जब जागो तभी सवेरा – शिव कुमारी शुक्ल : Moral stories in hindi

दादी अम्मा आ गईं दादी अम्मा आगईं  की आवाज सुन कर शुभा अपने कमरे से बाहर सिर पर पल्ला रखते हुए आई और उसने सास-ससुर के पैर छुए। दोनों बच्चे दादा-दादी से लिपट कर खुश हो रहे थे। शुभा अम्मा का पर्स उनके हाथ से लेकर बोली आइए। वे अन्दर जाकर सोफे पर बैठ गए। सुमि तो अब बडी हो गई थी सो अपने को जज्ब किये ये हुए थी जबकि विभू अभी छोटा था सो वह दादी अम्मा के सामान को ललचायी नजरों से देखता लट्टू सा घूम रहा था। उसे देख दादी को हँसी आ गई और अपने पास बुलाकर प्यार किया फिर बोली में तेरी पसन्द की सब चीजें लाई हूं चिन्ता मत कर ।

वह बोला तो  देओ न । 

सब्र कर सुमि आ बेटा मेरे  पास आ दूर क्यों खडी है। उसे पास  बैठा कर प्यार करते बोली अब तो बेटी बडी होगई  है ।

तभी चाय नाश्ता लेकर आती शुभा बोली हाँ अम्मा बड़ी तो हो गई है पन्द्रह साल की

होने जा रही है।

 चाय पीने के बाद विभू की आतुरता को देखते हुए अम्मा ने  सबसे पहले नाश्ते वाला बैग खोला । उसमें से निकले मेवे से भरे गोंद के लड्डू, मठरी, नमकीन मीठे  खुरमे घर का बना  चिवडा, तिलपट्टी, रोस्टेड काजू ,मखाने । विभू और सुमि तो ठीक, उनके पापा माधव का भी मन डोल गया बोले अम्मा जल्दी दो अब सब्र  नहीं हो रहा। शुभा जल्दी से  प्लेट्स ले  आओ। सब प्यार से खाने लगे जिसे जो पसन्द आया। केवल शुभा ही थी जो कुछ नहीं ले रही थी। 

दादी बोलीं शुभा तुम भी खालो एक दिन खाने से मोटी नहीं हो जाओगी। लो चखो सब हाथों से बना के लाई हूं अनहाइजीनिक कुछ भी नहीं है।

दादी के आने से बच्चे  बहुत खुश थे कि अब उन्हें रोज रोज टिफिन में अच्छा खाना ले जाने को मिलेगा, रोज-रोज बोरिंग ब्रेड, नूडल्स, मैगी से पीछा छुटा। और दादी कहानियाँ भी तो कितनी अच्छी सुनाती हैं विभू सोच रहा था कि अब तो में दादी के साथ ही सोया करूंगा।

 अब दादी – दादा के बारे में भी बता दूँ वे कोई गाँव के अनपढ़ लोग नहीं थे, पढ़े लिखे नौकरी पेशा, अच्छे पद से दोंनों सेवानिवृत हुए थे और जयपुर में अपने बनाए मकान में रहते थे ।उन्होंने अपनी सुविधानुसार सारी व्यवस्था कर रखी थी और उनका वहीं अपने घर में मन लगता था। उन्हें पेंशन मिलती थी सो वे पूर्ण  रूप से आर्थीक  निर्भर थे। उनके दो बेटे थे माधव और राघव। वे अपनी इच्छानुसार दोंनों बेटों के पास जाते, और कुछ समय रहकर अपने घर लौट आते ।हालंकि उनके बेटे उनसे, साथ ही रहने को कहते किन्तु वे यह कहकर टाल देते अभी हमारे हाथ पैर चल रहे हैं, हमें अपने  ढंग से रहने दो और   तुम भी अपनी तरह रहो। बुढ़ापे में  जब हाथ पैर काम करना बन्द कर देंगे तब तो तुम्हारे ही साथ रहना है। अभी हम अपने रुटीन  में व्यवधान नहीं चाहते।

अब बच्चे बडे खुश थे रोज टिफीन में तरह- तरह के परांठे कभी आलू के, मूली,मैथी के,कभी आलू की सब्जी पूरी, कभी उपमा दादी उनकी फरमाइश के हिसाब से बना कर देतीं। जबकि शुभा थोडा आलसी प्रवृत्ति की थी  उससे इतना सब खटरोग सुबह उठकर  नहीं होता था। दूसरे  वह इन चीजों से परहेज़ करती थी उसकी नज़र में ये चीजें अनहाइजीनिक हैं,  इनसे मोटापा, कोलेस्ट्रॉल बढता है। और वह  अपने को बहुत ही आधुनिक समझती सो उसकी  सोच थी  डिब्बा बन्द चीज़ें खाना, मेगी, नूडल्स  चाऊमीन ,पास्ता खाना आधुनिकता की निशानी है। परांठे या अन्य नाश्ता ओल्ड फैशन है। दादी उसे समझाती आधुनिकता के  चक्कर में पडकर बच्चों को ये फास्ट फूड मत दो उनमें प्रिजरवेटिव होता है जो बहुत नुकसानदायक होता है। किन्तु शुभा पर कोई असर नही होता, वह सोचती दादी तो पुराने जमाने कि बातें करतीं हैं  किन्तु अब जमाना बदल गया है। 

शुभा अपना  अधिकांश समय  फोन पर सहेलियों से  बातें करने में, शापिंग करने में,वयूटीपारलर में,अपनी किटी पार्टीज में जाया करती सो घर गृहस्थी पर ज्यादा ध्यान न देकर काम चलाऊ तरीके अपनाती।  वह ज्यादातर पैक्ड फूड, बाहर खाना उनसे ही काम चला अपने को आधुनिक नए जमाने की समझती ।जब तक दादी रहती घर में, घर के खाने की महक  आती।  बच्चे और माधव घर का खाना खाकर खुश होते वहीं शुभा इसे समय की बरबादी समझती।

तभी एक दिन सुमि मम्मी के साथ जाकर अपने लिएदो ड्रेसेस  ले लाई, विभू भी अपने लिए लाया। दोनों खुशी खुशी, अपने दादाजी ,दादी जी को अपनी  ड्रेसेस  दिखा रहे थेा विभू की तो ठीक है किन्तु उन दोंनों को सुमि के कपडे पसन्द नहीं आए। ये क्या बेटा तुम इतने छोटे-छोटे कपडे लाई हो ऊपर भी इनमें केवल स्टेप्स हैं अच्छे

लगेंगे  क्या।

दादी मम्मी ने ही तो पसन्द कर दिलाए हैं आजकल ऐसे ही कपडे चल रहे हैं। सब पहनते हैं।

तभी शुभा बोली अम्माजी अब नया जमाना आ गया है उसी के साथ चलने में समझदारी है ।

शुभा मेरी समझ में नहीं आ रहा कि न जाने  ये कैसा जमाना आ गया है तुम मां होकर बेटी को ऐसे कपडे पहनाओगी  , जिसमें उसका बदन ढके कम दिखे ज्यादा। यदि बच्ची जिद भी करे तो तुम्हें उसे समझाना चाहिए पर तुम तो उसे आगे होकर ऐसे कपडे ऑफर कर रही हो। ये तुम्हारी आधुनिकता की दौड में बच्ची को तो मत घसीटो । 

अम्माजी  यदि वह ऐसे कपडे नहीं पहनेगी तो उसकी सहेलियाँ उसका मजाक उड़ाएंगी उसे बहन जी समझेंगीं।

हाँ सही कहा तुमने  ढंग के कपडे पहनना बहन जी की निशानी है तो ये आधे अधूरे कपडे तुम्हारी नजर में आधुनिक होने की। शुभा बच्ची अब  यद बडी हो रही है यह तुम्हारी सोच उसे ले न डूबे ।

दादी जानती थीं कि शुभा से कुछ कहना पत्थर से सिर फोडना है कारण वह नये जमाने के प्रभाव से इतनी प्रभावित थी कि कोई बात सुनने समझने को ही तैयार नहीं थी। सो वे चुप हो गई। 

अब उन्होंने सोचा की वे धीरे-धीरे सुमि को ही समझायेंगी। 

एक दिन कहानी सुनते सुनते जब विभू सो गया तो उन्होने सुमि से बात छेड़ी । बेटा सही  से बताओ क्या  तुम ऐसे छोटे-छोटे कपड़ों में अपने को सहज महसूस करती हो।

नहीं दादी माँ पहले तो मुझे बहुत अजीब लगता था जब मम्मी लाकर देतीं थीं किन्तु पहनते -पहनते आदत हो  चली है, किन्तु ध्यान बहुत रखना पडता है , बहुत ध्यान से उठना बैठना होता है बहुत छोटे जो होते हैं ऊपर से भी खुले होते है अच्छे तो नहीं लगते पर मम्मी कहतीं हैं ऐसे ही कपड़ों  में सुन्दर लगती हूँ। 

दादी बेटा सुन्दरता शरीर को दिखाने की मोहताज नहीं है, सुन्दरता तो तुम्हारे गुणों से,बुद्धिमता के तेज से चेहरे पर अपने आप झलकती  है। जब तुम स्वच्छ पोष्टिक भोजन करोगी, स्वस्थ रहोगी तो सुंदरता तो निखरेगी। बेटा ये तो कुछ तो सिनेमा टीवी में काम करनी बाली अभिनेत्रियों की ड्रेसेस का प्रभाव है जो अब आम लोगों के सिर पर चढ कर बोल रहा है। दूसरे फैशन डिजाइनर्स का फैलाया जाल है जिसमें सब उलझ कर रह गए हैं। कपड़े वही पहनने चाहिए जो आरामदायक एवं सुविधाजनक हों।  अच्छा बेटा अब तुम भी सो जाओ।

ये कैसा जमाना आ गया है बेटी को कम कपड़ों में देख माता पिता निहाल होते हैं उसे फैशनेबल समझते हैं। स्त्री को  वस्तु समझकर विज्ञापनो में उसका मन चाहे तरिके से उपयोग करते हैं। उससे मोटर साइकिल, पुरुषों के काम में आने वाले कास्मेटिक्स का विज्ञापन करवाते हैं जो एक पुरुष भी कर सकता है। और नारी भी न जाने किस होड में आगे निकलना चाहती है कि वह भी कपडे कम से कम पहनने को तैयार हो जाती है। पहले भी पिक्चर्स में हीरोइन पूरे कपडे पहनती थीं तो क्या वो सुन्दर नहीं लगतीं थीं । अब तो कपड़ों के नाम पर कुछ भी लटका कर अदायगी भर कर ली जाती  है। और माता पिता अपनी  इन बेटीयों को फख्र से देखते हैं। यदि बचपन से ही उनमें अच्छे संस्कार  डाले जाएं तो शायद यह स्थिती  न आए।इस सबके विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठाता ।  कितनी सहनशीलता आ गई है लोगों में कि यह सब देख कर उनका खून नहीं खौलता । नया जमाना , फैशन के नाम पर ये कैसी नग्नता फैलाई  जा रही है।  कैसा जमाना आ गया है। अपने आप में ही सोचते सोचते कब दादी निंद्रा मगन हो गई उन्हें पता ही नहीं चला।

हाँ इतना जरूर हुआ *कि बेटी सुमि ने अपने ड्रेसेस मम्मी को देकर बदलने के लिए कह दिया।

दादी की बातों पर शुभा ने भी रात को  

आत्म  मंथन किया। लड़कियों के साथ घटी कुछ ग़लत  घटनाएं उसके जेहन में घूम  गईं। वह सोचने लगी कि अभी तो सुमि छोटी है कुछ बड़े होने पर यदि उसने भी रात की पार्टीज में जाना  शुरू कर दिया तो**। यदि वह लड़कों के साथ पार्टीज में जाने की जिद करेगी तो क्या आधुनिक होने के नाम पर में उसे  जाने दूँगी। यादि उसके साथ कुछ ग़लत  हो गया तो ***यह सोच वह कांप उठी। उसे लगा जमाना कोई  सा भी हो, स्त्री की इज्जत  हमेशा दांव पर लग जाती है ।नहीं मैं अपनी सुमि के साथ ऐसा कुछ नहीं होने दूंगी। अब से मैं उसकी सुरक्षा कवच बन उसे सही राह पर चलने को प्रेरित करूंगी। दादी माँ सच ही तो बोल रहीं हैं कि सुमि अब बड़ी हो रही है मुझे उस पर ध्यान देना चाहिए। सुमि ही क्यों विभु भी तो बड़ा  हो रहा  है उसे  भी तो अच्छा संस्कार वान बेटा बनाना होगा नहीं तो वह भी गलत संगत में पड़कर अवारा हो गया तो वे क्या करेंगे। इन्हीं विचारों में विचरते वह कब नींद के आगोश में चली गई उसे पता ही नहीं चला।

 पर कल का सबेरा बड़ा ही खुशनुमा था।जब शुभा ने चाय-नाश्ता देने बाद सबके सामने कहा अम्मा आज आपकी बात मेरी समझ में आ गई है ।अब मैं अपने बच्चों का पूरा ध्यान रखूंगी। आधुनिक बनने की होड़ में, मैं भटक गई थी। 

दादी ने मुस्कराते हुए उसे गले लगाया और बोली बेटा न जाने ये कैसा जमाना  आ गया है। 

शुभा बोली जमाना कैसा भी हो अम्मा बच्चों में संस्कार, अपनी संस्कृति का मान  रखने की क्षमता, एक अच्छे नागरिक बनने के गुण तो होना ही चाहिए। 

कोई बात नहीं शुभा  तुमने देर से ही सही मेरी बात समझी तो सही ।जब जागो तभी सवेरा मेरे  बच्चों। पूरा परिकर दादी की बात सुन खिलखिला उठा।

 

शिव कुमारी शुक्ल

5-2-24

स्व रचित मौलिक एवं अप्रकाशित

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