“आ जाओ ना माॅ॑ !भाभी को गर्मी में लू लग गई है, जरा सा बुखार ही तो है भाभी को और आप इस चक्कर में मेरी महीने भर में एक बार होने वाली किटी पार्टी बिगाड़ने पर तुली हो।”मालिनी ने बड़े अधिकार पूर्वक अपनी माॅ॑ से कहा, उसे पता है कि उसकी माॅ॑ गर्मी- सर्दी की परवाह किए बिना उसके बुलावे पर दौड़ी चली आती हैं
और उसके सारे काम सुचारू रूप से चलते रहते हैं फिर वह चाहे छोटे बच्चे को देखना है या मालिनी को मूवी जाना हो, शॉपिंग जाना हो सब काम में उसकी माॅ॑ आगे बढ़ बढ़ कर मदद कर देती हैं क्योंकि मालिनी की शादी उसी शहर में हुई है। मालिनी की उम्मीदों पर उसकी माॅ॑ हमेशा खरी उतरती आईं हैं। माॅ॑ बच्चों की खुशी पहले देखती है और अपने दुख-सुख बाद में।
कुछ महीने पहले जाड़ों में उसके भाई मनन की शादी आस्था से हुई घर में आस्था भाभी के आने पर उसे लगा कि माॅ॑ उसे अपना और अधिक टाइम दे पाएंगी।
“मालिनी, हो सके तो अपनी माॅ॑ को माफ़ कर देना। सुधा की ऐसी हालत में मैं तुम्हारे पास नहीं आ पाऊंगी।” माॅ॑ ने अपनी बात रखी
“माॅ॑ , ऐसा भी क्या जादू कर दिया सुधा ने कि मुझे बिल्कुल तुमने पराया कर दिया। गर्मियों के तो दिन भी बड़े होते हैं और तुम मेरे यहां आने से मना कर रही हो। मुन्ना की भी छुट्टियां पड़ गई हैं वो भी दिन भर अपनी नानी संग खेल लेता पर तुम बहाने बना रही हों माॅ॑।” उम्मीद के टूटने से आहत मालिनी ने बुझे मन से कहा
“देखो बेटा, तुम जानती ही हो कि ऐसा मैं नहीं मानती हूॅ॑ कि लड़कियां शादी के बाद पराई हों जाती हैं। मालिनी यह घर तुम्हारा हमेशा रहेगा और मैं सदैव तुम्हारी उम्मीदों को पूरा करूंगी लेकिन तुम ही सोचो बेटा आई हुई लड़की यानी बहू को अपनाना पड़ता है। अगर मैं आस्था को नहीं अपनाऊंगी तो आस्था इस घर को अपना कैसे मानेगी?
आज सुबह से आस्था की तबीयत खराब है। तुम्हें बताया पर फिर भी तुम जिद पर अड़ी हो कि मैं तुम्हारे घर आऊं क्योंकि तुम्हें किटी पार्टी पर जाना है लेकिन अब मैं एक माॅ॑ होने के साथ सास भी बन चुकी हूॅ॑ तो अधिकार के साथ साथ मेरा कुछ कर्तव्य भी बहू के लिए बनता है। बहू यहां बुखार में पड़ी है और मैं तुम्हारे घर आ जाऊं ताकि तुम पार्टी में जा सको ऐसा मैं नहीं कर पाऊंगी।
हाॅ॑, अगर तुम्हें सहूलियत हो तो मुन्ने को यहां छोड़ जाओ, मैं देख लूंगी। गर्मियों की छुट्टियों में बच्चे नानी के घर आते हैं तुम मुन्ने को यहां छोड़ जाओ वह मेरे पास रह जाएगा चाहो तो रोहन से पूछ कर तुम भी कुछ दिनों के लिए आ जाओ। एक शहर में रहने से तुम रात में रहने नहीं आ पाती है, मालिनी। हां, पर मैं झूठ नहीं बोलती और बहाने नहीं बनाती हूॅ॑। ” माॅ॑ ने प्यार से उसे समझाते हुए कहा परंतु आज उनकी आवाज़ में सख्ती थी
मालिनी सोफे पर बैठी रह गई उसे समझ में आ चुका था कि अब माॅ॑ को अपने हिसाब से वह हर वक्त अपने लिए उपलब्ध नहीं करा पाएगी।माॅ॑ की भी कुछ जिम्मेदारियां हैं अपनी बहू के प्रति! चलो देर से ही सही उसे समझ में आ गया कि माॅ॑ को हर वक्त फाॅर ग्रांटेड नहीं लेना चाहिए। इतना मतलबी नहीं होना चाहिए कि अपनों के दुख को देखकर भी अनदेखा कर दो
और बस अपनी ही अपनी सोचते रहो। उम्मीदें रखना बुरा नहीं है परंतु स्वार्थी नहीं बनना चाहिए कि अपने आगे किसी का दुख तकलीफ़ नज़र ही ना आए! भाभी भी घर में आईं हैं तो उनके साथ भी सदस्य की तरह व्यवहार करना चाहिए।
एक निर्णय लेकर मालिनी ने वहीं बैठे-बैठे मोबाइल से किटी पार्टी में अपने नहीं आने की सूचना अपनी सहेली आकांक्षा को दी साथ ही उसे किटी अमाउंट ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिया।
इसके बाद अपना पर्स लेकर मुन्ने को गोद में लिया, पास के फ्रूट शाॅप से कुछ मौसमी और सेब खरीदें। कैब से माॅ॑ के घर पहुंच गई।
माॅ॑ ने दरवाजा खोला,” आ जाओ मालिनी। मुन्ना मुझे दे दो मैं सम्भाल लूंगी। तुम्हें देर हो चुकी है, तुम जल्दी चली जाओ किटी पार्टी में।”
माॅ॑ की हालत देखकर लग रहा था कि वे काम में व्यस्त हैं, मालिनी ने माॅ॑ के हाथों में मुन्ने को दिया और भाभी के रूम में चली गई।
“अरे दीदी आप! आइए, मुन्ने को मैं और मांजी मिलकर सम्भाल लेंगे आप किटी पार्टी में निश्चिंत होकर जाइए।”” कहते हुए आस्था ने उठने का प्रयास किया
” भाभी, आप लेटी रहो, आराम करो। आपकी तबीयत से ऊपर नहीं है कोई किटी पार्टी। मैं कहीं नहीं जा रही हूॅ॑। अब माॅ॑ के साथ मैं भी आपकी देखभाल करूंगी, शाम तक मैं यहीं हूॅ॑।”कहते हुए मालिनी ने फल साइड टेबल पर रख दिए
माॅ॑ दरवाजे पर खड़ी देखती रह गई, आज उनकी बेटी वास्तव में फिर से उन्हें अपनी लगने लगी। अपनी उसी जानी-पहचानी बेटी से माॅ॑ का पुनर्मिलन हो गया। माॅ॑ का एक सही कदम उनकी बहू और बेटी के मध्य लगाव का जामा ओढ़ा गया वरना पुत्री मोह में किसी दूसरे की पुत्री यानि अपनी बहू से शायद नाइंसाफी हो जाती…
थोड़ी देर में माॅ॑ का हाथ बंटाती मालिनी की खिलखिलाहट घर में गूंज रही थी। मालिनी ने भाभी को फल काटकर और मौसमी का जूस निकाल कर दे दिया था। आस्था भी इतना अच्छा ससुराल पाकर खुश हैं। माॅ॑ की समझदारी से ननद भाभी का रिश्ता स्नेह के , आपसी प्यार और परवाह के अटूट बंधन से जुड़ चुका है।
माॅ॑ पर हक जमाना और उससे उम्मीदें रखना सभी बच्चों को अच्छा लगता है परन्तु माॅ॑ को घर में सभी परिवार जनों का देखना पड़ता है तो बेटी का यह बदला रूप रिश्तों में प्रगाढ़ता लाने में सहायक होता है और इसके लिए माॅ॑ को यदि थोड़ा सख्त भी होना पड़े तो जाएं ताकि रिश्तों में खटास ना आने पाए।
दोस्तों,कहानी में निहित संदेश यदि पसंद आया है तो कमेंट सेक्शन में बताइएगा जरूर। आप कहानी को लाइक, शेयर एवं कमेंट करना भूलिएगा नहीं!
पढ़िए मेरी कुछ और खूबसूरत कहानियां…
बहू का नामकरण कहां तक उचित है?
https://betiyan.in/bahu-ka-naamkarn-kha-tak-uchit-hai/
तलाक हमेशा बुरा नहीं होता है!
https://betiyan.in/talak-hamesha-buranahi-hota-hai/
मिष्ठी
मतलबी रिश्ते
https://betiyan.in/matlabi-rishte/
यादों का पिटारा
https://betiyan.in/yaado-ka-pitara/
कहानियां पढ़कर अपनी राय अवश्य साझा कीजिएगा। ऐसी ही खूबसूरत रचनाओं के लिए आप मुझे फॉलो कर सकते हैं।
https://betiyan.in/category/kahani/samajik-kahaniya/priyanka-saxena/
धन्यवाद।
-प्रियंका सक्सेना
(मौलिक व स्वरचित)
#उम्मीद
Bahut hi achha sandesh dene ki koshish ki gai hai kahani k madhyam se