होली आने में इतने कम दिन बचे हैं, एक हफ्ता ही रह गया है,और घर में इस बार कोई माहौल ही नहीं दिख रहा है कहीं कोई उत्साह ही नहीं है, बच्चे भी गुमसुम से लग रहें हैं।आज आशीष जब ऑफिस से आया तो उसने इस बात को महसूस किया और सोचने लगा की क्या हो गया है ऐसे तो कभी नहीं हुआ।
होली के त्यौहार में रोहिणी अपने बच्चों के साथ बिल्कुल बच्चा बन के होली खेलती है।आशीष उच्च पदस्थ इतनी व्यस्त नौकरी के चलते त्यौहार, घर-परिवार सबकी जिम्मेदारी रोहिणी खुशी-खुशी देखती है। उसने सोचा कहीं तबीयत तो नहीं खराब हो गई है मैं इसकी तरफ सच में ध्यान नही दे पा रहा हूं।ये सोचते हुए आशीष कहता है
-“रोहणी घर में त्यौहार का मुझें कोई उत्साह ही नहीं दिख रहा है, बच्चे भी उदास से बैठे हुए हैं, मैं मानता हूं कि मैं बहुत व्यस्त रहता हूं,अच्छा बताओ क्या करना है? चलो बाजार चलते हैं सारा सामान लेकर आते हैं।होली के त्यौहार में मुझे तुम्हारी धमा-चौकड़ी की आदत है और ऐसा शांत माहौल मुझे बिल्कुल नहीं अच्छा लग रहा है।
उसकी बात सुनकर रोहिणी ने अपनी उदास पनीली आंखों से आशीष की तरफ देखा और कहा-” आशीष मुझे मां की बहुत ज्यादा याद आ रही है पिछले साल पिताजी रहे नहीं थे तो मैं मां के पास थी लेकिन इस बार तो मैं नहीं जा सकती, हमें अपने घर में भी होली देखना है तुम्हारी पूरी मित्र मंडली आती है,हमारे जो स्थानीय रिश्तेदार है
वह भी आते हैं इसके अलावा बच्चे भी यहीं खेलना चाहते हैं।मुझे समझ में नहीं आ रहा है क्या करूं? उसकी बात सुनकर आशीष बोलता है-” हम ऐसा करते हैं मम्मी को यहां बुला लेते हैं इसमें कौन सी बड़ी बात हैं। आशीष मैंने सबसे पहले यही बोला मम्मी को पर तुम जानते हो ना मम्मी इस मामले में थोड़े पुराने ख्यालों की है
इस कहानी को भी पढ़ें:
वह एकदम से त्यौहार में अपने लड़की दमाद के घर नहीं आएंगी। फिर मम्मी ने कहा कि पापा के जाने के बाद उनकी यादें हैं और आसपास के लोग हैं होली का दिन भी निकल जाएगा। पर आशीष में जानती हूं मम्मी अकेले में बहुत रोएंगी मुझे बार-बार उनका चेहरा याद आ रहा है।रोहिणी की बात सुनकर आशीष कहता है- हां सही कह रही हो मम्मी जी के अपने विचार है
और उन्हें बदलना इतना आसान नहीं होगा चलो कुछ सोचते हैं।तुम इतनी परेशान मत हो तुम्हारी तबीयत खराब हो जाएगी अभी तो सो जाओ। इधर आशीष की आंखों से नींद गायब हैं वो बार-बार यही सोच रहा था कि इतने साल हो गए आज शादी के पर वह दामाद से बेटा नहीं बन पा रहा है। अब समय आ गया कि वह अपने व्यवहार में तब्दीली लाए और एक सही निर्णय लेते हुए
सो जाता है।दूसरे दिन आशीष ऑफिस जाता है और वहीं से रोहिणी को फोन कर के कहता है- मुझे बहुत जरूरी काम से 2 दिन के लिए बाहर जाना पड़ रहा है। मैं आकर पूरी मदद कर दूंगा अकेले तुम परेशान नहीं होना ठीक है।अपना ध्यान रखना।मैं सीधे ऑफिस से ही निकल रहा हूं।ऑफिस के लड़के को भेज रहा हूं तो उसके हाथ से सामान भिजवा दो।
आशीष का फोन सुनकर रोहिणी परेशान हो जाती है अभी ऐसे ही मेरा मन अच्छा नहीं है और इनको जाना पड़ रहा है, फिर सोचती है चलो ठीक है काम भी बहुत जरूरी है और उसे यह भी यकीन है की आशीष ने जैसा कहा था कि अकेले सब मत कर लेना मैं आकर तुम्हारी मदद करूँगा तो उसे यह विश्वास है आशीष पर इतने व्यस्त रहते हैं पर जब-जब उसे जरूरत महसूस होती है
वह उसके साथ होते हैं। 2 दिन बाद आशीष का फोन आता है रोहिणी मेरा सब काम अच्छे से हो गया मैं आज शाम को पहुंच जाऊंगा।ये सुनकर वो और बच्चे तीनों मिलकर उसके आने का इंतजार करने लगते हैं।शाम को दरवाजे की घंटी बजती हैं रोहिणी दरवाजा खुलती है और सामने मां को देखकर एकदम ही आश्चर्य में पड़ जाती है
और खुशी से मां से लिपट जाती हैं,अरे मम्मी तुम कैसे? रोहिणी और बच्चों की तरफ बहुत प्यार से देखते हुए मम्मी कहती है कि आशीष दामाद नहीं बेटा बन कर आया था। उसने मेरी उन पुरातन मान्यताओं जिसमें मैं जकड़ी हुई थी मेरे दिमाग से खत्म कर दिया।रोहिणी मैं कितनी भाग्यवान हूं कि मुझे आशीष जैसे दमाद मिला है
और तुम भी हो। तुम्हारा दुख ,परेशानी उस से देखा नहीं गया और उसने इस बात को समझा। कितना अंतर्मुखी है आशीष यह मुझे भी पता है लेकिन तुम्हारे लिए, हम सबके लिए उसने अपना यह व्यवहार बदला और मुझे अच्छे से समझाया कि आप यहां अकेले ऐसे त्यौहार में रहोगी तो आपकी बेटी ,नवासे और दामाद कोई भी वहां खुश नहीं रहेगा।
हमारी परंपराएं कुछ बहुत अच्छी और कुछ का कोई मतलब नहीं है उन्हें बदलने में ही समझदारी है।आशीष की बातों का नतीजा है आज मैं तुम्हारे सामने हूँ। मम्मी की बात सुनकर रोहिणी बहुत ही खुश होती है और वह आशीष की तरफ कृतज्ञ आंखों से देखती हैं।
इतने दिनों से वो उदास आंखें जिनमें सिर्फ दुख के आंसू आ रहे थे आज वे आंसू कब मोती बन के खुशी के आंसू के रूप में झरने लगे उसे पता ही नहीं चला। होली के खुशनुमा रंगों की तरह ही पूरा घर खुशी के रंगों से भर जाता है।
कविता अर्गल इंदौर (म.प्र.)