कहीं देर ना हो जाये… – संगीता त्रिपाठी

 जिंदगी हर कदम एक नई जंग हैं…पर तू हौसला मत छोड़ना,मजबूत बनेगी तभी सफल होगी, पर हाँ कोई निर्णय लेने से पहले सोच ले, तेरे झगडे का मुद्दा कितना सही है,”,कहने को मैंने पंकु को समझा दिया।

पर अपनी बीती जिंदगी याद आ गई। कई साल पहले  मै यानि नीरजा भी इसी जगह खड़ी थी। फर्क ये था पंकु के कोई बच्चे नहीं हैं, फैसला लेना आसान हैं। मेरे साथ दो बच्चे भी थे।मेरे लिये फैसला लेना आसान नहीं था। सवाल -जवाब के जाल में उलझती मै,…पति की हर प्रताड़ना सह रही थी। जब अंदर की स्त्री अपने मान -सम्मान के लिये खड़ी होती, तभी दो जोड़ी मासूम निगाहें , मेरे हौसले को पस्त कर देती। अपने मान -सम्मान के लिये इन दोनों अबोध की खुशियाँ मै कैसे छीन लूँ। ना… एक माँ स्वार्थी कैसे हो सकती। 

         बात जब मुझसे बढ़ कर बच्चों पर आई,तो एक माँ को निर्णय लेने में जरा भी समय नहीं लगा। घर से निकलते समय पंकज ने कहा था “तुम बाद में पछताओगी नीरजा., तुम्हे हर कदम पर पति के सहारे की जरूरत पड़ेगी…।”

“माँ के रूप में कभी नहीं पछताऊँगी क्योंकि मैंने बच्चों के हित को ध्यान में रख कर फैसला लिया हैं, मेरे बच्चे मेरा सबसे बड़ा सहारा है,”कह मै आत्मविश्वास से दोनों बच्चों का हाथ पकड़ बाहर निकल आई।

             कुछ दिन बहन के पास रह, नीरजा ने नया आशियाना ढूंढा। कठिन समय में बच्चे और नीरजा एक दूसरे का सहारा बन गये.,.एक नये सिरे से जिंदगी की शुरुआत किया… पर जब भी बाहर जाती, लोगों की प्रतिक्रिया देख उसके हौसले दम तोड़ने लगते…,।

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कार्यालय में सहयोगियों के कटाक्ष, बाहर परिचितों के प्रश्नभरी निगाहें, मानो कहती “तुमने गुनाह किया है तलाक ले कर…..”हर इंसान इस तरह व्यवहार करता,जैसे तलाक लेने वाली स्त्री ने सार्वजानिक संपत्ति हो जाती हैं। वक्त -बेवक्त सलाह देने वालों की संख्या बढ़ गई । हर दिन चुनौती भरा होता,

शाम होते ही एक सुकून की सांस लेती..,चलो अब एक दिन सुकून से गुजर गया कल की उम्मीद में।समय अपनी रफ़्तार से चल रहा था, बच्चे बड़े हो गये, पंकु ने साथ काम करने वाले प्रशांत से एक दिन नीरजा को मिलवाया। नीरजा ने अपनी पसंद की मोहर लगा दी। कुछ समय बाद बेटे नितेश की भी शादी हो गई…। जीवन में एक ठहराव आ गया था। नीरजा खुश थी, बिना किसी सहारे के उसने अपने माँ होने का दायित्व पूरा किया।

       आज पंखुड़ी भी उसी दोराहें पर खड़ी हैं, जहाँ वर्षो पहले वो खड़ी थी।आज नीरजा एक सशक्त स्त्री हैं। जिसने अपनी गृहस्थी बड़ी हिम्मत से संवारा हैं। आज वो कई लोगों के लिये मिसाल हैं, आज उसकी बेटी भी स्त्री की उन्ही उलझनों से गुजर रही थी,जिससे शायद सब नवविवाहित स्त्री गुजरती होंगी।पंकु ने जिंदगी अभी शुरू की, पर नीरजा उसे हारने नहीं देगी। पंकु की बदलती मनस्थिति का बड़ा सूक्ष्म निरीक्षण कर रही थी जो टूटी हुई जरूर थी लेकिन हारी हुई नहीं थी।

    ना.. पंकु को मै अपनी स्थिति में नहीं आने दूंगी।नीरजा ने सोचा…..,पंकु को भी कुछ बात समझनी पड़ेगी। उसने तो प्रताड़ना का विरोध किया था, लेकिन पंकु की लड़ाई अहम् की है .. सास की टोका -टाकी… पंकु को रास नहीं आ रही थी… प्रशांत बहुत समझाता पर पंकु ने जिद पकड़ ली, वो सास के साथ नहीं रहेगी…, इसी कहा सुनी में प्रशांत कब हाथ उठ गया, प्रशांत भी नहीं समझ पाया… एक सन्नाटा तिर आया.. पंकु ने अपनी अटैची पैक किया और घर से बाहर निकल गई…।




            पंकु, अकेले जिंदगी जीना आसान नहीं हैं, ये बहुत बड़ी सच्चाई हैं, हर दिन एक नई चुनौती देती हैं जिंदगी।

  “पर मम्मा आपने भी तो अकेले जिंदगी गुजारी “पंकु ने अपनी ऑंखें झपकाई।

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        “हाँ मैंने गुजारी हैं, पर कितने कटाक्ष, कितने ताने बर्दाश्त किया हैं। हमारा समाज ही ऐसा हैं बर्दाश्त करों तो भी स्त्री की गलती और ना बर्दाश्त करों तो भी स्त्री की गलती। पुरुषों से ज्यादा तो हम स्त्रियाँ गलत हैं, जो एक दूसरे का साथ नहीं देती। प्रशांत का फोन आया था। अपनी गलती पर उसे ग्लानि हैं। तुमसे क्षमा मांगना चाहता हैं। मेरे ख्याल से उसे एक मौका और दे दो… पर पंकु गलती तुम्हारी भी है…, तुम अपनी माँ से अलग नहीं रह सकती हो, फिर प्रशांत को कैसे विवश कर सकती हो अलग रहने को…?? मेरी शिक्षा ये नहीं थी कि तुम रिश्तों का अनादर करो…”.

       “ये आप कह रही हो माँ, जिसने अन्याय ना सहन करने की शिक्षा दी थी, वो आज मुझे अन्याय सहन करने को कह रही हैं। क्यों माँ..,,??

                “मै अन्याय सहने को नहीं कह रही पंकु, तुम्हारा झगड़ा अहम् का हैं,कभी -कभी किसी एक की पहल,, रिश्तों को बचा लेती है….,जिंदगी में हर दिन नई चुनौती आती हैं,उसे समझदारी के साथ जीतना ज्यादा बेहतर होता हैं न की पलायन करना।तोड़ना बहुत आसान होता हैं, लेकिन जोड़ना कठिन होता है, पर कोशिश करने पर असंभव भी नहीं है…।जिन रिश्तों को तुम अपना नहीं मानती हो, वो रिश्ते आज भी तुम्हारे लिये पलकें बिछा रखें है…, अभी समय है… लौटने का… देर करने पर..कहीं ऐसा ना हो की एक दिन वो दरवाजा तुम्हारे लिये बंद हो जाये फिर पछतावे के सिवा कुछ हाथ ना आये…, टोकती तो मै भी तुम्हे … फिर तुम मुझे क्यों नहीं जवाब देती…, ये फर्क नजरिये का है… नजरिया बदलो तो सब अच्छा दिखेगा..।”

नीरजा की बात सुन पंकु सोच में पड़ गई, माँ सही तो कह रही, यहाँ लड़ाई अहम् की हो गई है..,

 आप ठीक कह रही हो माँ, शायद मैंने निर्णय लेने में जल्दी कर दी… और सही बात है एक बेटे को माँ से अलग क्यों करना…. मै गलत थी…. “नीरजा पंकु के लिये आशावान हो गई..।

                    —=संगीता त्रिपाठी 

  #पछतावा 

1 thought on “कहीं देर ना हो जाये… – संगीता त्रिपाठी”

  1. अच्छी कहानियां है।सुंदर सन्देश देती है आप

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