जिम्मेदारियां खत्म ही नहीं हो रही है – विधि जैन : Moral Stories in Hindi

देविका की लव मैरिज हुई दोनों परिवारों की सहमति से लव मैरिज अरेंज में बदल गई।

 दोनों परिवार बहुत खुश देविका की शादी एक बड़े परिवार में हुई देविका की रमेश से शादी हुई तब तक वह ज्यादा कुछ नहीं कमाता था। धीरे-धीरे लग रहा था …कि उसकी अच्छी नौकरी लग जाएगी.. लेकिन रमेश का काम में ज्यादा मन नहीं लगता था ।

घर के सारे काम अच्छे से कर लेता था कोई भी कुछ बोलता था वह कर देता था रमेश और सोमेश जुड़वा भाई थे दोनों की बहुत बनती थी सोमेश बहुत मेहनती था हर कम एक साथ कर लेता था ।

अच्छा खासा पैसा कमा लेता था देविका की एक बेटी हुई और सोमेश के दो बेटे घर के हालात धीरे-धीरे बिगड़ने लगे सास ने बिस्तर पकड़ लिया ।

उनकी भी सेवा लगातार करनी पड़ती थी देविका ने सोचा कि मुझे ही कुछ करना पड़ेगा ।

देविका ने विचार किया …उसने सोचा कि सुबह 12:00 बजे तक काम निपटा लेती हूं ..उसके बाद में कुछ काम कर सकती हूं ..और उसने एक स्कूल में जाकर अपना बायोडाटा सबमिट कर दिया।

 उसको नर्सरी की क्लास मिली जहां पर बच्चे बहुत शैतान थे लेकिन उसने सोचा कि ठीक है 12 से 3 में मैं यह जॉब कर सकती हूं।

 5000 उसको मिलने लगे लेकिन घर में कोई हेल्प करने वाला नहीं देवरानी के नखरे बहुत थे ।

बड़े घर से आई हुई थी देविका ने सोचा कि हम दोनों मिलकर काम करेंगे… तो हम स्कूल टाइम पर पहुंच जाएंगे.. लेकिन ऐसा नहीं होता था।

इस कहानी को भी पढ़ें:

यह धन संपत्ति ना अच्छे अच्छे का दिमाग खराब कर देती है – हेमलता गुप्ता : Moral Stories in Hindi

 फिर देविका ने शांत मन से अपना काम खुद ही कर लेती थी ।

और सारे बच्चों का टिफिन नाश्ता बनाकर चली जाती थी…. शाम का देवरानी देख लेती थी… देविका के ऊपर जिम्मेदारियां बढ़ती गई ।

बेटी 12th में आ गई पेमेंट 5000 से बस एक ही हजार 6000 तक बड़ी …उससे ज्यादा हो ही नहीं रही थी।

 देविका ने सोचा कि अब मेरी बेटी 12th में आ गई है उसके लिए तो कोचिंग की फीस लगेगी …और उसने यह सोचकर ट्यूशन भी लेना शुरू कर दिया ।

इस बात से देवरानी बहुत खफा रहती थी ।

कि यह महारानी इतना कमा रही है और घर में कुछ भी खर्च करने को नहीं दे रही है ।

लेकिन देविका ही जानती थी कि वह कितना कमा पा रही है!! बेटी को कॉम्पिटेटिव एक्जाम देना था!! उसकी फीस भी लगभग 40000 थी ।

अब देविका ने सोचा कि मैं कैसे यह रकम जमा कर सकती हूं! और उसके कॉम्पिटेटिव एक्जाम के लिए लगभग 1 साल की तैयारी चाहिए थी ।

उसने अपनी एक चैन और एक अंगूठी बेंच दी और यह बात घर में किसी को नहीं बताई।

 बेटी ने बहुत मेहनत की कोचिंग जाती थी और स्कूल भी जाती थी।

 रात भर जागकर बहुत पढ़ाई की यह सब बात देविका देख रही थी ।

कि बिटिया मेरी बहुत पढ़ाई कर रही है !मैं उसके आगे भी पैसा खर्च करने के लिए तैयार हूं।

इस कहानी को भी पढ़ें:

मेरे हमसफ़र – पूजा गीत : Short Stories in Hindi

 वह अच्छे से पढ़ लिख जाएगी तो मैं जीत जाऊंगी नहीं तो हर कर मैं किसको मुंह दिखाऊंगी…. इतना पैसा जो मैंने खर्च कर दिया ।

बेटी ने बहुत मेहनत की और कांमपटेटिव एग्जाम निकाल लिया।

 नीट में उसका सलेक्शन हो गया अच्छा मेडिकल कॉलेज मिल गया लेकिन उसकी फीस भी बहुत अधिक थी ।

बहुत कोशिश की देविका ने स्कॉलरशिप मिल जाए …लेकिन बहुत मुश्किल हो रहा था।

 कंपटीशन बहुत था …किसी तरह उसका एडमिशन हो गया ।

और बस डॉक्टर बनने की तैयारी हो गई घर में खुशियों का माहौल था रमेश तो इतना खुश था कि मेरी बेटी डॉक्टर बन गई मेरा सपना सच हो गया मैं बचपन से सोचता था कि मेरे घर में एक डॉक्टर जरूर होना चाहिए देविका ने कहा कि हां बस तुम सोचते ही रहो और दोनों में बहस छिढ़ गई ।

वहीं दूसरी ओर अचानक देवरानी गिर गई और उसकी दिमाग की ऐसी नस फटी कि उसकी याददाश्त ही चली गई ।

जिम्मेदारियां बढ़ती ही जा रही थी देविका सोच रही थी ।

कि मैं अपनी बेटी को डॉक्टर बनाकर बस अब जिम्मेदारियां से हट जाऊंगी ।

लेकिन नहीं सास बिस्तर पर देवरानी की हालत ही खराब हो गई उसे नींद में चलने की बीमारी हो गई।

 या तो फिर नींद ही नहीं आती थी बस अब देविका ने अपना सर ही पकड़ लिया ।

कि मैं देवरानी को देखूं की सास को देखूं… उसने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और देवरानी की तन मन धन से सेवा की …वहीं पर रमेश का अचानक एक्सीडेंट हो गया और कुछ दिनों में वह देविका को छोड़कर चला गया ।

इस कहानी को भी पढ़ें:

वो है की मानते नही –  दीपा माथुर : Short Stories in Hindi

इतना सब सहन करने के बाद भी देविका ने ईश्वर पर आस्था नहीं छोड़ी दीपिका की बेटी डॉक्टर बन गई 5 साल पूरे करके उसने पीजी में एडमिशन ले लिया लेकिन देविका रमेश को नहीं भूल पा रहे थे अब तो वह पूरी तरह खाली थी इस सिर्फ रमेश की याद आती थी ईश्वर पर आस्था तो रख रही थी।

 लेकिन जिम्मेदारियां इतनी थी कि सिर्फ रमेश साथ में नहीं था ..देवरानी और सास को तो उसे ही देखना पड़ रहा था.. सोमेश अच्छा खासा कमाता था लेकिन देवरानी के कारण नौकरी छोड़कर घर पर ही बैठा हुआ था।

 इतना सब देखने के बाद देविका की बेटी ने मां से कहा- कि मैं इतने सालों में आपके संघर्ष करते हुए देखा है।

 लेकिन अब आप जॉब नहीं करोगी मैं आपकी पूरी जिम्मेदारी उठाऊंगी… आप मेरे साथ रहेंगी। 

और मैं आपको अब कुछ नहीं करने दूंगी और देविका की बिटिया ने एक अच्छा खासा हॉस्पिटल खोल लिया।

 जिसमें मां को मैनेजर पद पर बैठाया और घर में चाचा और दादी की सेवा के लिए एक नर्स लगा दी।

 जो दिन रात उनकी सेवा करती थी देविका के लगातार खुशी के आंसू निकल रहे थे।

 बार-बार यही कह रही थी हम अपने बच्चों में ही अपनी परछाई देख सकते हैं मैंने इतने सारे मेहनत की है लेकिन आज मेरी मेहनत का फल सामने खड़ा हुआ है।

 कभी-कभी जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आते हैं जीवन के अंत तक जिम्मेदारियां खत्म नहीं होती हैं चाहे हम कितनी भी मेहनत कर लें लेकिन यदि हम बच्चों के लिए मेहनत करते हैं तो उनमें हमारी परछाई जरूर नजर आती है

लेखिका : विधि जैन

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!