कॉलेज में पहुंचते ही अमन कीआंखें निशा को खोजने लगती थीं। दोनों का कॉलेज का आखरी साल था। निशा शहर के प्रसिद्ध डॉक्टर अमरीशकी बेटी थी। जिनका खुद का एक बहुत बड़ा अस्पताल था। निशा को पैसेकी कोई कदर न थी और ना ही पढ़ाई-लिखाई में कोई रुचि। सिर्फ एक डिग्री प्राप्त करना उसका मकसद था। निशा सुंदर बहुत थी, इतनी सुंदर की जो कोई देखे तो देखता ही रह जाए।
पैसा और सुंदरता दोनों का नशा उसे पर चढ़कर बोलता था। अमन एक गरीब घर का बेटा, जिसके लिए जिम्मेदारियां तैयार खड़ीथी। पढ़ाई में नंबर वन, दिखने में सिंपल लेकिन स्मार्ट।
उसे पहली नजर में ही निशा भा गईथी। जबकभी किसी वह उसे दिखाई ना देती, तो वह बेचैनहो जाता। हालांकि निशा ने उससे कभी बात भी नहीं की थीं। एक बार निशा केबीमार होने पर उसकी सहेली मीनू को अमन ने सारे नोटस दे दिए और कहा कि निशा को अपनी तरफ सेदे देना, मेरा नाम मत लेना।
मीनू सब समझ गई और अमन को लगी छेड़ने।”ओ हो क्या बात है, निशा का इतनाध्यान। वह तो तुमसे कभी बात भी नहीं करती है, और फिर भी जब उसके दीवाने हुए जा रहे हैं।”
अमन थोड़ा शरमा कर बोला-“अरे मीनू ऐसी कोई बात नहीं है, मैं तो बसइतना चाहता हूं कि उसकी पढ़ाई का नुकसान ना हो।”
इतनीदेर में बाकी दोस्त भी आ गए और मिलकर मस्ती करने लगे”अमन, निशा से तेरी सफारिश हम कर दें क्या?”
अमन हंसकर कहता है-“अरे जाओ, मुझे क्या जरूरत है तुम्हारी सिफारिश की, जो कहना है खुद ही कह दूंगा।”
फिर आया प्रेम दिवस यानी कि वैलेंटाइन डे। मीनू ने मजाक मजाक में एक ग्रीटिंग कार्ड आई लव यू वाला, अमन का नाम लिख कर निशा के बैग में रख दिया।
निशा ने उस कार्ड को देखकर मीनू से कहा-“सारे दोस्तोंको और अमन को कॉलेज के गार्डन में बुलाकर लाओ।”
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मीनूने कुछ कहना चाहा, लेकिन निशाने कुछ भी सुनने से इनकार कर दिया और कहा किबाद में बात करेंगे।
मीनू ने अमन को ग्रीटिंग कार्ड के बारे में सच्चाई बता दी और उसे गार्डनमें आने को कहा। अमन ने सिर्फ इतना कहा-“मीनू, यह तूने सही नहींकिया, मैं आना तो नहींचाहता, लेकिन तेरी खातिर आ जाऊंगा।”
सबके गार्डन में पहुंचने पर निशा ने अपना ऐसा रूप दिखाया कि सब हैरान रह गए। उसने कार्ड हाथमें लेकर सबको दिखाते हुए कहा-“मेरे दोस्तों जानते हो यहक्या है, यह है थ्री मैजिकल वर्ड्स वाला कार्ड, यानी कि आई लव यू वाला कार्ड, और जानते हो यह किसने दिया मुझे, इस कॉलेज के सबसे बड़े गरीब और भिखारी खानदान के लड़के अमन ने। फिर अमन के पास जाकर बोली-“तूने औकात देखी है अपनी, ऑटोरिक्शा चलाने वाले के बेटे। तेरी इतनी हिम्मतहुई कैसे। मैं चाहूं तो अभी तेरी कंप्लेंट करके तुझे निकलवा दूं, लेकिन फिर सोचती हूं कि बेचारा 1 साल की फीस दोबारा कहां से भरेगा। तू ग़रीबी का कीड़ा है कीड़ा और तेरी औकात फूटी कौड़ी की भी नहीं है मेरे सामने।”
सारे दोस्तों को बहुतबुरा लगा। मीनू ने बीचमें निशा को टोका भी-“निशा मेरी बाततो सुन, यह कार्ड मैंने —–,”
निशा-“तू चुप रह, बीच में कुछ मत बोल।”निशा को जो मन में आया बोलती चली गई और अमन का बहुत अपमान किया।
मीनूको बार-बार अपने मजाक पर अफसोस हो रहा था, वह बार-बार अमनसे माफी मांग रही थी। अमन मन ही मन कुछ निर्णय ले रहा था।
कॉलेज का आखरी साल पूरा हुआ। सब अपने-अपने अलग-अलग रास्तों पर चले गए। निशा की तो मानो पढ़ाई से जान छूटी। उसके पापा ने एक अमीर खानदान में उसकी शादी करवा दी। उसका पति रवि शराबी था। एक दिन शराब पीकर उसकी हालत इतनी खराब हुई कि उसे बचाया न जा सका। निशा को तो कुछ आता था नहीं, इसीलिए वह पति का बिजनेस संभाल न सकी और वह भी डूब गया। निशा ने पहली बार दुख और पैसे की तंगी को देखा था। वह बार-बार अपना रोना रोते हुए पापा के पास आ जाती थी। अब पापाको भी अपनी परवरिश में कमियां नजर आनेलगी थी। लेकिन काफी देर होचुकी थी।
इधर अमन को निशा की बातें इतनी चुभ गई थी, कि उसने पढ़ाई में रात-दिन एक कर दिया और आई ए एस अधिकारी बन गया। एक सुंदर और पढ़ी-लिखी लड़की रेवती से उसने शादी कर ली।
एक दिन निशा, अपने पापा से मिलने किसी काम से अस्पताल आई और वहां उसने अमन को देखा। वह वहां अपनी गर्भवती पत्नी को चेकअप के लिए लेकर आया था। निशा के मुंह से एकदम निकला -“अरे अमन तुम”
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अमन को ऐसी आशा नहीं थी कि निशा उससे बात करेगी। अमन ने कहा-“जी मैडम, एक गरीब, भिखारी ऑटो ड्राइवर का बेटा, आपने जो मुझे मेरी औकात याद दिलाई थी, उसके लिए आपका धन्यवाद, वरना मैं आज जो हूं, शायद वो ना होता।”
ऐसा कहकर वह अपनी पत्नी का हाथ पकड़ कर वहां से चला गया और निशा शर्मिंदा सी जड़वत वहां खड़ी रह गई।
स्वरचित, अप्रकाशित गीता वाधवानी दिल्ली
End was not as per expectation.