दरकते स्त्री पुरुष सम्बन्धों की विभीषिका, जहां तहां अपने रक्तिम चिन्न्ह बिखेरकर एक दर्द भारी दास्तां लिख जाती है।
जेल के बाहरी परिसर में एक चालीस साल का पुरुष, मैला सा पायजामा, कंधे पर लाल अंगोछे से बार बार चेहरे का पसीना पौंछते हुए बेताबी से चक्कर लगा रहा था। फिर उसने पीपल की छाँह में बीड़ी पीते हुए जमादार से मुखातिब होकर पूछा “भैया, बाहर जो आज छूटने वालों की लिस्ट लगी है उसमे हमार मैया बापू का नाम काहे नहीं है। हम तो अदालत से सारे कागज बनवा लिए थे। मैया बहुत बीमार है। मर जाएगी वो”। मानो वो उत्तर सुनने से पहले अपने सारे दर्द उंडेल देना चाहता था।
जमादार ने एक उचटती सी निगाह से उसकी ओर देखा। फिर बीड़ी में एक लंबा काश लिया और उकता कर बोला “हम का आप को यहाँ का गबर्नर दिखाई देते हैं। अरे साहब से पूछो। हंमका नहीं मालूम”। और शून्य में देखता हुआ बीडीपान में मशगूल हो गया। शायद उसे अपने विश्राम के इन क्षणों में बाधा पसंद नहीं थी।
फिर वो संगीन वाली बंदूक लिए खड़े संतरी की ओर बढ़ा और बेहद करुणा से पूछा “हमार माँ … ।”
“अबे तू अंदर कैसे आ गया। चल बाहर जाकर खड़ा हो। अबे कागज बनेंगे तब न छूटेंगे। हम क्या ठेका लिए हैं तेरे मान बापू का।” उसे पता है कि किस आदमी पर अपनी खाकी वर्दी का रुआब जमाकर और धूंप में खड़े होकर सबसे छोटे कर्मी की अपनी कुंठा शांत की जा सकती है।
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मैंने पूछा “भैया क्या बात है। इतने परेशान क्यूँ हो।” तो तनिक सी सहानुभूति पाकर उसकी आँखें नाम हो गईं। कहने लगा “दुई बरस से बूढ़ा माँ बापू अंदर हैं साहब। आज न जाने कैसे कैसे जमानत हो गई मगर लिस्ट में नाम ही नहीं लगा है।”
लोगो के जख्मों को कुरेदकर मेरी क्रूर लेखकीय पिपासा शांत होती है।
“किस जुर्म में… ?”
“छोटका भाई अलग रहता है। ऊ का महरारू सुसेड़ कर लिया था। दुई बरस पहले। ससुरे का जब से ब्याह हुआ एक्को दिन आपस में बनी नहीं। रोज लड़ाई टंटा। अलग रहता था हम से। मैया बापू हमारे साथ और ऊ अलग मकान में। फिर एक दिन न जाने का हुआ। तेल छिड़क कर आग लगा ली उसकी बीवी ने। बाबू, दुई बरस हो गए अदालत के चक्कर लगाते लगाते। बूढ़े माँ बापू को दस दस साल की सजा बुल गई है। मकान बेचकर हाईकोर्ट में अपील किए हैं। तब जाकर जमानत…।” और उसकी आवाज रुँध गई।
यकीनन एक ब्याहता का अपना जीवन समाप्त करने की हद तक पहुँच जाना आश्रितों का बड़ा अपराध है। उनका जिनके भरोसे माता पिता ने अपनी लाड़ली के भेजा था या उन परिस्थितियों का जिन से उसके ससुराल वाले जूझ रहे होंगे। किन्तु बूढ़े माता पिता जो उसके पास रहते भी नहीं थे उनकी अंतिम सांसें सींखचों के पीछे होने की संभावना को जन्म दे जाते हैं।
महिलाओं की आत्महत्या का मनोविज्ञान शायद बड़े बड़े मनीशी भी न खोजा पाएँ। मैंने अपने जीवन में ऐसी ऐसी महिलाओं को सुसाइड करते देखा था जिनका सम्पन्न और प्यार करने वाला पति बस अपनी वेडिंग एनवर्सरी भूल गया। अपने बच्चों तक को अपने साथ मौत के मुंह में धकेलकर वे बदला लेती हैं कभी कभी।
खैर विषय आज भी वही कल वाला है कि वैवाहिक संस्था टूट क्यूँ रही हैं। बदलते समय के साथ सम्बन्धों का रेशमी धागा शिथिल क्यूँ होता जा रहा है।
बाद में उसी दिन उसके माता पिता छूट गए थे किन्तु वो मजदूर सा गरीब उन से लिपटकर इतना रोया कि उसी क्रूर से दिखने वाले प्रहरी को भीतर से पानी लाकर उसे पिलाना पड़ा।
रवीन्द्र कान्त त्यागी