जब सब्र का पैमाना छलक गया : samajik kahaniya

सुधा सुबह जल्दी-जल्दी काम निबटा रही थी। आज वह मां   से मिलने जाना चाहती थी। रात को उनका फोन आया था के वे  बीमार थीं और उससे मिलना चाहती थी। बहु को जल्दी काम निबटाते देख उसकी सास केतकी बोली

 बहु कहीं जाना है क्या? तुम जल्दी काम निबटा रही हो।

 सुधा बोली हाँ मम्मीजी माँ कि तबियत खराब है अत: उनसे मिलने जाना चाहती हूँ। अरे बहू परसों अवनी आ रही उसे अच्छा नहीं लगेगा और फिर इतना काम कौन करेगा।

 सुधा मन मार कर बोली मम्मी जी दीदी के रहने  तक रूक जाती हूँ, फिर चली जाउंगी। दो दिन बाद अवनी अपने दोनों बच्चों के साथ आगई। बच्चों की फरमाइश का खाना, नाश्ता बड़ों की पसन्द  का अलग नाश्ता खाना सारा दिन वह अकेली किचन में लगी रहती और  अवनी अपनी माँ के साथ ए.सी कमरे में बैठकर मन पसन्द सीरियल देखते हुए बतीयाती रहती। खैर  जैसे तेसे वह गई तो सुधा ने दो दिन बाद कहा मम्मीजी मैं अब जाऊं ।

 हाॅ अरुण से पूछ ले उसे तो कोई परेशानी नहीं है ,उसके पूछने पर अरुण ने अनमने मन से से कहा चली जाओ किन्तु दो-चार दिन में ही जल्दी लौट आना, माँ से काम नहीं होता है, वे परेशान हो जाॅएगी। उसका का मन चीत्कार कर उठा क्या मै अपने मां-बाप से भी नहीं मिल सकती।  वह कल जाने का मन बना ही रही थी कि केतकीजी बोली बहू कल तुम्हारे बड़े, नन्दोईजी काम के सिलसिले मे यहाँ आ रहे हैं

अत: मैंने विट्टो को भी कह दिया है कि वह भी साथ आ जाए बडा मन कर रहा था उससे मिलने को, तीन महीने हो गए उससे मिले ।सुधा आक्रोशित हो गई यह सुन कर उन्हें तो तीन माह ही जादा लग रहे है मेरी माॅ तो दो वर्षो से बुला रही है क्या ये मेरा और मेरी माँ का दर्द समझती है। सास -ससुर तो एक तरफ कभी अरुण ने भी उससे सहानुभूति नही दिखाई कि साथ ले जाकर मिलालाता। , क्या मेरे माॅ बाप से अरूण का कोई

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 रिश्ता नहीं है?क्या मेरे भाई बहन अरुण के कोई नहीं लगते कभी उनसे सीधे मुँह फोन पर भी बात नहीं करता। मैं तो उसके मां बापकी भाई बहनों की रिश्तेदारों की सेवा के लिए लाई गई अवेतनिक नौकरानी जो हूँ। मन में क्रोधागिनी फेल रही थी किन्तु परिवार की-शान्ति के लिए खून का घूंट पी कर रह गई । और माँ के दिए संस्कारों के खातिर ।

 खैर दो दिन तक फिर वही सब कार्यक्रम चला चाय-नाश्ता खाना घूमना फिरना माँ बेटी खाना खाकर शापिंग के लिए निकल गई और वह काम निबटाकर शाम के खाने की तैयारी में लग गई। 

 नन्द के जाने के बाद आज फिर वह अपने जाने की तैयारी करने लगी। तभी ससुर जी बोले अरे सुधा बेटा मेरा एक दोस्त यहाँ से निकल रहा है उसने मुझे स्टेशन पर मिलने बुलाया है तो मे सोच रहा था कि ताजा खाना साथ मै लेता जाऊँ।

 यह सुनकर आज सुधा सुषुप्त ज्वालामुखि की तरह फट पडी 

 आक्रोश की बजह से उसका मुँह लाल हो गया हाथों की मुठठियाँ भींच गई। आक्रोश में वह जोर से चिललाई मै कुछ ‘खाना’ – बाना नहीं  दूंगी में कोई बंधुआ मजदूर नही हूं जा रही हूँ

अपनी माॅ से मिलने अब एक पल भी नहीं रूकूंगी। तभी केतकी जी बोली ऐसे कैसे जायगी जब तक अरूण नही कहेगा। उन्होंने फोन करके तुरन्त अरुण को बुला लिया। अरूण आते ही उस पर बरस पड़ा – ये क्या तरीका है मेरे मम्मी-पापा से बात करने का तुम कहीं नहीं जाओगी।

आज आक्रोशित सुधा को कोई नही रोक पाया  वह बोली तुम मेरे मम्मी-पापा ,भाई बहन का कितना मान रखते हो अब वही व्यवहार मैं करूंगी जो तुम्हारा मेरे घर वालो के प्रति है। मै  जा रही हूँ। 

अरुण जा तो रही हो ध्यान रखना मै लेने नहीं आऊंगा वह बोली मैं अपनी मर्जी से जा रही हूँ और अपनी मर्जी से आ जाऊँगी। मुझे किसीके ले के आने की जरूरत नहीं है। दोनों बच्चों को ले वह  अपने बैग के साथ बुलाई गई केब मे जा बैठी और बढ़ गई अपनी मंजिल की ओर।

आज उसका #आक्रोश अपने चरम पर था।

#आक्रोश

शिव कुमारी शुक्ला

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