अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं मिल पाने के कारण पंकज ने कुछ दिन नौकरी किया और घर पर बैठ गया।
जाने क्यों उसका इस तरह से घर पर बैठना घरवालों की आंखों में चुभने लगा।
जो माता-पिता जन्म दिए थे वहीं उसे एक बदले हुए अंदाज में दिखने लगे।
एक अदद नौकरी की तलाश में देखते देखते एक साल गुजर गया और इस बीच कलावती जी की तबियत इतनी खराब हो गई कि,पंकज चाहकर भी नौकरी करने नहीं जा सका क्योंकि घर में मां के सिवा कोई भी स्त्री नहीं थी जो मां की देखभाल कर सके।
आनन-फानन में पंकज की शादी भी सिर्फ इसलिए करनी पड़ी कि बहू आ जाए तो घर के साथ-साथ सास को भी संभालें।
इस तरह से एक बेरोजगार पति की पत्नी बन कर जब सोनाली ससुराल आई तो उसके हर कार्य को उसकी योग्यता के स्थान पर पति की बेरोजगारी की नजर से आंका जाता…
सोनाली हमेशा ये बात महसूस करती पंकज से इस बारे में बात भी करती मगर वो इस बात पर ध्यान नहीं देता।
धीरे-धीरे सोनाली और पंकज एक बेटी के माता-पिता भी बन गए…
थक-हार कर पंकज ने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया।
शायद उसकी किस्मत में हीं उसकी योग्यता के अनुसार वेतन मिलना नहीं लिखा था।
जहां छोटे भाई अच्छी नौकरी और अच्छे पैसे कमाने लगें वहां बड़े भाई की नाकामी हर किसी को खटकती है।
देवरानियां जब सोनाली को कोई ताना मारती तो वो उसे एक शूल की तरह चुभती…
हर संभव प्रयास कर के भी जाने क्यों पंकज को एक अच्छी नौकरी नहीं मिल पाई।
एक साधारण से स्कूल में शिक्षक की नौकरी करते हुए परिवार पालने को मजबूर पंकज आज भी परिवार वालों की आंखों में खटकता है।
एक असफल व्यक्ति सबसे अधिक अपने हीं लोगों की आंखों में खटकता है यहीं प्रकृति का नियम है।
आज के इस बदलते दौर में पैसा एक ऐसी चीज है जो इंसान की हर अच्छाई पर भारी पड़ने लगा है।
दूसरों की क्या बात करें जन्म देने वाले माता-पिता भी कमाऊ बच्चों के लिए अलग सोच रखने लगे हैं।
पंकज को हर बार महसूस होता परिवार वालों की आंखों में खटकना परंतु
ये सब महसूस करते हुए भी पंकज और सोनाली बस इसलिए संयुक्त परिवार में रहने को विवश हैं कि परिवार में रहकर कम से कम दो वक्त का खाना और सर पर छत तो मिल रही है।
स्वरचित -डोली पाठक