त्याग – डाॅ संजु झा

आखिर उमा थी तो इंसान ही.मानवीय  कमजोरियाँ कभी-कभार उसपर हावी हो ही जातीं.नहीं चाहने पर भी अनगिनत ख्यालें और यादें उसका पीछा नहीं छोड़ती.

उसके अंतर्मन की यादें परत-दर-परत अनायास  ही खुलने लगीं और अंतस की भीतरी तहों में दबी अतीत की यादें उसके सामने एक-एककर जीवंत हो उठीं.यादें उसके मन में बारिश के समान बरसने लगीं.

उमा की जिन्दगी के खुशनुमा पल व्यतीत हो रहे थे.पिता की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी,परन्तु माता-पिता की प्यार की बदौलत जिन्दगी में कोई  कमी का एहसास  नहीं था.सबसे खूबसूरत  बात थी कि उसे रमण के रुप में एक प्रेमी मिला था.रमण का साथ पाते ही उसके चारों ओर महकते हुए शोख लाल रंग खिल जाते,

जिनसे वह अपनी दुनियाँ रोशन करना चाहती थी,परन्तु अचानक से उसकी जिन्दगी में भूचाल आ खड़ा हुआ, जिससे उसके सुनहले ख्वाब तितर-बितर हो गए,उसकी जिन्दगी का मकसद ही उलट-पलट हो उठा.अचानक से हृदयाघात  से पिता की मृत्यु हो गई. घर में दो छोटे भाई-बहन और माँ की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ पड़ी.परिवार का एकमात्र  वही सहारा बन गई.

उसके युवावस्था के सपने किसी तहखाने में जाकर कैद हो गए.अब उसका एकमात्र  सपना था अपने भाई-बहन की जिन्दगी को सँवारना.

रमण एक हमदर्द के रूप में उसके घर बेरोक-टोक आने लगा.उसने रमण को शादी के लिए कुछ वर्ष इंतजार करने को कहा.रमण को भी इस बात पर कोई एतराज नहीं था.उमा अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने लगी.साधारण -सी नौकरी में उसने अपनी  छोटी बहन निशा को पढ़ा-लिखाकर

बैंक में नौकरी लगवाई और छोटे भाई को इंजिनियर बनाया.जिम्मेदारियों को पूरी करने के बाद  उसे अपने प्यार  रमण के पास वापस लौटने का अवसर मिल गया था,परन्तु उसे कहाँ पता था कि बहुत देर हो चुकी है!उसकी छोटी बहन निशा ही उसके प्यार पर डाका डाल चुकी थी.




हताश-परेशान उमा आहत दिल के साथ अपनी सहेली सुधा के पास पहुँची और उसे अपने  टूटे हुए दिल का हाल कह सुनाया.सुधा ने उसके जख्मों पर सांंत्वना रूपी रुई का फाहा रखते हुए कहा -” उमा!जिम्मेदारियों भरा जीवन कभी भी आसां और सहज नहीं होता है.

उसे जिन्दगी में रोज एक नई  समस्या का सामना करना पड़ता है.यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपनी समस्याओं का समाधान कैसे करता है?तुम्हें भी इस समस्या का समाधान खुद ढूँढ़ना होगा.”

सहेली सुधा की बातों ने उमा के दिल पर गहरा असर किया.विवशता उसके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी.उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे,परन्तु दुख और लाचारगी के नहीं,बल्कि एक  कठिन निर्णय  लेने पर खुशी के आँसू थे.सहेली की बातों से उसकी जिन्दगी को नई 

दिशा मिल चुकी थी.उसने खुशी-खुशी अपनी बहन निशा की शादी अपने प्यार  रमण के साथ कर दी.भाई की भी शादी करवा दी.भाई की इच्छाओं का ख्याल रखते हुए उसे भी अलग रहने की इजाजत दे दी.उसके कंधों पर बीमार  माँ की जिम्मेदारी आ पड़ी,जिसे वह बखूबी से निभाती गई.

उसके अपने सपने बदरंग होते गए. भावनाएँ भी संवेदनहीन हो चलीं.जड़ता उसके भीतर समाने लगी.अपनी खुशियों और इच्छाओं को दाँव पर लगाते थक गई. जिन्दगी के हर पल को बिना रुके यूँ ही हाथ से निकलते जाते देखना उसकी नियति बन गई. सोचते-सोचते उसकी आँखों से अनवरत अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी.

अचानक  से कंधे पर माँ के हाथों का स्पर्श पाकर चौंक उठी.माँ ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा -” बेटी!तुमने अपना सुख त्यागकर दूसरों के लिए खुशियाँ बांटी.तुम सेवा,त्याग,  कर्तव्य और समर्पण  की मूर्ति हो.अपना संपूर्ण  जीवन तुमने हमारे लिए  समर्पित कर दिया.अब तुम अपना जीवन समाज -कल्याण के लिए  समर्पित करो. अपनी सेवा भावना को विस्तार दो”

माँ की बातों से उमा के दिल में उम्मीद की लौ जल उठी.जिन परिस्थितियों से वह गुजर रही थी,उसे आशा का दामन ही उससे उबार सकता था.माँ की बातों से उसके मन के सारे अवसाद धुल गए.उसने कहा-”  हाँ !माँ,जिन्दगी के उतार-चढ़ाव,हालात के थपेड़ों ने मुझमें इतना ठहराव, हिम्मत और हौसला भर दिया है

कि अब मुझे किसी सहारे की जरुरत नहीं.अब मैं अपनी जिन्दगी  टूटे हुए लोगों को संबल देकर सुकून से  बिताना चाहती हूँ.दूसरों की जिन्दगी खुशगवार बनाने के लिए  साँस के आखरी लम्हों तक कोशिशमंद रहूँगी.”कहते-कहते माँ के सीने से लग पड़ी.माँ के सीने से लगकर बड़े वेग से आँसुओं का सोता फूट पड़ा.

माँ के आलिंगन में उसे एहसास  हुआ  मानो अपनेपन और गर्माहट की वही सौंधी खुशबू माँ के पास अभी भी धरोहर के रूप में सुरक्षित है.उसकी जिन्दगी में आशा का नया संचार हो चुका था.जड़ता रुपी बर्फ पिघलने लगीऔर उसकी त्याग भावना विस्तार पाने को आतुर हो उठीं.

#त्याग 

समाप्त. 

 

लेखिका-डाॅ संजु झा.

 

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