ये कहानी एक साधारण भारतीय परिवार की लड़की प्रीति की है । अपने नाम के अनुकूल प्यारी सी है प्रीति दो बहनो और एक भाई के बाद उसका जन्म हुआ था । हालाँकि उसके माता पिता चौथा बच्चा नही चाहते थे पर उसकी दादी चाहती थी एक और लड़का हो जाये बस इसी कारण प्रीति का जन्म हो गया हालाँकि उसके जन्म पर कोई खास खुश नही था। क्योकि उसके माता पिता तो और बच्चे चाहते नही थे और तीसरी बेटी तो बिल्कुल नही रही उसकी दादी की बात उन्हे तो पहले ही दो लड़कियों नही सुहाती थी अब तीसरी भी आ गई।
खैर अब जब जन्म हो ही गया तो पालन पोषण भी होने लगा पर प्रीति को ये बात जरा ना सुहाती कि उसे या उसकी बहनो को हमेशा भाई से कमतर आंका जाता है । कभी कोई चीज कम हो तो वो छोटी होने के बावजूद प्रीति को नही मिलती बल्कि उसके भाई चिराग को मिलती है वो इस बात का विरोध भी करती पर तब उसे दादी की चार बात सुनने को मिलती क्योकि चिराग अपनी दादी का खास लाडला था जिनके आगे प्रीति की तो क्या उसके माता पिता की भी नही चलती थी। पर वो जितना अपने घर मे भेदभाव देखती उतनी ज्यादा विरोधी होती जा रही थी।
धीरे धीरे प्रीति चौथी कक्षा मे आ गई । उसकी बड़ी बहन सलोनी उसे संज्ञा के बारे मे समझा रही थी ।
” देख
मोहन दिल्ली घूमने जाता है ।
सीता खाना बनाती है ।
रजत बंदूक से खेलता है ।
गौरी गुड़िया से खेलती है ।
बता इन सबमे संज्ञा कौन सी है ?” सलोनी ने पूछा।
” दीदी एक बात बताओ यहां पर
सीता दिल्ली घूमने जाती है और मोहन खाना बनाता है या गौरी बंदूक से खेलती है और रजत गुड़िया से खेलता है क्यो नही लिखा ?” अचानक प्रीति ने सवाल किया ।
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” अरे बुद्धू खाना हमेशा लड़कियां बनाती है लड़के थोड़ी और गुड़िया से भी लड़कियां खेलती है । लड़के तो या तो घूमने जाते है या बन्दूक से खेलते है ।” सलोनी के बोलने से पहले ही उनका भाई चिराग बोला।
” क्यो लड़कियों के क्या पैर नही होते जो वो घूमने नही जा सकती या खाने पर लिखा होता है उसे बस लड़कियां बनाएंगी !” प्रीति मुंह चिढ़ा कर भाई से बोली।
” देख तो बित्ते भर की छोकरी कैसे बात बनाये है । ठीक तो कहे है मेरा लाडेसर खाना तो छोरियाँ ही बनाये है और गुड़ियों से वो इसलिए खेले है कि उन्हे बचपन से बच्चे संभालने की आदत पड़ जाये क्योकि कल को बड़े हो उन्हे माँ बनना होता है !” प्रीति की बात सुन दादी बोली।
” तो दादी लड़के भी तो पापा बनते है फिर उन्हे भी गुड़ियों से खेलना चाहिए तभी तो वो बच्चे संभाल पाएंगे और टीवी मे तो बंदूक लड़कियां भी चलाती है फिर किताब मे क्यो नही लिखा ये ।” प्रीति ने तर्क किया।
” छोरे बड़े हो कमाने जाते है बच्चे संभालने या खाना बनाने का काम औरत का ही है समझी तू पर लगता है टीवी देख कर तेरा दिमाग़ खराब हो गया है !” दादी भी मानो पीछे हटने के मूड मे नही थी ।
” कमाने तो मैं भी जाऊंगी बड़ी होकर इसलिए मैं अकेली खाना नही बनाउंगी ना बच्चे संभालूंगी !” प्रीति गुस्से मे बोली।
” हे राम अभी से क्या लख्खन है इस छोरी के बड़ी होकर तो ये खानदान की नाक ही कटा देगी !” दादी कानो पर हाथ रखकर बोली।
” दीदी इस किताब मे गलत लिखा है मुझे नही पढ़नी ये किताब ।” दादी की बात को नज़रअंदाज़ करती प्रीति बहन से बोली । उसके बालमन को समझ नही आ रहा था कि किताब मे ऐसा क्यो लिखा है कि खाना लड़की बनाती है लड़के घूमने जाते है । लड़की गुड़िया से खेलती है , लड़के बन्दूक से खेलते है ।
“बेटा बात तो तू सही कह रही है आज जमाना बदल गया पर किताब मे अभी भी वही चला आ रहा जो हमारे समय मे चला आ रहा था।” इतनी देर से दूसरे कमरे मे लेटे प्रीति के पिता चंदन वहाँ आ बोले।
” क्या कहे है तू किताब गलत हो गई और तेरी ये बित्ते भर की छोरी सही। सिर पर ना चढ़ा इसे वरना नाचने लगेगी वहाँ ये ।” दादी बोली।
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” दादी मैं पापा के सिर पर नाचूंगी तो गिर ना जाऊंगी !” प्रीति मुंह बना कर बोली।
” देख तो जरा कितनी जबान चलती है इसकी !” दादी गुस्से मे बोली।
” माँ क्यो बच्ची से बहस कर रही हो । वैसे भी उसने कुछ गलत नही कहा । गलत तो हम लोग है जो शुरु से लड़का लड़की मे भेद करते है !” चंदन बोला।
” हाँ तो छोरे बुढ़ापे का सहारा होते है । जबकि छोरियाँ तो दूसरे घर चली जाती है।” दादी बोली।
” माँ यही सोच तो बदलनी है अब लड़कियां भी वो सब कर रही जो लड़के करते है । अब लड़कियां फ़ौज मे भरती हो बन्दूक भी चला रही है और अकेले घूमने भी जा रही है । घर चलाने को बाहर नौकरी भी कर रही है और माता पिता की देखभाल भी कर रही है। अब समय है बदलाव का साथ ही किताबों मे भी बदलाव आना चाहिए ये लड़का लड़की का भेद मिटना चाहिए। प्रीति बेटा मैं किताब तो नही बदल सकता पर अब इस घर मे ये भेद नही होगा ये वादा तुम तीनो बहनो से जरूर कर सकता हूँ !” चंदन माँ से बोल प्रीती से बोला।
“पर पापा मैं तो पेपर मे यही लिखकर आऊंगी की मोहन खाना बनाता है और सीता बंदूक से खेलती है !” मासूम प्रीति आँख मटका कर बोली उसकी बात सुन सब हंस दिये और दादी बड़बड़ा उठी।
दोस्तों पता नही आप मेरी कहानी से कितना इत्तेफाक रखते है पर मेरे मन मे शुरु से यही ख्याल आता था कि किताब मे हमेशा यही क्यो लिखा होता की लड़कियां खाना बनाती है , या गुड़ियों से खेलती है और लड़के बंदूक से या क्रिकेट खेलते है जबकि ये दोनो खेल तो लड़कियां भी खेल सकती है। क्या कहीं ना कहीं इससे लड़कियों से भेदभाव नही हो रहा ? अब वक्त है इसमे बदलाव लाने का क्योकि अब लड़कियां भी किसी चीज मे पीछे नही ।
मेरी कहानी को ले आपकी क्या राय है बताइयेगा जरूर
आपकी दोस्त
संगीता अग्रवाल