महा नगर की सडकें रोज की तरह आज भी सरपट दौड रहीं थी।सडक किनारे एक बुजुर्ग दम्पत्ति बहुत उदास अनमने से उस पार जाने की प्रतीक्षा में न जाने कब से खडे थे ।
पुरूष बहुत कमजोर व अस्वस्थ लग रहा था ।महिला गुमसुम सी एक हाथ में गठरी लादे व दूसरे हाथ से पति काहाथ पकड़े खडी थी। थोडा चलने की कोशीश करते फिर रूक जाते ,
तेज रफ्तार से भागता ट्रेफिक देखकर सहम जाते। एक दो राहगीरों से मदद माँग चुके थे किन्तु किसी के पास वक्त न था।
ऐसे ही खड़े काफी देर र हो गई थी। वे दोनों भूखे प्यासे भी हो चले थे । वृद्धा बार बार ऊपर आकाश की ओर देखती और अपने आँसू पोंछती व बुदबुदाती “क्या ये दिन दिखाने के लिये औलाद दी थी”।
तभी पारस जो इनका पोता है, सडक किनारे स्कूल से घर जाते हुए इन दोनों को देखकर सहसा रूक गया। आश्चर्य से बोला,”आप यहाँ क्या कर रहे हैं दादाजी दादीजी”!
बुजुर्ग पारस को देखकर सहम गये, बोले,”बेटा तुम घर जाओ,तुम्हारी मम्मी चिन्ता करेगी”।
पारस किसी भी कीमत पर उनको लिये बिना घर जाने को तैयार नहीं हुआ।
कहने लगा,”मैं भी चलूंगा आपके साथ”।
आखिर पारस की जिद के आगे उन्हें पारस को घर छोडने आना ही पडा।घर पंहुचते ही पारस दौडता हुआ अन्दर गया व लगभग चिल्लाता हुआ बोला,”मम्मी मेरा सामान दे दो मैं आज से दादाजी दादीजी के साथ रहूँगा अनाथआलय में।”
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पारस बोला,”अगर मै यहाँ रहूंगा तो आपको भी आपके वृद्ध होने पर अनाथआलय भेज दूंगा, इसलिए अच्छा है, मैं अभी ही आपके घर से चला जाऊं।”
पारस की बात सुनकर दादाजी ने लगभग डाँटते हुए पारस को कहा,
‘ बेटा वो तुम्हारी मम्मी हैं, उनसे इस तरह बात नहीं कहते’,
दादाजी ! आज मैं आपकी बात नहीं मानूंगा। बस मैं आपके साथ चलूंगा, मैं रह लूंगा किसी भी तरह।”
फिर मम्मी की ओर मुखातिब होते हुए कहने लगा,”आप भी आपका जैसे जी चाहे रहना यहां पर।”
माया और सुशान्त की आँखों फटी की फटी रह गईं। आंखों से जल धारा बह निकली। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो चुका था।
दोनों रोते रोते अपने माता-पिता से माफी मांग रहे थे। पारस को गले लगाते हुए कहने लगे,” बेटा हमें माफ कर दो, तुमने हमारी आंखें खोल दी।”
आज छोटे से पारस की सूझबूझ से व उसकी सहृदयता के स्पर्श से सारे घर परिवार के संस्कार स्वर्ण के समान जगमगा रहे थे।
पारस ने अपने घर को सोना बना लिया था।
डा. सुखमिला अग्रवाल,’भूमिजा’
©® स्वरचित मौलिक
मुंबई