नयी-नयी शादी हुयी थी कनिका की। पगफेरे की प्रथम रस्म के साथ ही पति देवेश के साथ वह शहर आ गयी थी साथ में सासूमाँ भी आयी थी ताकि आधुनिक कान्वेंट शिक्षित कनिका को घर सँभालना सिखा सकें।
सासूमाँ गाँव की भोली-भाली अपने उसी पुराने और सरल तरीके से काम करने वाली महिला थी। आजकल के इन नये,मँहगे काँच के बर्तनों का उपयोग वह क्या जाने? इससे इतर कनिका को रसोई में ये स्टील,ताँवे के बर्तन ओल्ड फैशन लगते थे। वह तो मँहगी-मँहगी क्राकरी से अपनी रसोई के सजा रही थी और सजाये भी क्यों न।एक तो नवविवाहिता दूसरे वह भी आज के जमाने की अतिशिक्षित नारी।
आफत तो बेचारी सासूमाँ की आ रही थी। अभी तक बहुत ही हल्के में बर्तनों से काम करने वाली सासूमाँ काँच का एक गिलास उठाने से पहले सौ बार सोचती थी।उनका पानी पीना भी मुहाल हुये जा रहा था। उस पर कनिका दिन में दस बार यह जरूर कह देती थी कि ‘मम्मी काँच के ये सारे बर्तन बहुत मँहगे हैं, इसलिये इन्हे सँभल कर काम में लेना।’
सासूमाँ की इस सहमी हुयी स्थिति से बेखबर कनिका अपनी ही दुनिया में मस्त थी। वह नहीं जान पा रही थी कि उसने सासूमाँ को कितना मानसिक तनाव दे रखा है।
आज देवेश के मित्र सपरिवार खाने पर आने वाले थे सो सुबह से ही सासूमाँ और कनिका रसोई में लगे हुये थे। शाम को डाइनिंग टेबल पर काँच का मँहगा वाला डिनर सेट लग गया था। मित्र के परिवार सहित सभी भोजन कर रहे थे।हँसी-मजाक के चलते माहौल हल्का-फुल्का था कि तभी काँच के गिलास में
पानी पीते हुये सासूमाँ के हाथ से अचानक पानी का गिलास गिर गया और टूट गया। यह देख कनिका झट से माँ पर चिल्लायी, ‘ माँ,आपको शुरु से ही कह रही हूँ न कि इन्हें सँभाल कर काम में लिया करो।ये आपके स्टील या लोहे के बर्तन नहीं हैं।”
सहम गयी थी सासूमाँ। देवेश भी मित्र के सामने कहाँ कुछ कह पाया था लेकिन दूसरे दिन सुबह उसने और कनिका ने देखा कि बिना कुछ कहे माँ ने अपनी अटैची लगा ली थी गाँव वापस जाने के लिये।
बहुत शर्मिंदा थी कनिका एकदम से अपना आपा खो देने के लिये और सासूमाँ से तीखा बोलने के लिये।
नया-नया बना यह रिश्ता अभी टूटा जाता है, यह सोच सिहर उठी कनिका और आँखों में आँसू लिये सासूमाँ के पैरों पर झुक गयी थी कनिका…
‘माँ, मुझे माफ कर दो कल के मेरे व्यवहार के लिये। मैं समझ नहीं पायी थी आपको।”
कनिका की आँखों से बहते आँसुओं की नमी ने जब सासूमाँ के पैरों को स्पर्श किया तो सबकुछ भूल उन्होनें कनिका को गले से लगा लिया और लाड लडाते हुये रुँधी वाणी में कहा, ‘बेटी से उसकी माँ कभी नाराज हो सकती है क्या? देवेश,आज हम माँ-बेटी को चाय तुम ही पिलाओ और वो भी काँच के कपों में।’
और कुछ देर बाद वातावरण में खिलखिलाहट अपनी पूरी सुगन्ध बिखरा रही थी।
अन्जना मनोज गर्ग
कोटा,राजस्थान
एक माफी ने रिश्ते सुधार दिये