आज गौरा का चित बड़ी चंचल था। खुशी दबाये न दब रही थी।
“क्या बात है भाभी… कोई कारु का खजाना हाथ लग गया क्या? बड़ी चहक रही हो! “
“ऐसा ही समझ लो”गौरा तेजी से निकल गई। वह जानती थी इन जलकुकडो़ को मन की बात बताना मतलब अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना।
बेटे की नौकरी लगते और बेटी के लिये अच्छा रिश्ता आते ही घर-बाहर खलबली मची हुई थी। आज तक सभी
ने परित्यक्ता गौरा को एक- एक पैसे के लिये कठोर परिश्रम करते देखा था…किंतु खुशी आज झलक रही है।
उसने प्रेम-विवाह किया था। इस बात से अनजान कि उसका पति पहले से शादी शुदा है ।मायके में मां-बाप ने गौरा को अपनी ओर से मृत घोषित कर दिया। संपन्न भाई-बहनों ने कलंकिनी का नाम दे किनारा कर लिया।
ससुराल वाले भला क्या अपनाते। प्यार में अंधी गौरा घर से रुपये गहने लेकर अपने फरेबी प्रेमी के साथ भागी थी।
जबतक गहने पैसे थे पति उसे बहलाता रहा… इसी बीच वह दो बच्चों की मां बन गई…
धीरे-धीरे पति की असलियत सामने आने लगी।
“तुम शादीशुदा हो। ” वह पति पर झल्ला उठी।
” हां तो… “पति बेशरमी से हंस पडा़।
गौरा क्रोध अपमान से चीख पड़ी,”इतना बड़ा धोखा… तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे बेवकूफ बनाने की। “
“बेवकूफ और तुम… जो लड़की अपनी ऐय्याशी के लिये अपने ही माता-पिता के रुपये गहने चुराकर घर से भाग सकती है… वह कितनी गिरी हुई होगी… यह मुझसे ज्यादा कौन जान सकता है। “
इस झटके ने गौरा को इस बेदर्द दुनिया के हकीकत से परिचित करा दिया। रोने-धोने से कोई फायदा नहीं… उसने अपने सगे माता-पिता को धोखा देकर स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी।
दोनों मासूम बच्चों का भविष्य… अपना संपूर्ण जीवन।
खैर, उसे होश आया… सब कुछ लुटाके।
फिर, उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा… हजार जतन कर, छोटे बड़े काम कर अपने बच्चों को पालने लगी। बच्चे मेधावी निकले…
बेटी बिदा कर बेटे के संग उसकी नौकरी पर आकर वह आह्लादित हो वह बुदबुदा उठी, “हे प्रभु… मेरी गलतियों को क्षमा करना… अब मैं गंगा नहाऊं !”
सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक रचना -डाॅ उर्मिला सिन्हा©®
👌👌
आपकी कहानींया हमेशा ही कुछ नयी सिख दे जाती हैं. ये तो सच हैं की ओरो की गलती से हमे सिख लेनी चाहिए पर कुछ लोग अपनी गल्तीयोसेही सिखते हैं. खैर गौरा का नसीब accha था जो उसके बच्चये अच्छये निकले. 😊🙏