सीमा अधिकतर चुप ही रहती, कम बोलती,काम ज़्यादा करती, सभी लोग उससे उम्मीद रखते हैं कि समय से काम करे। क्या बाहर का, क्या घर का हरेक काम निपटा ही लेती है। घर में शांति बनी रहती और सभी लोग अपने अपने काम में मस्त रहते।
खाने की टेबल पर रोज़ तीनों की पसंद का खाना तीनों टाइम परोसना कोई माजक नहीं पति कहते कि दो बच्चे और दो हम बस चार लोगों के काम भी तुमसे नहीं संभलते, बेटे कहते मां बस, दो चार साल ही आपको और हम जंगलियों को झेलना है फिर हम आपको कष्ट नहीं देंगें।
शादी के बाद प्रेम विवाह और अरेंज मैरिज में कोई अंतर नहीं होता विवाह बस विवाह है जिसमें दो व्यक्ति अलग अलग विचार लिये जुड़ जाते हैं।
परिवार की गर्ज है पूरी तो करनी ही होगी फिर ये परिवार ही तो उनकी धरोहर है। बाकी उसकी पढ़ाई लिखाई,पिता का लाड़ प्यार, माँ की स्नेहहिल बातें, सहेलियों के हँसी ठठा, सब कुछ दिल की पिटारी में कैद हो चुका है।
सब कुछ दिया भगवान ने पर चैन नहीं है सीमा को। आखिर क्यों अपने भाग्य को कोसती रहती है। पति विशाल बहुत अच्छा कमाते हैं नामी व्यापारी हैं, सोसाइटी में नाम है उनका, अक़्सर सीमा को भी पार्टियों में साथ ले जाते हैं वहाँ भी सीमा अनमनी सी रहती है। कभी खुशी महसूस क्यों नहीं कर पाती। पति ने कई बार ये कह उसे टोका भी है कभी तो खुश रहा करो क्यों बेचैन आत्मा की तरह सिर्फ़ भटकती ही रहती हो। उनका कहना है कि सीमा को खुश करना नामुमकिन है। हाँ उसे खुश रखना किसी की जिम्मेदारी कैसे हो सकती है ये काम तो सीमा का है सब को खुशियां बाँटना।
बचपन में पापा, मम्मी ने लाड़ प्यार से पाला, पढ़ाया सारे सुख दिए परन्तु शादी करते समय सीमा ख़ुद ही ग़लती कर बैठी। उसने डेंटिस्ट की शिक्षा प्राप्त की और शादी से पहले बड़ी मेहनत से क्लीनिक खोली वहीं एक दिन उसकी मुलाकात विशाल से हुई वो अपने पिता को इलाज़ के लियें लाये थे इलाज़ के दौरान विशाल से हुई मुलाकात में सीमा कब विशाल से आकर्षित हो गई पता ही नहीं चला विशाल भी सीमा को बार बार मिलने को ललायित रहने लगा और दोनों ने विवाह करना तय किया।
बस उसी प्रेम विवाह का परिणाम है उसकी उदासी।
करीब दो वर्ष ही सीमा अपनी क्लिनिक चला पाई पहले बेटे आशीष के जन्म के बाद क्लिनिक बंद बराबर हो गई सीमा वहाँ कभी जाती कभी नहीं जाती। विशाल से जब भी बच्चे को कुछ समय देने की बात कहती ताकि खुद क्लीनिक ठीक से संभाल पाए विशाल सीधे ही मना कर देते साथ ताना भी मार देते कि “डेंटिस्ट” का काम बहुत ही बेकार काम है उसमें कमाई कम मेहनत अधिक लगती है। इससे तो घर रहना ही अच्छा है।
मन मसोस कर दूसरे बेटे मयंक के जन्म के बाद क्लीनिक पर सदा के लियें ताला जड़ दिया और पूरी तरह गृहस्थी सँभालने लगी। आज तक यही दुःख उसे कचोटता रहता हैं पढ़ लिख कर भी एक अनपढ़ ही रह गई। मम्मी पापा उसका दुःख समझते थे पर वो इस गहरी चोट को नासूर बनने से रोक नहीं सके।
बड़े बेटे ने विशाल के विरोध के बाबजूद डॉक्टर की पढ़ाई की और अगले वर्ष खुद की क्लीनिक खोलने की उसकी योजना है। तीन चार दिन से सीमा से कह रहा है कि हम एक बड़ी सी जगह लेंगें वहाँ तीन डॉक्टर प्रेक्टिस करेंगें एक डॉ आशीष, दूसरी डॉ सीमा व तीसरी उसकी होने वाली पत्नी डॉ रुबिका जिसने स्त्रीरोग विशेषज्ञ की शिक्षा पाई है। डॉ रुबिका का जिक्र आते ही सीमा थोड़ा सकपकाई बेटे ने शादी करने का निश्चय भी ले लिया और उसे पता भी नहीं।
वैसे ऊपरी तौर पर सीमा ने आशीष के इस निर्णय से खुशी जताई परन्तु क्लीनिक में साथ काम करने से साफ मना कर दिया क्योंकि वो ख़ूब समझ रही है कि बेटा क्लीनिक के काम की जिम्मेदारी सीमा पर छोड़ना चाहता है जिसके लियें वो कभी तैयार नहीं होगी इतने वर्षो में तो कभी नहीं कहा कि माँ आप अपना क्लिनिक खोलो अब अचानक माँ को सम्मानित किया जा रहा है और भला बनने का ड्रामा किया जा रहा है सीमा ने रोम रोम में एक झनझनाहट महसूस की। आह.. स्वार्थ कितना कठोर होता है…..
सीमा को अंदाजा था कि एक न एक दिन आशीष की योजना पर घर में मीटिंग अवश्य होगी। उसका सोचा सही निकला। मीटिंग में सीमा, विशाल, आशीष और रुबिका शामिल रहे। छोटा बेटा मयंक अमेरिका पढ़ाई करने गया हुआ है। उसे पिता के काम को लार्ज स्केल पर बढ़ना है।
वैसे भी उसे अमेरिका में ही सेटल होने का शौक है।
मीटिंग में रुबिका की उपस्थिति से सीमा बहुत अटपटा महसूस कर रही थी। घरेलू मसले में उसका क्या काम परन्तु बेटा और पति जो चाहें वही उचित होगा। सब अपने मंसूबे बनाने लगे। विशाल ने भी खुशी खुशी पैसा लगाने को पूरी तरह तैयारी कर ली।
प्लान पूरा सीमा के सामने आया परंतु उसने किसी से कुछ नहीं पूछा न किसी ने उसकी राय जाननी चाही। हमेशा की तरह उसकी चुप्पी को हाँ माना जाने लगा।
अचानक सीमा अपनी बात कहने लगी “डॉक्टर का काम कोई रोटी बेलने जैसा नहीं आशीष जब चाहे आटा छोड़ दो जब चाहे आटे की रोटी बनाने लगो। पच्चीस वर्ष से घरेलू जिंदगी बिता रही हूँ डॉक्टरी की ए बी सी भी भूल चुकी हूँ तुम और रुबिका डॉक्टर होते हुए भी ये कैसे सोच सकते हो कि मैं क्लिनिक चला लूंगी। अखबार में विज्ञापन देकर कोई अच्छी सहायिका तलाश लो…..
सबके चेहरों के भाव देखने को एक पल भी वहां नहीं रुकी अपने कमरे में जा दरवाज़ा बंद कर शान्ति से लेट गई। आत्मा से सारे बोझ उतर गए स्वार्थ को आईना जो दिखा आई थी। निश्चय किया परिवार के स्नेह में अब और अंधी नहीं रहेगी। स्वाभिमान अभी मरा नहीं।
“पच्चीस वर्ष से घरेलू जिंदगी बिता रही हूँ डॉक्टरी की ए बी सी भी भूल चुकी हूँ तुम और रुबिका डॉक्टर होते हुए भी ये कैसे सोच सकते हो कि मैं क्लिनिक चला लूंगी। अखबार में विज्ञापन देकर कोई अच्छी सहायिका तलाश लो…..
सबके चेहरों के भाव देखने को एक पल भी वहां नहीं रुकी अपने कमरे में जा दरवाज़ा बंद कर शान्ति से लेट गई। आत्मा से सारे बोझ उतर गए स्वार्थ को आईना जो दिखा आई थी। निश्चय किया परिवार के स्नेह में अब और अंधी नहीं रहेगी। स्वाभिमान अभी मरा नहीं।
अब आगे…
सीमा जानती है थी कि विशाल को उसका ऐसा व्यवहार बिल्कुल पसंद नहीं आयेगा और वो कई दिन तक मुंह फुलाए रहेगा। हमेशा ही अपनी नाराजगी दिखाने का बस यही तरीका है उन के पास। सीमा ने भी ठान रखा था पिछले दिनों की तरह वो अपनी कही बात पर कोई सफाई नहीं देगी और ना ही हमेशा की तरह दूसरों की बात मानेगी।
आशीष को मां से ऐसी उम्मीद नहीं थी वो तो हरेक परिस्थिति में परिवार को चुपचाप धैर्य से संभाल लेती है। “मम्मी आप प्रेक्टिस मत करना बस कुछ समय काम जमाने में मदद कर देना।” आशीष ने आज फिर बात छेड़ दी।
सीमा उसे कोई जबाव दिए बिना अपना काम करती रही। देखना चाहती है कि बेटा क्या क्या बोलता है।
मम्मी को चुप देख आशीष झुंझला कर बाहर चला गया। विशाल दूर खड़े कड़ी निगाह से सीमा को देखने लगे। आत्मविश्वास की एक दृष्टि उन पर डाली और अपने काम में लगी रही। वो अच्छी तरह से जानती है कि उस की सहायता के बिना अकेला आशीष कुछ नहीं कर पाएगा। असलियत यह थी कि सीमा ने सब का बोझ अपने कंधे पर उठा रखा था। विशाल तो सदा से काम में व्यस्त रहते हैं और उन्हें बस हुकुम देना ही पसंद है।
दरवाजे की घंटी बजी सीमा ने दरवाजा खुला देखा रुबिका अपनी मम्मी के साथ खड़ी है। उन्हें शरबत देते हुए सीमा ने प्रश्र करती निगाह रुबिका पर डाली।
बिना हिचकिचाहट के कहा, “मम्मी आपसे कुछ कहना चाहती हैं।”
“कहिए क्या बात है।”
“आप तो जानती ही हैं कि बच्चे शादी कर रहे हैं और रुबिका अपना नर्सिंग होम खुलना चाहती है। आप को इन दोनों की मदद करनी चाहिए।”
सीमा का दिल तो करा मुंह तोड़ जबाव देने का पर कुछ बोली नहीं। सीमा का चुप रहना रुबिका को बिल्कुल पसंद नहीं आया।
तभी दरवाजे की घंटी बजी और आशीष वापिस आ गया। सीमा ने पूछा,” शादी कब करना चाहते हो दोनों।”
“शादी से पहले रुबिका हमारे साथ रहेगी मम्मी, और कोठी के पिछले चार कमरों में पहले नर्सिंग होम बनाएगी। पापा को सब बता दिया है उन्हें मंजूर है।” आशीष की बातें सुन सीमा भीतर तक टूट गई। सारे फैसले लेने के बाद उसे सिर्फ बताया जा रहा है। यहां तक रुबिका की मम्मी को भी पता है। वो घबरा गई हमेशा की तरह उस को हारना ही होगा ऐसा नहीं करने पर वो खुद अकेली रह जायेगी!!
औरत इसी एक बात से सदा डरती है कि कहीं वो अकेली न रह जाए। सीमा भी सालों तक इसी डर को झेलती रही है। उसने विशाल को अपनाते समय कितनी जल्दी की थी जो आज तक सुधार नहीं पाई है। सीमा को अंदर ही अंदर खुद पर गुस्सा आ रहा था। रुबिका जैसी हुशियारी उसे क्यों नहीं आई रुबिका ने तो पूरा भविष्य सुरक्षित कर लिया। शादी से पहले ही आशीष तो आशीष घर पर ही कब्जा कर लिया। हालांकि आशीष को सीमा ने ही पैदा किया परंतु बेटा कब इतना हुशियार हो गया उसे पता ही नहीं चला। सब को चाय नाश्ता दे उदास सी अपने कमरे में आ बेड पर लेट गई।
मां और पापा की कही बातें याद आने लगीं कितना समझाया था उन दोनों ने कि ये शादी बेमेल सिद्ध होगी, किसी डॉक्टर से ही शादी करना उचित होगा।
उस समय अक्ल पर विशाल के प्रेम का पर्दा पड़ा था भविष्य की सोची ही नहीं। अब सीमा ने एक हारे हुए मुसाफिर की भांति धीरे धीरे चलने का फैसला लिया। आशीष को जो वो चाहेगा करने देगी पहले भी अधिक नहीं बोलती थी अब भी कुछ नहीं बोलेगी।
रुबिका समान ले आशीष के साथ रहने आ गई और आशीष के कमरे में अपना समान जमा लिया। हालांकि सीमा को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था पर चुप रहने के सिवा चारा भी क्या था। मूक दर्शक की तरह रोज देखती रुबिका के इशारों पर आशीष कैसे नच रहा है। शादी से पहले माता पिता को बिना बताए लिव इन रिलेशनशिप का रिवाज तो सुना था यहां तो पिता की सहमति से ये रिवाज निभाया जा रहा है।
सीमा को खुद समझ नहीं आता कि वो ये सब बर्दश कैसे कर लेती है शायद कहीं गहरे तक खुद को मार दिया है। उसे अपनी बात पर कायम रहना होगा। चाहे जो हो जाए इस बार वो बेटे का साथ नहीं देगी।रुबिका को किचेन में जाना ही पसंद नहीं है खाना बनाना शायद उसने सीखा ही नहीं।जब सीमा को बुखार चढ़ा खाना बाहर से आ गया। विशाल, आशीष, रुबिका सब मस्त रहते सीमा मरते पड़ते खुद ही अपने लिए कुछ बना लेती किसी को उसका ख्याल रखने कि जरूरत महसूस ही नहीं होती सीमा सोच सोच कर पागल होती और अपने अंदर की कमियों को ढूंढने लगती।
जब वो पढ़ती थी तब मम्मी जबर्दस्ती खाना बनवातीं थीं कहती थीं और कुछ आए न आए खाना बनाना आना ही चाहिए। रुबिका की मम्मी ने खाना बनाना नहीं सिखाया ? निश्चय किया रुबिका से पूछ ही लूं पूछा , “चारों दिन बाहर का खाना क्यों कुछ घर में भी बना ही लिया होता।”
“खाना बनाने के लिए डॉक्टरी नहीं पढ़ी है मुझे नहीं आता ये सब।” रुबिका से ऐसे ही उत्तर की आशा थी।
आज सीमा के अंदर मां जाग उठी। रुबिका के कपड़े बेतरतीब लॉबी में पड़े देख उससे रहा नहीं गया। बोली, “कम से कम कपड़े तो ठीक से रख ही सकती हो।”
आशीष ने रुबिका की वकालत की और सीमा को चुप करा दिया। अपनी इज्जत अपने हाथों में ही सुरक्षित है ये बात सीमा बहुत अच्छे से समझती है फिर से चुप्पी का आवरण ओढ़ लिया। जब अपनी शादी में हजारों समझौते किए हैं तो कुछ समझौते बेटे की लिए भी करने का संकल्प लिया।
सीमा सुबह लॉन में टहलते हुए मन में उथल पुथल महसूस करने लगी। सोच तो लिया की हमेशा की तरह बेटे के मामले में चुप रहेगी परंतु उसका मन नहीं मान रहा एडजेसमेंट का कष्ट अब और सहा नहीं जायेगा। सीमा ने निश्चय किया कि रुबिका के लिए खाना नहीं बनाएगी। विशाल के पास पैसे की कोई कमी नहीं है फिर भी सीमा को ही खाना बनाना पड़ता है विशाल का मानना है कि खाना घर की औरत बनाए तभी स्वस्थ ठीक रहता है तो अब रुबिका की बारी है। उसने भी तो डॉक्टर की पढ़ाई की थी उसे क्या मिला।
घरेलू जिम्मेदारियों के चलते उसकी क्लिनिक बंद हो गई थी। विशाल ने रत्ती भर भी सहयोग नहीं दिया और सीमा ने क्लिनिक बंद कर दी। जो जख्म विशाल ने दिया था उसे आज की परिस्थित ने फिर से ताजा कर दिया। सीमा अपने अंदर एक जलन सी महसूस कर रही है रुबिका तो अभी बहू भी नहीं बनी है फिर भी अपना पूरा अधिकार जमा रही है उसे भी अपने अधिकार चाहिए। कब तक गूंगी गुड़िया बनी रहेगी।
रोज रुबिका का खाना बाहर से आता देख विशाल सीमा से पूछ बैठे, “तुम रुबिका के लिए खाना क्यों नहीं बनातीं।”
सीमा तो इसी मौके की तलाश में थी , “रुबिका को खाना बनाना आना चाहिए मैं उसकी जिम्मेदारी नहीं उठा पाऊंगी।”
“परंतु रुबिका भी तो अब इस घर की सदस्य होने जा रही है उसकी मदद करना तुम्हारी जिम्मेदारी है।” विशाल बोले।
सीमा का दिल हुआ खूब खरी खोटी सुनने का बोलना चाहती थी कि मेरी डॉक्टरी छुड़ाते वक्त तो अपनी जिम्मेदारी याद नहीं थी आज मुझे शिक्षा दे रहे हैं। ऐसा कुछ बोली नहीं, बस इतना ही बोली, “मुझ से नहीं होगा हर सदस्य की घर में भागीदारी होनी चाहिए।”
यहीं से शुरुआत हुई सीमा के आत्म सम्मान की लड़ाई। उसने अच्छी मां और पत्नी का फर्ज बहुत निभाया अब अच्छी सास बनने का उसे कोई शौक नहीं है। विशाल का चेहरा तमतमा उठा बोले, “कई दिनों से मैं तुम्हारे बदले हुए तेवर देख रहा हूं।” पहले कभी विशाल ऐसे बोलते तो सीमा घबरा जाती थी पर अब विशाल को घूरती तटस्थ खड़ी रही। विशाल उसका सामना नहीं कर पाए और सकपका कर बाहर चले गए।
घर में ही नर्सिंग होम बनाने के सीमा सख्त खिलाफ है। उसे याद है जब उसने कोठी के इसी हिस्से में अपनी क्लिनिक खोलनी चाही थी विशाल ने साफ मना कर दिया था सीमा के पापा ने विशाल को समझाने की कोशिश की थी तब विशाल ने उन्हें भला बुरा सुनाया था। सीमा के पापा तब दुखी हो कर बोले थे, “इसलिए ही तुझे मना किया था ये शादी करने से।” कितनी चुभा था पापा का यह ताना तभी से शादी चलाने की कोशिश में सीमा बुझती चली गई और कभी अपने मम्मी पापा को कुछ नहीं बताया।
कंस्ट्रक्टर को बुलाया गया मेटर्टनिटी नर्सिंग होम में बहुत सी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। सीमा को समझ नहीं आ रहा क्या करे। आशीष रुबिका के लिए कुछ भी करने को तैयार खड़ा है। शादी से पहले ही रुबिका ने अपना भविष्य सुरक्षित करने की ठान रखी है। विशाल भी रुबिका को सहयोग दे रहे हैं उन के दोहरे व्यवहार से सीमा को और भी ठेस पहुंच रही है परंतु कुछ कर नहीं पा रही पहले भी अक्सर ऐसा ही होता रहा है पति के विरुद्ध जाने का साहस कभी नहीं जुटा पाई।
अचानक उसे याद आया की कोठी का पिछला हिस्सा जिसमें नर्सिंग होम बनाया जा रहा है विशाल के पिता ने सीमा के नाम किया था वे सीमा का बहुत सम्मान देते थे उन्हें उस पर नाज था कि सीमा अन्य पढ़ी लिखी महिलाओं से अलग है और बहू के रूप में उनकी खूब देखभाल करती है। सीमा ने निश्चय किया अभी और चुप रहेगी। रुबिका को परखना भी तो है। विशाल को परखने में जो गलती उसने की थी कहीं वही गलती आशीष तो नहीं कर रहा अब वह रुबिका की हरकतों पर नजर रखने लगी।
भले ही उसके अंदर की हारी हुई डॉक्टर उसे परेशान करती आई है फिर भी वो स्वार्थी नहीं है होती तो विशाल के विरुद्ध कब की खड़ी हो चुकी होती। जिन बच्चों के लिए विशाल के साथ रही है उनका अच्छा बुरा देखना भी जरूरी है। आशीष ने तो उससे बात तक करनी छोड़ दी। बेटे की नाराजगी सीमा से सही नहीं जा रही मगर उसे अपने फैसले पर कायम रहना है। रुबिका का व्यवहार उसे अटपटा लग रहा है कुछ अधिक ही आजाद सोच की लड़की लग रही है।
“रुबिका तुमने तो अच्छे नंबर से एम बी बी एस की होगी?” खाने की टेबल पर सीमा पूछ बैठी।
अपनी शान बघारते हुए रुबिका बोली, “मेरे पापा ने मेडिकल कॉलेज को मोटा डोनेशन दे कर मुझे दाखिला दिलाया था, मेहनत से पास हो ही गई।
” मतलब कोई कंपीटिशन ही नहीं दिया। आगे की और क्या पढ़ाई की है?
“पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कर रखा है। आपको कोई शक है क्या मुझ पर।” रुबिका कुछ अकड़ कर बता रही थी फिर उसने आशीष को घूर कर देखा जैसे कह रही हो तुम्हारी मम्मी ये सब क्यों पूछ रही हैं।
“मम्मी आप को रुबिका का बायोडेट दे दूंगा सब देख लेना।”
“बतामीजी करने की जरूरत नहीं है आशीष।” सीमा ने तीखी आवाज में बोला। आशीष और विशाल हैरान रह गया। मम्मी तो कभी इतना ऊंचा नहीं बोलतीं। “तुम्हारी होने वाली पत्नी को बिना शादी के इस घर में रहने का हक है तो मुझे भी कुछ पूछने का हक है।” पहली बार सीमा को तसल्ली हुई है काश ये साहस उसमें पहले से होता। काश अपने सारे अधिकार जमा पाती। उसने खुल कर जीने का फैसला कर लिया है ना तो रुबिका अब शादी से पहले घर में रहेगी और ना घर में नर्सिंग होम बनाएगी।
“आशीष तुम मेरी चुप्पी को मेरी कमजोरी समझ रहे हो। पहले रुबिका से शादी करो फिर ही यह इस घर में रह सकती है।” सीमा ने निश्चय कर लिया था कि वो मां के अधिकार नहीं छोड़ेगी।
“पापा, मम्मी ये क्या बोल रही हैं आप से पूछ कर ही रुबिका यहां आई है।” आशीष ने विशाल से पूछा।
“मेरे से भी पूछना चाहिए था मेरी मर्जी भी जाननी चाहिए थी। जन्म दिया है तुम्हें पाल पोस कर बड़ा किया है।” सीमा बोली।
“आप कब से हमारे मामलों में बोलने लगीं हमेशा तो चुप रहती हो।”
“हां चुप रही हूं पर पहले इतना गलत फैसला इस घर में किसी ने नहीं लिया। ये लड़की मेरे होते हुए बिना शादी के यहां नहीं रहेगी।”
“तो फिर हम कहीं और रह लेंगें। चलो रुबिका फिलहाल तुम्हारे घर चलते हैं।” सीमा समझ गई आशीष सचमुच प्यार में अंधा हो गया है
“अरे नहीं आशीष तुम मेरे घर नहीं रह सकते। लोग क्या कहेंगें।” रुबिका बोली।
” तुम जो यहां रह रही हो उसे लोग गलत नहीं मानते?” सीमा ने पूछा।
वो तो … वो तो..
“क्या वो तो, वो तो।” मैं तो हैरान हूं की तुम्हारे पेरेंट्स इस बात को कैसे मान गए। क्या पट्टी पढ़ाई है तुमने उन्हें।” सीमा ने फिर पूछा।
सीमा का यह रूप विशाल ने पहले कभी नहीं देखा था परसों से उसे सिर्फ हां में हां मिलाते देखा है। सीमा की दलीलों ने विशाल को भी चुप करा दिया।
आशीष और रुबिका कुछ बोल ही नहीं पाए उठ कर अपने रूम में जाने लगे। रुबिका को रोकते हुए उसे अपने रूम के साथ वाले रूम में जाने को कहा। रुबिका के पास उस की बात मानने के सिवा कोई चारा नहीं था। अचानक हालात सीमा के पक्ष में बन गए। इस लड़की को सचमुच जांचना पड़ेगा। किसी के मन की थाह पाना तब तक संभव नहीं होता जब तक उससे नजदीकियां न हों उसे रुबिका के करीब जाना ही होगा उससे बातें करनी होंगी।
आशीष एक अस्पताल में हड्डियों का डॉक्टर है पिछले कुछ दिनों से वो बहुत व्यस्त है। सीमा ने बेटे को विश्वास दिला दिया तुम मेरी बात मानोंगे तो जैसा चाहोगे वैसा ही होगा। आशीष ने बताया कि रुबिका के पापा चाहते हैं , वो पहले किसी अस्पताल में नौकरी करे बाद में नर्सिंग होम खोले। रुबिका को नौकरी नहीं करनी खुद का काम करना है।
“अच्छा तो आशीष के दम पर अपना सपना पूरा करना चाहती है और आशीष अपने माता पिता के दम पर रुबिका का सपना पूरा करना चाहता है।”
सीमा ने रात के खाने पर फिर बात छेड़ी, ” रुबिका तुम जिस जिम्मेदारी को उठाना चाहती हो पहले उसके काबिल तो हो जाओ। पहले नौकरी करो या किसी डॉक्टर के साथ काम करो।”
“सब हो जाएगा बस आप परमिशन दे दीजिए।” रुबिका अकड़ कर बोली।
“पैसा कौन लगाएगा लोन लोगी ? क्योंकि तुम्हारे पापा तो कुछ करेंगें नहीं।” आशीष कुछ बोलने को हुआ तो उसे सीमा ने रोक दिया।
“आशीष ने और मैनें सब सोच रखा है।”
” क्या सोच रखा है पैसा हमारा, जगह हमारी पूछना और सोचोगे आशीष और तुम।” सीमा ने उपहास करते हुए पूछा। क्या जवाब देती उठ कर जाने लगी। उसे रोकते हुए आगे बोली, “अपनी मम्मी को बुलाओ मुझे उनसे बात करनी है।”
रुबिका का चेहरा तमतमा गया उसे सीमा की एक भी बात पसंद नहीं आई आशीष से बोली, “तुम्हारी मम्मी हमारे जीवन में रोड़े डाल रही हैं।”
“आशीष इतनी बतामीज लड़की मेरी बहू नहीं बन सकती। तुम्हें वो पिछला हिस्सा भी नहीं मिल सकता वो तुम्हारे पापा का है ही नहीं। वो हिस्सा मेरे नाम है।इस स्वार्थी लड़की को हम कुछ नहीं देंगें और तुम भी इसका साथ छोड़ दो तुम्हारे लिए यही ठीक रहेगा। तमतमाई रुबिका अपने सूटकेस उठा वापिस चली गई जिस प्रकार वो यहां से गई है शायद आशीष से कोई संबंध नहीं रखेगी।
सीमा जानती है की आशीष को इस सब से बहुत दुख होगा। उसे आसानी से समझ नहीं आयेगा कि रुबिका का प्यार एक धोखा ही साबित होता। वो बहुत महत्वाकांक्षी लड़की है और ऐसे में वो जो भी करेगी उसमे सिर्फ अपना स्वार्थ ही देखेगी। मेरा बेटा मेरा स्वाभिमान है जिसे ऐसी लड़की के हाथों बर्बाद नहीं होने दे सकती।
गीतांजलि गुप्ता