खून का रिश्ता कमजोर नही होता – संगीता अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi : ” मम्मी पापा आज मेरा सपना पूरा हो गया मुझे विदेश जा कर पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप मिल गई !” चिराग खुशी से झूमता हुआ अपने माता पिता से बोला।

” ये तो बहुत अच्छी बात है बेटा । ऐसे ही तुम्हारे हर सपने पूरे हो !” उसके पिता रतन जी उसे आशीर्वाद देते हुए बोले। 

” क्या तू सच मे विदेश चला जायेगा अपने माँ बाप को छोड़ ?” उसकी मम्मी सीमा जी दुखी हो बोली।

” मम्मी सिर्फ दो साल की ही तो बात है वो यूँही निकल जाएंगे आपको तो बता है एम बी बी एस पूरी करने के बाद मेरा कितना मन है एम डी लंदन से करने का । चलो अभी मैं तैयारी करता हूँ अपनी आप मुझे खुशी खुशी विदा कीजिये !” चिराग माँ को गले लगा बोला और अपनी तैयारियां करने चला गया।

” अरे भाग्यवान क्यो परेशान होती हो बच्चा अपने सपने पूरे करने जा रहा है उसे खुशी खुशी विदा करो !” चुपचाप अपने आँखों के गीले कोर पोंछते रतन जी बोले। 

” और हमारे सपने ? उनका क्या जो हमने उसके जन्म से देखे है । विदेश जा कोई वापिस नही आता ये तो आप भी जानते है !” सीमा जी बोली। 

” सीमा माँ बाप का सपना होता है बच्चो के सपने पूरे करना रही वापिस लौटने की बात खून है वो हमारा । हमारे संस्कार है उसमे और खून का रिश्ता इतना कमजोर नही होता अपने खून और संस्कार दोनो पर विश्वास रखो तुम !” मन ही मन खुद भी चिंतित रतन जी पत्नी को दिल्लासा दे रहे थे ।

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तय समय पर चिराग उड़ गया आसमान मे अपने सपने पूरे करने पीछे रह गये माँ बाप एक डर के साथ दो साल पूरे होने का इंतज़ार करते हुए। 

चिराग लंदन से रोज फोन वीडियो करता उसे देख रतन जी तो खुद को समझा लेते पर माँ का दिल मचल उठता बेटे को गले लगाने को और वो फफक पड़ती तब रतन जी फोन काट पत्नी को संभालते । धीरे धीरे चिराग के फोन आने कम होने लगे । रतन जी खुद से करते तो पढ़ाई की बात कर वो जल्दी ही फोन काट देता । इसी तरह दो साल बीत गये । 

” बेटा कब आ रहा है तू वापिस अब तो तू एम डी भी बन गया ?” एक दिन रतन जी ने बेटे से पूछा। 

” वो पापा मुझे यहां एक बहुत अच्छी नौकरी मिल गई है कुछ समय तक वो नौकरी करूंगा फिर वापिस आऊंगा जिससे वहाँ आकर एक अस्पताल खोल सकूँ !” चिराग ने कहा। 

” पर नौकरी यहां भी तो कर सकता है तू तूने दो साल को कहा था अब वापिस आजा तुझसे दूर रहना अब मुश्किल है !” बेटे की बात सुन सीमा जी रोते हुए बोली। 

” मम्मी अस्पताल खोलने को पैसा चाहिए जो वहाँ नही मिलेगा आप समझा करो ! यहाँ मुझे काफी पैसा मिल रहा है जिससे अस्पताल खोलने का सपना जल्दी पूरा हो जायेगा !” चिराग बोला। इससे पहले की सीमा जी कुछ बोलती रतन जी ने उनका हाथ दबा दिया और खुद नम आँखों से भी हँसते हुए बेटे को आशीर्वाद देने लगे और फिर फोन काट दिया। 

अब रतन जी को भी कुछ हद तक समझ आने लगा था बेटा वापिस नही आना चाहता शायद किन्तु मन इस बात को मानने को तैयार ना था कि उनका खून का रिश्ता इतना कमजोर है उन्हे एक उम्मीद अभी भी थी अपने दिये संस्कारो पर उसी के बल पर वो पत्नी को भी दिल्लासा देते रहते थे। 

” मम्मी पापा देखो आज मैं आपको किससे मिलवाने लाया हूँ !” करीब एक साल बाद वीडियो कॉल के दौरान चिराग बोला और एक लड़की को सामने कर दिया । पति पत्नी दोनो असमंजस मे एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। 

” नमस्ते आंटी नमस्ते अंकल मैं साक्षी !” उस लड़की ने कहा। 

” जीती रहो बेटी !” दोनो ने उसे आशीर्वाद दिया और सवालिया नज़रो से चिराग को देखने लगे ।

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” पापा ये भी मेरे साथ नौकरी करती है और हम एक दूसरे को पसंद करते है और शादी करना चाहते है !” चिराग बेझिझक बोला शायद विदेशी माहौल का असर था ये । चिराग के मुंह से ये सुनते ही पति पत्नी के मन मे एक हूंक सी उठी क्योकि अब बहू पसंद करने का अधिकार भी नही रहा उन्हे पर माँ बाप तो बच्चो की खुशी मे खुश होते है ये सोच दोनो ने उन्हे आशीर्वाद दे दिया ।

 फोन काटने के बाद दोनो के मन मे अनेक बाते चल रही थी पर एक तसल्ली ये थी कि बेटे ने कोई गौरी मेम नही पसंद की वरना तो जो एक आस की डोर है वो भी टूट जाती । वक्त अपनी रफ़्तार से बीतने लगा । वक्त की रफ़्तार के साथ सीमा जी और रतन जी की बेटे के वापिस लौटने की आस भी टूटने लगी । अब तो कई कई दिन बेटे से बात भी नही हो पाती थी क्योकि चिराग बहुत व्यस्त हो गया था ।

” जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो मम्मी !” एक सुबह चिराग का फोन आया और वो बोला । 

” बेटा तेरे बिन क्या जन्मदिन क्या कोई त्योहार !” आखिर सीमा जी के मन का दर्द उनकी आवाज़ मे झलक गया। साक्षी भी चिराग के साथ थी उसने भी जन्मदिन की बधाई दी। 

” अच्छा मम्मी ये छोड़ो बोलो आपको जन्मदिन पर क्या चाहिए ?” चिराग उनकी बात टालते हुए बोला। 

” बेटा एक माँ को तो बस उसका बच्चा पास चाहिए पर जानती हूँ ऐसा संभव नही !” सीमा जी बोली। 

” चिराग की माँ क्यो खुद को दुखी करती है साथ ही बच्चो को भी । इतनी दूर है वो व्यस्त है फिर भी तेरा जन्मदिन याद रखा इतना काफी नही क्या !” रतन जी किसी ओर के कुछ बोलने से पहले झल्ला कर बोले । उनकी झल्लाहट भी उनके दिल का दर्द बयान कर रही थी। 

” पापा मम्मी का जन्मदिन मैं कैसे भूल सकता हूँ और मम्मी आप अपने जन्मदिन पर इतनी दुखी बिल्कुल अच्छी नही लग रही हो । अच्छा ये बताओ क्या चीज है जो आपको खुशी दे सकती है ?” चिराग बोला। 

” बेटा एक माँ के लिए उसके बच्चे ही उसकी खुशी होते है पर मेरी तो ये खुशी ही मुझसे दूर है !” सीमा जी उदासी से बोली। 

” अब आप दरवाजा नही खोलोगी तो ये खुशी पास भी कैसे आये भला !” चिराग मासूम सा चेहरा बना बोला।

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” क्या….!!!” उसके इतना बोलते ही सीमा जी और रतन जी चौंक गये । जब उन्होंने ध्यान से देखा तब पता लगा चिराग जहाँ खड़ा है वो तो उनके ही घर का बाहरी हिस्सा है । सीमा जी खुशी के मारे भागी हुई दरवाजे पर गई । बाहर चिराग और साक्षी खड़े थे केक और फूलो का गुलदस्ता लिए हुए । सीमा जी को अपनी आँखों पर विश्वास ही नही हो रहा था ।

” जन्मदिन की ढेरो शुभकामनाएं मम्मी !” चिराग ने माँ के पैर छूकर कहा साक्षी ने भी उनके पैर छू शुभकामनाएं दी। पर सीमा जी तो मानो बेटे को देख होश खो बैठी थी। 

” अरे भाग्यवान बेटे और होने वाली बहू को दरवाजे पर ही खड़ा रखना है आज !” रतन जी के इतना कहने पर सीमा जी होश मे आई और बेटे के गले लग रो पड़ी। 

” बस मम्मी अब और नही रोना मैं आ गया हूँ ना !” चिराग उन्हे चुप करवाता हुआ बोला।

” पर तू फिर चला जायेगा हमें छोड़ कर !” सीमा जी रोते हुए बोली। 

” मम्मी जाने को थोड़ी आया हूँ हमेशा तुम्हारे पास रहने आया हूँ !” चिराग उनके आँसू पोंछ हँसता हुआ बोला।

” क्या ..!! सच मे ? फिर तुम्हारे सपने का क्या ?” रतन जी आश्चर्यमिश्रित खुशी के साथ बोले।

” अंकल जी वो सपना भी पूरा होगा पर अपनों के साथ । बहुत भटक लिए विदेश मे खून के रिश्तो से दूर बेगानों के बीच पैसे भी कमा लिए अब अपनो का साथ चाहिए !” साक्षी बोली।

” हां पापा जितना कमाया काफी है सपने पूरे करने को कम भी रहा तो और मेहनत कर लेंगे पर अब अपनों के साथ रहेंगे अपने देश के लोगो की सेवा करेंगे !” चिराग साक्षी की हाँ मे हाँ मिलाता हुआ बोला। 

” देखा सीमा मैं कहता था ना हमारा बेटा वापिस आएगा खून का रिश्ता इतना कमजोर नही जो हमारा बेटा उसे भूला विदेश मे बस जायेगा देख बेटा तो आया ही साथ ही इतनी प्यारी और समझदार बहू भी लाया है !” रतन जी भावुक हो बोले । 

” हांजी सही कहा आपने हमारे संस्कार जीत गये विदेशी चमक हार गई ।” सीमा जी चिराग और साक्षी दोनो को गले लगाती हुई बोली। तभी वहाँ साक्षी के घर वाले भी आ गये जिन्हे साक्षी ने रास्ते से फोन किया था वो भी सालों बाद बेटी को देख भावुक हो गये थे । सीमा जी सबके चाय नाश्ते का प्रबंध करने रसोई की तरफ बढ़ी उनके साथ साक्षी भी आ गई। जिस घर मे थोड़ी देर पहले मायूसी थी वहाँ खून के रिश्तो ने रौनक बिखेर दी थी। 

आपकी दोस्त 

संगीता अग्रवाल

(Betiyan_M)

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