नयी दिशा – सरोज देवेश्वर : Moral Stories in Hindi

माँ ओ माँ कहाँ हों?  सुधा ने लगभग चिल्लाते हुए घर में प्रवेश किया. पसीने से लतपथ , भूख से बेहाल सीधे  रसोई की तरफ मुडी ही थी कि  सामने से अचार का मर्तबान हाथ में पकडे आती हुई ताईजी के साथ टकराई और मर्तबान उनके हाथ से छूट जमीन पर गिर टुकड़े टुकड़े हों गया मर्तबान टूटा देख ताई कि क्रोधग्नि भड़क उठी. अरी अमृता,  देख तेरी छोरी ने ये क्या कांड

    कर दिया. मै न  कहती हूँ इसे कुछ अक्ल दे, पराये घर जाकर नाक ही कटवाएगी. कमरे में बैठी अमृता  जेठानी के चिल्लाने की आवाज़ सुन लीं थी और अंदाज़ा भी लगा लिया था  कि  आज फिर सुधा  ने कोई गड़बड़ की  है जो जिज्जी ऐसे गुस्से से चिल्ला रही हैं. कमरे से बाहर आते ही जो दृश्य देखा तो समझते देर न लगी.

          हाय राम,  ये क्या किया ! सुबह से जिज्जी ने  इतनी मेहनत कर अचार बनाया तूने सारी मेहनत पर पानी फेर दिया. क्या करूँ इस  लड़की का. रोज़ के अपमान और तानों से परेशान अमृता ने उसके गाल पर तमाचा जड़  दिया. क्यों री तुझको दिखाई नहीं देता?  वह रुआंसी सी हों अपने कमरे में चली गई

              जिज्जी आप रहने दे,  मै साफ करती हूँ. अब तुम ही तो करोगी. इस  मरे अचार के पीछे घड़ी भर भी आराम नहीं किया  कहती हुई अपने कमरे में चली गई.

पता नहीं क्लास में कैसे इतनी देर बैठती होगी.. जेठानी के ताने सुन सुनकर स्वयं को अपमानित महसूस कर रही थी. बिना बाप के बेटी को पालना क्या इतना आसान हैं.

              सुधा,  पढ़ाई में काफी होशियार थी. अव्वल

बच्चों में नाम आता था. शरारती भी बहुत थी  परिवार के सब बच्चों में हर लिहाज़ से आगे थी, इसीलिएअमृता  सबके ताने सुनकर भी सुधा  को ज्यादा कुछ न कहती. पर आज न जाने कैसे उसका हाथ उठ  गया. सुधा भी इस अचानक  हुए माँ के बदलाव को झेल न पाई और तिलमिला गई.

                  अमृता के जीवन में आशा कि किरण एक सुधा ही तो थी. मर्तबान के टुकड़े समेटते हुए वो अपने दिल के टुकड़े के बारे में ही सोचती जा  रही थी. रोज कोई न कोई ऐसी घटना उसे चोट पहुंचा ही देती. ऐसे कैसे  नैया पार होगी. ताई तो पहले ही निर्णय कर चुकी थी कि हाइस्कूल के बाद पढ़ाई बंद  कर घर के कामकाज सीखे.

                   ये सुनते ही सुधा का पारा चढ़ गया वो कोई ऐसी बात मानने को तैयार नहीं थी जो उसके भविष्य में बाधक हो. वाद विवाद प्रतियोगिता में अपने तर्को के द्वारा सभी को परास्त करने वाली ऐसा तर्क रखती कि सामने वालें को कोई जवाब न सूझता.

               वह जानती थी मंजू दीदी के साथ क्या हुआ. ताई जी  ने अठारह वर्ष की  होते होते उसे ब्याह दिया.

ना पढ़ाई पूरी कर पाई न घर के कामकाज ढंग से सीख पाई. ज़ब भी मायके आती अपने दुखड़े सुनाती, कमरे में बैठकर घंटो रोती. ताईजी बेटी को नये नये गहने बनवाकर  उसकी कमजोरियों पर पर्दा डालने की कोशिश करती. ये सब बातें सुधा पूरी तरह से समझ नहीं पाती थी, परन्तु जीजाजी ज़ब भी मंजू को लेने आते तब तब  ये जरूर कहते थोड़ा और पढ़ा दिया  होता तो हमारे कस्बे में स्कूल में कहीं टीचर लग जाती. ताई बड़े प्यार से दामाद को बैठाकर समझाती बेटा  इतने बड़े घर में ब्याही हैं पैसों की क्या कमी हैं ! घरबार सभालेगी, परन्तु उसे घर भी  कहां सभालना आता था . गलती करती और अपमानित होती  रहती.

                  सारे के सारे तर्क धरे रह गए ज़ब मंजू के आत्महत्या की मनहूस खबर मिली. ताई सिर पीटतीउसके  ससुराल वालों को कोसती रही. तब से सुधा ने ठान लिया अपना हश्र दीदी जैसा नहीं होने देगी, चाहे उसे बगावत क्यों न करनी पड़े. पिताजी के चले  जाने के बाद उसे और उसकी माँ को क्या क्या सहना पड़ा .

                 रात में ज़ब माँ उसे सोया जानकर उसका माथा चूमकर कहती मेरी बेटी असहाय नहीं हैं मै हर पल उसके साथ हूँ उसे पढ़ लिखकर आगे बढ़ना हैं. सुधा ये सुनकर अपने भीतर एक अनजानी शक्ति महसूस करती. अमृता जोड़तोड़ कर उसे पढ़ाई के साथ कुछ अन्य कोर्स भी करवा रही थी. आत्म रक्षा के लिए हफ्ते  में दो दिन जूडो कराते क्लास में जाती जहां उसने अन्य लड़कियों की  अपेक्षा जल्दी सीख लिया था.

                  हाई स्कूल का नतीजा आने वाला था उसे अपने भविष्य की चिंता सता  रही थी. फिर एक दिन समय ने करवट लीं. एक दिन रास्ते में उसके कराटे सिखाने वाले गुरूजी से भेट हुई. बोले सुधा बेटा पास के कस्बे में एक लड़कियों का आश्रम हैं,  वहाँ दस दिनों के लिए किसी महिला कोच की आवश्यकता हैं. तुम अगर जा सकती  हों तो मै तुम्हारा नाम प्रस्तावित कर सकता हूँ. इस तरह तुम्हारा अभ्यास भी जारी रहेगा. रहने और खाने की फ्री व्यवस्था हैं और वेतन भी मिलेगा.

                 सुधा की डूबती नाव को सहारा  मिला. गुरूजी को घर से आज्ञा लेने का कहकर वो दुगुनी तेजी से घर की ओर रवाना हुई. उसके पैर जमीन पर नहीं पड़  रहे थे. घर पहुंचकर माँ का हाथ पकड़ तेज़ी से कमरे में लें गई और दरवाजा बंद करदिया. अमृता हैरानी से उसे देखते हुए पूछा क्या बात हैं? माँ क्या तुम मेरा साथ दोगी?  सुधा बोली. सिर्फ हफ्ते दस दिन की बात हैं. और फिर विस्तार से सारी बात बताई.

                     अमृता घबराकर उठ ख़डी.नहीं कभी नहीं तेरा दिमाग़ खराब हों गया हैं. अगले महीने तुझे लडके वाले देखने आनेवाले हैं. मैंने सोचा था उनसे तेरी आगे पढ़ने की इच्छा जाहिर करूँगी तब ये रिश्ते के लिए हाँ कहूंगी. पहले ही ताईजी तुझसे इतनी नाराज़ रहती हैं फिर रिस्ता भी उन्ही के मायके की तरफ से आया हैं नहीं नहीं ये न होगा भूल जा  सब. सुधा इतनी आसानी से कब हिम्मत हारने वाली थी कहने लगी माँ चार पांच दिन रहकर देखूंगी वरना लौट आऊँगी.

                          माँ को हर तरह से आश्वस्त कर दिया.

 अब तायाजी और ताईजी को मनाना था. सुबह ज़ब सोकर उठी तो सामने ताऊजी को देखकर उसे सकारात्मक शगुन प्रतीत हुआ. वैसे ताऊजी कम बोलते थे परन्तु अपने छोटे भाई की बेटी के साथ उनका दिली जुड़ाव था. ताई के डांटने पर वो धीरे से उसे स्नेहपूर्वक समझाते. जिसे सुनकर उसका सारा रोष पिघल जाता. ताई का अक्खड़ स्वभाव और बेटी की असमय मौत ने उन्हें रिश्तों के प्रति कुछ उदासीन सा कर दिया था.

      ताऊजी ने करीब आकर पूछा बेटा कल तुम्हारा रिजल्ट हैं मुस्कुराते हुआ बोले क्या सोचती हों  कैसा होगा?  मौका देख पास आकर बोली ताऊजी पेपर  तो बहुत अच्छे हुए हैं देखें कल क्या होता हैं . फिर आनन फानन में आगे की पढ़ाई की इच्छा और दस दिन की कराटे सिखाने जाने की बात कही.वे चौंककर  बोले नहीं नहीं लोग क्या कहेंगे क्या हम तुम्हारी ठीक से देख भाल नहीं कर सकते? . अभी तुम बच्ची हों.

                         सुधा ने उनके सामने अनेक तर्क रखे. आजकल लड़कियां  बहुत कुछ सीख रही हैं  समयानुसार कई चीजें बदल रही हैं. आपके लिए तो मै हमेशा बच्ची ही रहूंगी. न ठीक लगा तो शीघ्र ही लौट आऊँगी. ताऊजी ठगे से खड़े उसके तर्क सुन रहे थे और सोच रहे थे जिस बच्ची को अपने हाथों में खिलाया वो आज उन्हें बच्चो की तरह समझा रही हैं. मंजू दीदी का उदाहरण देकर उन्हें लाज़वाब कर दिया.

                        इसी बीच फ़ोन की घंटी बजी उन्होंने रिसीवर उठाया सामने से उनके ससुराल वालों का ही फ़ोन था कहा दामादजी लड़के वाले अगले महीने के अंत तक ही आ पाएंगे. कहकर फोन रख दिया. ताऊजी के पलटते ही सामने सुधा आकर ख़डी हों गई उन्होंने मुस्कुराते हुए सुधा के सिर पर हाथ रखा और तेजी से बाहर निकल गए. सुधा ने पचास प्रतिशत सफलता पा लीं थी. ताई को मनाना ही टेड़ी खीर थी.

                    ताई अपने कमरे में कोई धार्मिक पुस्तक पढ़ रही थी  मौका देख पीछे से आकर ताई के गले से लिपट  गई.ताई अचानक हुई इस हरकत पर हैरान थी बोली ये क्या  बचपना हैं कोई खुराफ़ात कर आई हों क्या?

              क्यों ताई मै इतनी बुरी हूँ क्या? क्या मै अपनी ताई से  प्यार नहीं कर सकती क्या? उसके प्रश्नों की झड़ी से निरुत्तर हों ताई सोचने लगी इस लड़की को मै दिनरात कोसती हूँऔर कहीं मेरा मज़ाक़ तो नहीं उड़ा रही. चल हट ये चोचले मुझे जरा भी पसंद नहीं. सुधा तो जैसे तय करके आयी थी ताई कितना झूठ बोलती हों !आपका चेहरा  कुछ और बता रहा हैं और ताई की धार्मिक पुस्तक माथे से लगा बगल में तिपाई पर रख दी. ताई के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर बोली मै आपको बहुत परेशान  करती हूँ ना क्या मै यहाँ से दूर चली जाऊं.शायद मेरा जाना बेहतर होगा.

                       वे परेशान होकर बोली क्या बात हैं लड़की बहुत बोल रही हों कहाँ चलीं जाओगी. कोई तेरी माँ का रिश्तेदार हैं जो तुझे लें जा रहा हैं. ताई की कड़वी बात सुनकर  भी अनसुनी कर दी. ताई का चेहरा अपने हाथों में लेकर बोली आपके सिवा हमारा कौन हैं ताईजी?

जो कुछ अपने मेरे और माँ के लिए किया और कौन कर सकता हैं. येन केन प्रकारेण ताई को भावुक करने में सफल रही.

                       ताई उसकी बातें सुन मंदमंद मुस्कुरा रही थी .सुधा बोली ताई मुझे पार्ट टाइम मे नौकरी मिल रही हैं फिर सिल सिलेवार पूरी बात बताई. ताई ने उसे प्रेम धकेलते हुए कहा ऐसी क्या आफत आ गई थी जो तुझे नौकरी करनी करने की सूझी. तूने कराटे कब सीखा मुझे पता नहीं. ना- ना ये ठीक नहीं जवान लड़की को इस तरह अकेले भेजना ठीक नहीं.

                   ताई ब्लैक बैल्ट होल्डर हूँ यानी मारपीट करने में एक्सपर्ट  हंसती हुई बोली. इसका मतलब तू वहाँ मारपीट करना सिखाएगी. नहीं ताई ये रक्षा कवच हैं हर लड़की को सीखना चाहिए. अकेले ही अपनी रक्षा कर सके. ताई क्षमा करना अगर दीदी को ये सीखा दिया होता तो आज वो हमlरे बीच होती.

                    ताई ध्यान से सारी बातें सुन रही थीऔर सोच रही थी कितनी समझदारी की बातें करती हैं. कुशंकाओं और भेदभाव के बादल छट चुके थे  आगे बढ़ने का रास्ता साफ था. प्रेम और प्यार  ने मन की मैल धो दी थी.

                   ताई ने उठकर सुधा को गले लगा लिया. आँखों से झरझर आँसू बह रहे थे. दरवाजे पर ख़डी अमृता फ़टी आँखों से यह दृश्य देख रही थी. आज उसने आत्मसम्मान कायम रखते हुए ताई को एक नई दिशा दिखाई थी.      

                      Saroj devesher

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