वृक्ष का जीवन चक्र ” – रणजीत सिंह भाटिया

समुंदर के किनारे बहुत सी रेतीली जमीन थी l पर हरियाली बहुत ही कम थी,कहीं कहीं पर इक्की दुक्की झाड़ियां थी  एक दिन वहां पर एक नन्हा सा पौधा उग आया जो बहुत ही सुंदर था l कुछ ही समय में वह नन्हा पौधा एक घना वृक्ष बन गया उसके ऊपर बहुत ही सुंदर सुंदर और सुगंधित फूल खिले तथा वह फूल फलों में परिवर्तित हो गए बहुत से रंग बिरंगे पंछी वहां आते उन फलों को खाते और खूब चहचहाते कुछ पंछियों ने तो अपने

घोंसले वही बना लिए जब कोई राही उधर से गुजरते तो उस वृक्ष की आभा देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते और उसके फूलों की खुशबू से सब उसकी ओर खींचे चले आते तथा उसकी घनी छाया में कुछ देर ठहर कर एकदम तरोताजा हो जाते l अपनी मस्ती में गुम वह

वृक्ष हवा हवा में झूमता रहता,जैसे कि सबको कोई खुशी का संदेशा दे रहा हो l सुबह के समय  जब सूर्य उदय होता तब उस वृक्ष के नीचे  फूलों की चादर सी बिछ जाती, लोग उन फूलों को बीन कर अपने घर ले जाते l इस तरह वह वृक्ष सबको खुशियां बांटता  और ईश्वर का धन्यवाद करता कि उसने उसे इस काबिल बनाया l

          फिर कुछ और समय बीता और उस वृक्ष से जो फल आसपास गिरते थे उनसे कई और पौधे उग आये और वह भी उस वृक्ष की तरह बहुत ही सुंदर थे फिर क्या था वह सारा समुंदर का किनारा मानो एक सुंदर जंगल बन गया हो,लोग वहां पिकनिक मनाने आते,प्रात भ्रमण को आते,वह सारे वृक्ष मानो उनके परम मित्र बन गए हों l

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पंछियों का तो पूछो ही मत,वह तो वहां इतने खुश थे कि हर वक्त खुशी में चहचहाते रहते थे l इलाके के सारे लोगों के लिए व स्थान आकर्षण का मुख्य केंद्र बन गया था लोग वहां आकर बहुत ज्यादा सुकून पाते थे l

         धीरे-धीरे वह वृक्ष बूढ़ा होने लगा, उसके पत्ते झड़ने लगे ,फूल और फल लगना बंद हो गए ,और कुछ समय बाद वह वृक्ष एकदम सूख गया सिर्फ कुछ सुखी टहनियां और तना बचा था l पंछी भी अब अपने घोसले वहां नहीं बनाते थे l ऐसा लगता था कि ना जाने कब जोर की आंधी आएगी और उस वृक्ष को उखाड़ देगी,

वह वृक्ष समझ गया था कि उसके बहारों के दिन अब खत्म हो गए हैं l और अब वह कभी हरा नहीं होगा आसपास के सारे वृक्ष हवा में झूमते इतरा रहे थे वह अकेला अपनी बदनसीब पर पर आंसू बहाता खड़ा था और सोचता था कि ईश्वर अब उसका अस्तित्व मिटा ही दे तो अच्छा है l


       कुछ समय और बीता और एक दिन लकड़बग्घे नाम का एक पंछी उस वृक्ष के पास आया और कहने लगा कि “अगर तुम्हें कोई एतराज ना हो तो मैं तुम्हारे तने में छेद करके अपना घर बना लूं क्योंकि हम ऐसे ही वृक्षों की तलाश में रहते हैं ” तब उस ने कहा  ” क्यों नहीं जरूर बना लो मैं तो बरसों से अपने मिटने का इंतजार करते हुए

अपनी तनहाइयों पर आंसू बहा रहा हूँ l जब तुम आ जाओगे तो मुझे फिर रोनक मिल जाएगी और बहुत खुशी होगी कि इस अवस्था में भी मैं किसी के काम आ सकता हूं ” उस लकड़बग्घे ने वहां अपना आशियाना बना लिया उसके छोटे-छोटे बच्चे जब चू चू करते तो उसको लगता कि उसके सिने पर किलोल कर रहे हैं l कुछ दिनों बाद वहां कुछ और लकड़बग्घों ने भी अपने आशियाने बना लिए और खुशी-खुशी रहने लगे l

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         फिर अचानक एक दिन उस पेड़ की जड़ के पास एक नन्ही सी बेल उग आई और धीरे-धीरे कुछ ही महीनों में वह बेल फेल कर उस सूखे वृक्ष पर पूरी तरह से फैल गई l उसमें भी बहुत ही सुंदर और सुगंधित फूल खिले वह सुखा वृक्ष अब पूरी तरह से उस बेल से ढक चुका था और उसका रूप बहुत ही अनोखा हो गया था

अब वह उस इलाके मे ऐसा एक ही अनूठा वृक्ष था l लोग उसे बहुत आश्चर्यचकित होकर देखते थे और बहुत खुश होते थे उसके ऊपर बेल में जो फूल लगते थे वह मधुमक्खियों को बहुत ही ज्यादा पसंद थे और और रंग बिरंगी तितलियां तो उन पर सदा मंडराती रहती थी l

         इतना सब कुछ पाकर वह वृक्ष बहुत ही ज्यादा खुश था उसने ईश्वर को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया जिसने उसके बीती बहारों के दिन फिर से दूसरे रूप में लौटा  दिये l

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