आज जो मैं बताने जा रही हूं, वह कोई कहानी नहीं, बल्कि एक हकीकत बयां करता फुटपाथ से घर तक की यात्रा का प्रसंग है।
ट्रिंग ट्रिंग… किसी अपरिचित का फोन था, तीन या चार जुलाई 2024 को, अशोक वाशिष्ठ ने व्यस्तता के चलते फोन रिसीव नहीं किया।अगली सुबह उन्होंने ट्रू कॉलर पर देखा तो किसी संगीता भट का फोन था। उन्होंने उस अपरिचित महिला को फोन मिला कर फोन करने का कारण जानना चाहा तो पता चला कि वह महिला सोशल वर्कर है,
और बताया कि, अमुक पेशेंट को भर्ती करना है, जो कि सड़क पर खराब स्थिति में मिला है। उसकी हालत बहुत खराब है पता चला है कि उन्हें हाइड्रोसिल की समस्या है। उन के लिए यह जानना जरूरी था कि आप इसे राजकीय चिकित्सालय में भर्ती क्यों नहीं करवा रहीं। तब उसने बताया कि उस व्यक्ति के पास आधार कार्ड नहीं है,
जो कि भर्ती प्रक्रिया के लिए आवश्यक है, महिला ने जिला कलेक्टर को भी बताया और कलेक्टर साहब ने भा. वि. प. चिकित्सालय के संरक्षक महोदय से फोन पर बातचीत कर कहा कि, इस मरीज की समस्या का निदान किया जाए। उन्होंने ने हॉस्पिटल सचिव को फोन कर कहा कि इस मरीज को कुछ कर सकते हैं? अंततोगत्वा सचिव ने सोशल वर्कर से बात करके उसे भारत विकास परिषद हॉस्पिटल बुला लिया।
अस्पताल आने के बाद देखा, तो उस बुजुर्ग मरीज की हालत बहुत ही गंभीर दिख रही थी। पूछने पर उन्होंने बताया कि न तो उनके पास आधार कार्ड है, ना ही उसका अपना कोई है। ऐसा लग रहा था कि वह बुजुर्ग जीवन की ढलती सांझ में कई दिनों से नहाया भी नहीं था। पूरे शरीर पर गंदगी, दाढ़ी बढ़ी हुई, पैरों में चप्पल नहीं, कपड़े गंदे और अस्त व्यस्त थे।
इस कहानी को भी पढ़ें:
चिकित्सालय सचिव (अशोक वाशिष्ठ) ने मेल नर्सिंग स्टाफ सुप्रिटेंडेंट से कहकर उन्हें नहलवाया, शौच आदि से निवृत करवा उन्हें हॉस्पिटल से ही भर्ती मरीज वाले कपड़े पहनने को दिए। जिससे डॉक्टर को दिखाते हुए कुछ तो ठीक लगे। फिर डॉ रामवतार व डॉ भारद्वाज, दोनों ने उसका इलाज/ऑपरेशन किया।
वह लगभग छः दिन चिकित्सालय में भर्ती रहा। लेकिन इसी बीच उसके परिजन भी आ गए और घर ले जाने की मांग करने लगे, कहने लगे कि हमें इनका इलाज नहीं करवाना। तब उसकी पत्नी, बेटा, बेटी सबको समझाया गया कि बीमारी गंभीर है, और सारा खर्चा चिकित्सालय वहन कर रहा है। तब जाकर वे समझे और इलाज शुरू हुआ।
और इस के बाद उस व्यक्ति का आधार कार्ड भी आ गया। सबसे बढ़िया बात यह रही की छः दिन बाद पूर्णरूप से ठीक होने पर उसके परिजन उसे अपने साथ घर ले गए।
बाद में पता चला की इस पूरे एपिसोड में इस व्यक्ति के नाम कुछ जमीन है, जिसे उसकी पत्नी, बेटी, बेटा सभी चाहते थे कि वह व्यक्ति वसीयतनामा करके जमीन उनके नाम कर दे। अपने समय में वह बहुत अच्छा कारीगर रहा है। उसका खुद का मकान संपत्ति आदि है, और उसकी पत्नी उसे छोड़कर किसी दूसरे व्यक्ति के साथ चली गई है। बड़ा अफसोस होता है ऐसी हालत देखकर, देखा जाए तो कई बार आंखों देखा हुआ भी सच नहीं लगता। यह कहानी है ढलती सांझ में फुटपाथ से घर तक की यात्रा की।
__ मनु वाशिष्ठ कोटा जंक्शन राजस्थान
#ढलती सांझ