“सीढ़ियों पर बढ़ते कदम अचानक से सुमन ने रोक लिए और दबे पांव नीचे चली आई थीं। ” रोज की तरह ही मोबाइल में खो गई । मगर ध्यान था ऊपर के कमरे से आती आवाजों पर । सोचने लगी अच्छा किया कि आधी सीढ़ियों से ही वापस मुड़ आई ।इतना सुखद क्षण अब कभी कभी ही मिल पाता है।
दोनों पिता पुत्र में वार्ता शुरू हो चुकी थी । जिससे सुनना ही सुखद था अगर मैं भी रोज की तरह उन दोनों के साथ ही चल देती तो मिलीजुली बातें होती। ऐसे तो पिता पुत्र टाइप ही बातें हो रहीं होंगी जो जरुरी भी है , आवाजें तो गपशप की आ रहीं थीं मगर बातें साफ साफ सुनाई नहीं दे रही थी । खैर,सुमन को सुनकर करना भी क्या था । संयोग से तो दोनों की मुलाकात हो रही थी , नहीं तो शेखर का लेट शेड्यूल मिलने मिलाने का मौका ही कहां देता है।
शेखर, खाना खाते ही बिस्तर पर निढ़ाल पड़ जाते हैं । दिनभर कचहरी के चक्कर में पांव घसीटते बीतता है ।शेखर और दीपक दोनों ने साथ खाना खाया और जैसे ही सुमन ने दूध का गिलास पकड़ाया तो शेखर ने कहा , अब मैं सोने जा रहा हूं , ग्यारह भी बज चुके हैं, सुबह दस बजे फिर से जाना है ।जल्दी सोऊंगा तो नींद पूरी हो जाएगी फिर पूरे दिन आसानी रहेगी वरना नींद आने लगती है।
तो रोका किसने है चले अपने कमरे में , सुमन ने कहा ।शेखर का कमरा मकान के ऊपरी हिस्से में था ।
तभी बेटे ने कहा चलो मां चलते है । दरअसल सब साथ साथ समय गुजारना चाहते हैं जब तक नींद न आ जाए ।
तभी सुमन किसी काम से रुक गई । दोनों पिता पुत्र कमरे तक पहुंच चुके थे और दोनों में तब तक बात चीत शुरू हो चुकी थी । सुमन के मन में जाने क्या आया उसने अपना इरादा बदल दिया और आधी सीढ़ियों से ही वापस चली आई ।
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वैसे भी गुरुवार का दिन है । पैरों की मालिश रहने ही देती हूं और दूसरी बात जिसकी वजह से नहीं गई कमरे में, वो यह थी कि सुबह ही शेखर कह रहे थे कि अभी अभी आया था और अभी जाने के लिए टिकट भी निकालना पड़ रहा ।
दरअसल सेमेस्टर की परीक्षा खत्म करके उनका बेटा दीपक दिल्ली से अपने घर बनारस आया था छुट्टी बिताने ,मगर शेखर को एक दिन की छुट्टी नहीं मिली कि बेटे के साथ जीभर कर समय बीता सके । यह मलाल हर बार का है । सुमन तो दिन भर बच्चे के साथ ही रहती है तो उसे कोई मलाल नहीं होता । बेटे के साथ बीतते हर क्षण को बकायदा थाती की तरह संजोती है ।दिनभर काम खत्म करते ही बेटे के कॉलेज उसके दोस्तों के बारे में बातें करते ही दिन बीतता है। कुछ अपनी सुनाती है कुछ उसकी सुनती है। जाने कहां से बूढ़ी होती हड्डियों में जान आ जाती है । क्या खाओगे बेटा ! क्या बनाऊं,क्या खिलाऊं और मौज मस्ती ।
“कहां अभी अभी आया है पूरे दस दिन हो गए हैं ।” सुमन ने शेखर से कहा । उसकी क्लासेज शुरू हो चुकीं है अब नहीं जायेगा तो अटेंडेंस का इशू तो आप जानते ही हैं। इसी बार कई बच्चों को एग्जाम देने से रोक दिया गया है। यह सुनकर शेखर मायूस हो गए।सुमन भी समझती है, पर जिम्मेदारी तो जिम्मेदारी होती है उसे अच्छे से निभाना इंसान का फर्ज होता है।
दो साल पहले ही दीपक ने आई आई टी में एडमिशन लिया था । घर पर रह गए थे सुमन और शेखर ,परिवार में और कोई था नहीं । इसलिए दीपक का इस तरह अपने से दूर रखने का जो दंश था अदृश्य होकर भी अपना काम करता ही था । अकेलापन चुभाने का काम । इस लिए एक एक लम्हे को जी लेने की पूरी कोशिश रहती तीनों की । मगर उसमें भी बाप बेटे का बहुत कम मुलाकात होना बहुत दुखद था ।
पर आज वो मौका हाथ लग ही गया था । दोनों पुरसुकून होकर जाने क्या बातें कर रहे थे । ज्यादातर बातें क्रिकेट के बारे में ही होंगी मगर इसके साथ सभी मुद्दों को टच किया जाता है । शेखर बहुत अच्छे पिता हैं यह बात दीपक और सुमन दोनों जानते हैं।
सुमन जानती थी शायद कि क्या बातें हो रहीं होंगी,” यही कि देखो बेटा समय ही नहीं मिल पाता और दीपक कह रहा होगा ” पापा मैं सब समझता हूं आप बेफ्रिक रहे ।” और शेखर उसे अपने अंक में भरने की व्यर्थ कोशिश कर रहे होंगे , क्योंकि उनका दीपक अब उनके अंक में समा सके ,ऐसा मुमकिन नहीं था ओ गबरू जवान हो चला था मगर बचपना वैसा ही था ।
आरती मिश्रा
वाराणसी