एक वृद्ध पागल ऐसा दिखता सड़क पर जैसे दिशाहीन लड़खड़ा कर चल रहा था। कभी कभी वह कोई खंभा देखता तो उसका सहारा ले कर कुछ पल ठहर जाता। एक सड़क के फुटपाथ पर बेंच की ओर दिखा तो कुछ लपक पर उसपर जा बैठा। अशोक उसे ध्यान से लगातार देखते हुए न जाने क्यों उसके साथ लगभग आगे घंटे से कुछ फासला बना कर चल रहा था। उसके मन में उसके प्रति करुणा भाव जग रही थी। कोई आकर्षण था जरूर उस वृद्ध में। दस मिनट बैठने के बाद लगा वह काँप रहा है। गर्मी में ऐसा! अशोक लपक कर उसके बाजू में बैठ उसे ध्यान से देखा तो लगा उसकी आँखे लाल और नम हैं।
पूछा अशोक, “बाबा आप उदास और बहुत दुखित दिख रहे हो, क्या बात है?”
वृद्ध अचानक फूट फूट कर लगा रोने, जैसे किसी बरसाती नद में बाढ़ आ गई हो। बोल नहीं पा रहा था वह। अशोक रुमाल निकाल कर उसके आँसू पोंछा और फिर पूछा, “बाबा बताओ मुझे, तुम रो क्यों रहे हो? तुम्हारी जीभ सूखी है, पानी ला दूँ?”
वह लड़खड़ाती जुवान से बोला, “बेटा, मेरा बेटा कोरोना से एक साल पहले मर गया। पत्नी दो महिने पहले रो रो कर एक दिन सोई की सोई रह गई। बहु चार दिन पहले न जाने कहाँ चली गई! मैं उसके मैके आदि खोज कर थक गया, खाना पानी सूझ कहाँ रहा था मुझे। थाना गया तो दरोगा बोला, खोजों हर ओर, यहाँ चौबीस घंटे के बाद आना तो हम कुछ सोचेंगे।” तभी अशोक एक फोन किया। दस मिनट में एक जीप आई और उससे चार सिनियर से दिखते पुलिस ऑफिसर उतरे और अशोक को सैल्यूट ठोक दिये। एक बोला, सर आप यहाँ, वहाँ आई. जी. साहब का फोन आया कि एस. पी. साहब को बोलो बात करें, एक लाश मिली है आउटर रेलवे ट्रैक्ट के पास की झाड़ियों में, वह औरत चार दिन पहले आत्म हत्या के लिए ट्रेन देख शायद कूदी हो। डॉक्टर लाश का मुआयना कर बोला कि उसका सर टकराया ट्रेन से और वह लगभग एक घंटे छटपटा कर मर गई। शिनाख्त नहीं हो पाई उस ३०-३२ साल की दिखती औरत की अतयेव आपको याद किये।”
वृद्ध हटात् बोला, मुझे ले चलो बेटा साथ अपने।
वह वृद्ध उस लाश को देखते हीं लगा फूट फूट कर रोने। वह औरत और कोई नहीं, उसकी बहु थी।
समझा कर एस. पी. अशोक जी उस वृद्ध को अपने घर ले गये। दो सप्ताह पहले अशोक के पिता जी का देहावसान हृदयाघात से हुआ था। अशोक की माँ तो पहले ही इहजगत् से कूच कर चुकी थी। अशोक को पिता मिल गया।
डॉ कवि कुमार निर्मल