अंदर सबसे अधिक मोह समेटे है। बस दिखाने में विश्वास नहीं रखता है। मन-ही-मन अपने बच्चों की बालाएं लेकर मैं निश्चिन्त होकर वहां से चली आयी ।
लेखिका
नमिता अनुराग