केतकी, स्वभाव से अक्खड और जिद्दी थी लेकिन बहुत सुंदर और पढ़ी-लिखी।
पढ़ाई खत्म करने के बाद वह एक जॉब कर रही थी। माता-पिता और भाई अजय की लाडली। जो भी कमाती थी अपने कपड़ों, मेकअप और ज्वेलरी आदि पर खर्च कर देती थी।उसकी मां उसे समझाती थी कि कुछ बचत करना सीखो। बचत बहुत काम आती है। पिता और अजय उसे कुछ नहीं कहते थे क्योंकि आर्थिक रूप से मजबूत थे।
समय आने पर केतकी के लिए एक बहुत अच्छे परिवार से कार्तिक का रिश्ता आया। अच्छा संस्कारशील परिवार और इतना अच्छा लड़का देख कर इन लोगों ने रिश्ते के लिए हां कर दी। केतकी और कार्तिक ने भी एक दूसरे को पसंद कर लिया। पहले धूमधाम से सगाई हुई और फिर विवाह संपन्न हुआ।
कार्तिक अपनी जॉब के कारण दिल्ली में रहता था जबकि उसके माता-पिता चंडीगढ़ में रहते थे। केतकी और कार्तिक के विवाह के कुछ समय बाद उसके माता-पिता अपने घर लौट गए और अब केतकी को ऐसा लग रहा था कि वह स्वतंत्र हो गई है। हालांकि कार्तिक के माता-पिता टोका टोकी करने वाले और पुराने ख्यालों के बिल्कुल नहीं थे, फिर भी केतकी उनके जाने से खुश थी।
ऑफिस से छुट्टियां खत्म होने के बाद उसने जॉब पर जाना शुरू कर दिया। कार्तिक ने उसे कहा यदि चाहो तो जॉब छोड़ सकती हो। लेकिन वह नहीं मानी। अब वह और ज्यादा खर्च करना अपना हक समझने लगी थी। अपनी तनख्वाह तो उडाती ही थी, साथ ही कार्तिक से भी खर्चा मांगती रहती थी।
नई-नई शादी थी,भला कार्तिक क्या ही कहता। उसने सोचा धीरे-धीरे सीख जाएगी। कुछ समय बाद उसे केतकी की फिजूल खर्ची खटकने लगी थी। शॉपिंग करना उसकी एक लत बन चुकी थी। कार्तिक जल्द से जल्द अपना एक फ्लैट खरीदना चाहता था और कंपनी के दिए फ्लैट को छोड़ना चाहता था क्योंकि उसे लगता था कि जब संतान हो जाएगी तो खर्च बढ़ जाएगा और घर बनाना मुश्किल हो जाएगा।
केतकी कुछ समझना ही नहीं चाहती थी। जो चीज पसंद आ गई वह उसे चाहिए ही चाहिए चाहे उसकी जरूरत हो या ना हो। कार्तिक समझा समझा कर थक चुका था। अब दोनों के बीच में तू तू मैं मैं होने लगी थी।
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केतकी महीने के आखिर तक अपनी सैलरी उड़ा देती थी। इस बार भी उसने यही किया। और एक ड्रेस खरीदने के लिए जिद करने लगी।
केतकी-” कार्तिक अपना क्रेडिट कार्ड दे दो मुझे शॉपिंग करनी है, मेरी सहेली सुनैना की शादी है, मुझे ड्रेस लेनी है। ”
कार्तिक-” इतनी सारी ड्रेस हैं तुम्हारे पास और वह भी सारी नई, अभी तुमने शायद सबको पहना भी नहीं होगा। उन्ही में से एक ड्रेस पहन लेना। मुझे फालतू खर्च नहीं करना। मुझे अपना घर लेने के लिए पैसे जमा करने हैं और फिर भी मुझे कुछ लोन लेना पड़ेगा। ”
केतकी-” जब भी तुमसे कुछ मांगो, तुम यही रोना रोते हो। ”
कार्तिक को गुस्सा आ गया।-उसने कहा-” अगर इतना ही शौक है तो अपनी सैलरी सोच समझ कर खर्च क्यों नहीं करती हो, क्या तुम्हें पहले से शादी के बारे में पता नहीं था? ”
केतकी-” तुम किस बात के पति बने हो, क्या एक ड्रेस भी दिलवा नहीं सकते। ”
कार्तिक-” तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे पहली बार मुझे कुछ मांग रही हो, शादी के बाद कितना कुछ तुम्हें दिलवा चुका हूं। तुम्हारी अलमारी भरी हुई है कपड़ों से, समझा करो केतकी। ”
ऐसा कहकर कार्तिक खाना खाए बिना सोने चला गया और केतकी ने चुपचाप उसके पर्स से क्रेडिट कार्ड निकाल लिया। सुबह कार्तिक ऑफिस चला गया और दोपहर में ₹100000 खर्च होने का मैसेज आया। वह गुस्से में तमतमाया हुआ घर आया। घर पर केतकी की खुशी से चहक रही थी और कार्तिक को अपना पार्टी गाउन दिखा रही थी।
कार्तिक ने गुस्से से कहा-” तुमने एक ड्रेस पर ₹100000 खर्च कर दिया, पागल तो नहीं हो गई हो तुम, कोई कम पैसों वाला ड्रेस नहीं ले सकती थी। ”
केतकी -“इतना क्यों चिल्ला रहे हो, गाउन सिर्फ 80000 का है बाकी तो नेकलेस और मेकअप है। ”
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ऐसा फालतू खर्च केतकी कई बार कर चुकी थी इसीलिए कार्तिक का गुस्सा सातवें आसमान पर था और उसने केतकी को करने के लिए हाथ उठाया, लेकिन खुद को रोक लिया मारा नहीं।
इस बात को लेकर केतकी ने अपने भाई को फोन किया और नमक मिर्च लगाकर बात बताई। उसका भाई अजय आया और कार्तिक को खरी खोटी सुना कर केतकी को अपने साथ ले गया और तलाक की धमकी भी दे गया। उसने यह भी कहा कि मेरी बहन मुझ पर बोझ नहीं।
घर जाने पर मां ने केतकी को कहा कि उसने घर छोड़कर गलत किया है और इतना महंगा ड्रेस लेने की भी गलती की है। उन्होंने अजय को भी डाटा, लेकिन केतकी वापस नहीं गई। पापा को उसकी बहुत चिंता रहने लगी थी। वह तनाव में बीमार रहने लगे। उन्होंने भी केतकी को बहुत समझाया और आखिरकार एक दिन हार्ट फेल हो जाने के कारण चल बसे।
उधर कार्तिक परेशान था क्योंकि वह केतकी से बहुत प्यार करता था। उसे लग रहा था कि मैं हाथ उठाकर शायद गलती कर दी। कभी उसे लगता कि मैंने सही किया है। बहुत उलझन में था, बेचारा कंफ्यूज हो गया था कि क्या करूं क्या नहीं। क्या केतकी को मना कर वापस लाऊँ।
इधर अजय की शादी में,मायके में रह रही केतकी की वजह से अड़चन आ रही थी। अब अजय भी इरिटेट हो रहा था। केतकी का अभी भी वही हाल था। अपने पैसे उड़ाने के बाद अपने भाई से पैसे मांगती थी। आखिर एक परिवार वालों ने अजय के लिए अपनी लड़की से शादी के लिए हां कर दी। केतकी अपने भाई की शादी में बहुत खुश थी। उसकी भाभी चंचल घर आ चुकी थी।
धीरे-धीरे उसने अजय को समझा दिया था कि केतकी को ज्यादा पैसे मत दिया करो। कल को हमारे भी बच्चे होंगे, उनका भविष्य भी तो देखना है। तुम्हारी बहन से कहो कि अपने घर जाए। हम कब तक उसका बोझ उठाएंगे।
अजय अब केतकी से मुंह मोड़ने लगा था और खर्चा भीसोच समझ कर देता था।इधर केतकी अपने स्वभाव के कारण ऑफिस में झगड़ा करके आ गई थी और उसकी नौकरी चली गई। अब तो वह पैसों के लिए इतनी ज्यादा परेशान थी कि पूछिए मत। मां बेचारी क्या करती, वही तो केतकी को समझाती रहती थी।
एक दिन केतकी को बाजार में एक चप्पल बहुत ज्यादा पसंद आई। घर आकर उसने अजय से ₹1000 मांगे। इतने में चंचल अंदर से आकर बोली,-” देखो बुरा मत मानना, हम नहीं दे सकते 1000, जो मांगना है अपने पति से जाकर मांगो। क्या तुम्हें दिखता नहीं कि मैं प्रेग्नेंट हूं। हमारे आगे हजारों खर्च पड़े हैं। हमारे लिए सर दर्द बनी बैठी हो, कभी यह चाहिए कभी वह चाहिए, तुम्हारी तो मांगे ही पूरी नहीं होती। ”
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अब केतकी को समझ आ रहा था कि ₹1000 के लिए उसे कितना सुनना पड़ रहा है और उसने कितने आराम से ₹100000 उड़ा दिया था। तब भी कार्तिक ने उसे कभी बोझ नहीं कहा था। 100000 उडाने पर कार्तिक का नाराज होना स्वाभाविक था और फिर उसने पहली बार किसी चीज के लिए मना किया था। अपना घर अपना ही होता है। सारी गलती मेरी ही है।
मेरा सिंदूर ही मेरा सम्मान है और मेरा ताज है। सिंदूर के बिना, पति के बिना, मेरा कोई सम्मान नहीं, यह अब मुझे समझ आ रहा है। यह घर मेरा होते हुए भी मेरा नहीं। मैं आज शाम को ही अपने घर चली जाऊंगी और कार्तिक से माफी मांग लूंगी। मुझे विश्वास है वह दिल का बहुत अच्छा है, वह मुझे माफ कर देगा। ”
उसने माँ से भी कह दिया था। मां की आंखों में आंसू थे, लेकिन खुशी के। वह अपना सामान पैक करके सीढी से उतर ही रही थी कि उसने देखा, सामने से कार्तिक सीढ़ी चढ़ता हुआ आ रहा है।
दोनों एक दूसरे को देखकर रो पड़े और एक दूसरे के गले लगकर माफी मांगी। केतकी ने कहा-” कार्तिक, मुझे माफ कर दो, और मुझे मेरे घर ले चलो। ”
कार्तिक -” चलो जल्दी चलो, तुम्हारा घर तुम्हारा इंतजार कर रहा है। ”
स्वरचित, अप्रकाशित, गीता वाधवानी दिल्ली