Moral Stories in Hindi : ” विगत का सोचती हूँ तो एक सलाम खुद के लिये बनता है,क्योंकि एक गृहलक्ष्मी जिसे कुछ नहीं आता, वो आज अपनी किताब के विमोचन पर सबकी बधाइयाँ ले रही…., कहते है ना कि आदमी खुद अपना इतिहास रचता है, तभी तो आज वो भी अपने परिवार में इतिहास रच रही…”पीछे कुछ आवाजे अभी भी कानों में शोर मचाती है।
“हमारी ही किस्मत खराब थी जो ऐसी बालिका वधु से पाला पड़ा, माँ ने कुछ सिखाया नहीं, बच्चों की तरह शरारती है, गंभीरता तो है ही नहीं “सासु माँ की खींझ अक्सर ससुरजी पर उतरती।
“छोटी बहू निश्छल है, उसका दिल बहुत साफ है, उसके अंदर बड़ी बहू की तरह छल -कपट नहीं है,काम भी सीख जायेगी धीरे -धीरे, थोड़ा समय दो उसे… आखिर हमारे घर की लक्ष्मी है..”ससुर जी सासु माँ को समझाते।
“आप को मुबारक हो ऐसी गृहलक्ष्मी…. मुझे तो बिल्कुल पसंद नहीं, खाना बनाना नहीं आता, सिलाई -कढ़ाई नहीं आती, बस दिन भर किताब लिये पढ़ती रहती…..”सासु माँ ने कटुता से कहा।
कमरे में सुन रही बहू की आँखों में आँसू आ गया। कोशिश तो कर रही है नये परिवेश में ढलने में,पर कम उम्र और परिवेश की भिन्नता दोनों ही आड़े आ रही।
शहर में पली छोटी बहू, पिता की अंतिम जिम्मेदारी थी, सो उन्होंने जिम्मेदारी उतारने पर ध्यान दिया बेटी की उम्र और पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया। ध्यान तो ये भी नहीं दिया कि गांव में उनकी लाड़ली कैसे सामंजस्य बैठाएगी,अपनी लक्ष्मी को , दूसरे घर की गृहलक्ष्मी बना, वे अपने कर्तव्यों से मुक्त हो गये।
पति को खाने का शौक, पर छोटी बहू खाना बनाने में अनाड़ी, पति से भी वो हौंसला अफजाई उस समय नहीं मिलती थी, हाँ छोटी बहू की निश्छलता ससुर जी को ही नहीं पति को भी जरूर प्रभावित करती।ससुर जी एक बार बेटे की गृहस्थी देखने आये तो बेटे को भी माँ की तरह टोकते और डांटते देख वहाँ तो कुछ नहीं बोले, पर अलग से बेटे को समझाया, “वो सब सीख लेगी, उसके अंदर लगन है…,उसे डांट कर नहीं प्यार से समझाया करो, गृहलक्ष्मी को खुश रखों, दुखी नहीं, तभी घर खुशियों से भरा रहेगा।”
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फिर क्या पति निशांत ने पिता की बात गांठ बांध ली..।और शिखा भी एक परफेक्ट गृहलक्ष्मी बनने की कोशिश में लग गई…।
शिखा की कमजोरी किताबें थी, उन्ही किताबों में रसोई के कालम में मन लगा कर रेसिपीज पढ़नी और बनानी शुरु की, जब जो कुछ मौका मिला, सीखने की कोशिश की…. अब वो बहुत चीजों में पारंगत हो गई.., खाने की तारीफ मित्र ही नहीं रिश्तेदार भी करने लगे,जो सासु माँ दिन भर डांटती अब उन्हें छोटी बहू के गुण दिखने लगे। क्योंकि छोटी बहू की बनाई पेंटिंग हो या खाना हो, एक परवाह, अपनापन सबमें दिखता था…।उसका परफेक्ट गृहलक्ष्मी बन सबका प्रिय बनने का सपना पूरा हो गया।
लोग कहते, “अच्छा तो आप हाउसवाइफ है, बहुत समय होता होगा आपके पास…”शिखा उदास हो जाती, जीवन में क्या बाहर जा कर काम करना ही सब कुछ है…।
शिखा में कुछ अलग सा गुण भी था, कभी महिलाओं की टोली में न बैठती, लाइब्रेरी से किताबें ला उन्हें पढ़ने में ज्यादा रूचि थी। हिन्दी के सुन्दर शब्दों को बोलते देख एक दिन पति ने कहा “तुम लिखना शुरू करो.. अच्छा लिख सकती हो “बस फिर क्या था… पहले पत्रिकाओं में भेजा, फिर ऑनलाइन शुरु हुआ…। शिखा गृहलक्ष्मी से लेखिका बनने की ओर अग्रसर हो गई।
. और एक गृहलक्ष्मी सोच ले तो क्या नहीं कर सकती…. शिखा कई मंचों से प्राइज जीतने लगी, कहीं कैश तो कहीं गिफ्ट के रूप में मिले प्रोत्साहन राशि से उसका हौंसला बढ़ता गया …, समय का सदुपयोग कर कुछ पाना उसे आत्मनिर्भर बना गया….. कौन कहता है कि नये आगाज़ के लिये पढ़ाई या उम्र या बाधक है…!!ना…. कुछ भी बाधक नहीं गर हौसलों में उड़ान की ललक हो…।
शिक्षित कहलाने के लिये सिर्फ डिग्री होना जरुरी नहीं है, क्योंकि जीवन की पाठशाला में आप सीखना चाहेंगे तो बहुत कुछ सीख जायेंगे…। बस ईमानदार रहिये, अपने रिश्तों के प्रति, अपने कर्तव्यों के प्रति..।
—-संगीता त्रिपाठी
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