” मम्मा कुहू के जन्मोत्सव का कार्यक्रम किस जगह रखना है ?” केशव ने अपनी माँ कामिनी जी से पूछा।
” अरे कार्यक्रम कुछ नही बस हवन करेंगे क्या फायदा हो हल्ला करके कौन सा लड़का हुआ है !” कामिनी जी मुंह बनाते हुए बोली।
” पर मम्मा भाभी की पहली बेटी के होने पर भी तो जश्न मना था ना इतना अच्छा होटल बुक किया था आपने और पापा ने!” केशव हैरानी से बोला।
” हां तो ? तब घर मे पहला बच्चा हुआ था भले लड़की थी पर पहले बच्चे की खुशी अलग होती है इसलिए जश्न मनाया गया। पर कुहू घर की तीसरी लड़की है उसकी बार मे भी जश्न मना कर जग हंसाई थोड़ी करवानी है वैसे ही जो सुनता वो अफ़सोस ही करता है कि तीसरी भी लड़की आ गई घर मे !” कामिनी जी बोली। कामिनी जी की बात सुन केशव चुप हो गया क्योकि वो माँ के सामने ज्यादा बहस नही कर पाता था।
दरअसल कामिनी जी के दो बेटे थे बड़ा कृष्णा छोटा केशव । कृष्णा और उसकी पत्नी नीलिमा के दो बेटियां है। नीलिमा दो बेटियां पैदा करने के कारण सास के निशाने पर रहती है । इधर केशव का विवाह दो साल पहले हुआ था और अभी पंद्रह दिन पहले उसकी पत्नी सुरुचि ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया था। तो पोते के सपने देख रही कामिनी जी को अब तो बहुत निराशा हुई थी। उसी बच्ची को सब प्यार से कुहू बुलाने लगे थे । उसी के नामकरण संस्कार पर केशव दावत करना चाहता था जिसे कामिनी जी ने सिरे से नकार दिया था। और केशव अपनी माँ के सामने ज्यादा नही बोल पाता था इसलिए चुप हो गया।
फिलहाल के लिए केशव ने सुरुचि को भी समझा दिया और घर मे छोटा सा हवन कर दिया गया।
” ये इतना सब क्या ले आई बहु तुम और केशव तो कुहू को टीका लगवाने गए थे ?” कुहू के डेढ़ महीने की होने पर उसके इंजेक्शन लगवा कर आई सुरुचि के हाथ मे बैग देख कामिनी जी ने पूछा !
” मम्मी जी देखो हम लोग कुहू के लिए कितना कुछ लाये है !” सुरुचि ने खुश होते हुए सारा सामान वहाँ फैला दिया। जिसमे छोटे छोटे कपड़े , खिलौने और बच्चे के इस्तेमाल होने वाला बाकी सामान था।
” अरे इतनी सी बच्ची के लिए इतना सामान …हद करते हो तुम लोग् क्या जरूरत थी इतना सामान लाने की तुम्हारी जेठानी की बेटियों का सामान भी तो पड़ा है वो इस्तेमाल कर लेती । घर की तीसरी लड़की के लिए कौन इतना करता है लड़का होता तो बात अलग थी !” कामिनी जी मुंह बनाती हुई गुस्से मे बोली। माँ का गुस्सा देख केशव तो चुप हो गया किन्तु आज सुरुचि को बहुत बुरा लग रहा था जबसे कुहू हुई है कितनी बार वो सुन चुकी थी तीसरी लड़की तीसरी लड़की।
” मम्मी जी माफ़ कीजियेगा कुहू भले इस घर के लिए तीसरी लड़की है , वो भले आपके लिए तीसरी पोती है पर मेरे और केशव के लिए हमारा पहला बच्चा है जिसके ख्वाब हम लोग कबसे सजा रहे थे । आपको भले अपनी तीसरी पोती के होने पर अफ़सोस हुआ पर हमें अपनी पहली संतान के होने की बहुत खुशी है ।..अभी तक कुहू भाभी की बेटियों के पुराने कपड़े ही पहन रही थी बस कुछ कपड़े उसकी नानी के घर से आये थे नये। अब हम लोग अगर चाहते है कि हम अपनी पहली संतान के लिए अपनी पसंद से अपनी खुशी से हर चीज लाये तो क्या गलत कर रहे है ? ” सुरुचि शालीनता से बोली।
” घर मे इससे पहले दो लड़कियां और है तो उनका छोटा हुआ सामान बेकार ही तो जायेगा ना !” कामिनी जी तुनक कर बोली।
” मम्मी जी पुराना सामान किसी गरीब को भी दिया जा सकता है जब हम सक्षम है तो क्यो ना अपनी पहली संतान ने लिए सब कुछ अच्छे से अच्छा करे जैसे नीलिमा भाभी ने अपनी पहली संतान के लिए किया होगा। तब तो बल्कि उसका नामकरण संस्कार भी धूमधाम से हुआ जबकि मेरी पहली संतान का वो भी नही हुआ इसी बात का अफ़सोस है मुझे । अब प्लीज आप मुझे मेरी संतान के लिए भी मेरे मन की करने दीजिये वरना सारी जिंदगी मन मे एक फांस रहेगी मेरे !” सुरुचि इस बार भी शालीनता से पर दृढ शब्दों मे बोली।
” नीलिमा की बेटी घर की पहली संतान थी इसलिए उसके लिए सब हुआ !” कामिनी जी गुस्से मे बोली।
” हां तो कुहू मेरे और केशव की पहली संतान है जिसके होने की हमें बहुत खुशी है। इसलिए उसे भी वही सब मिलेगा …नामकरण संस्कार नही हो पाया कोई बात नही पर उसका पहला जन्मदिन मैं धूमधाम से मनाऊंगी क्यो केशव तुम भी तो यही चाहते हो ना तो बोलो ना मम्मीजी को !” सुरुचि सास से बोल अपने पति को देखते हुए बोली।
” हां… हां माँ सुरुचि नही मेरा मतलब हम चाहते है अपनी बेटी के लिए सब करना और ये हमारा फर्ज भी है और हक भी!” केशव हकलाते हुए ही सही बोल पड़ा।
” और हां मम्मीजी आप कुहू को घर की तीसरी बेटी समझने की जगह हमारी पहली संतान समझिये बस इतनी विनती है आपसे !” सुरुचि हाथ जोड़कर बोली और बैग उठा अंदर चल दी। नीलिमा जो दो बेटियां पैदा करके सास की नज़र मे अपराधी बनी हुई थी वो भी सुरुचि को अपनी बेटी के लिए बोलता देख मुस्कुरा दी।
दोस्तों अक्सर ये होता है घर मे दो या तीन बहुए हो और पहली बहु के बेटियां हो ऐसे मे अगर दूसरी के भी बेटी हो जाये तो खुशी की जगह अफ़सोस मनाया जाता है । उसे घर की तीसरी बेटी का नाम दे दिया जाता है जबकि अपने माँ बाप की तो वो पहली संतान होती है और पहली संतान की तो खुशी ही अलग होती है। हर माँ बाप अपनी संतान के लिए सब अच्छे से अच्छा करना चाहते है पहली बार माँ बाप जो बने होते है फिर क्या फर्क पड़ता है बेटी के या बेटे के। आज भले समय बदल रहा है पर कुछ घरों मे आज भी बेटे भले कितने हो जाये पर बेटी तीसरी तो क्या दूसरी भी जन्म ले तो अफ़सोस ही होता है ऐसा क्यो ???
#अफसोस
आपकी दोस्त
संगीता अग्रवाल