तुम देना साथ मेरा- मुकेश पटेल

समीरा देखने में जितनी सुंदर थी उतनी ही सुशील स्वभाव की भी थी। । समीरा ने शादी के कुछ दिनों बाद से ही पूरे परिवार का ख्याल रखना शुरू कर दिया था क्योंकि वह घर की सबसे बड़ी बहू थी  समीरा के पति से छोटे उसके देवर और एक ननद थी लेकिन उनकी अभी शादी नहीं हुई थी।

समीरा अपने पति विनोद से ज्यादा पढ़ी लिखी थी।  विनोद ग्रेजुएशन किया हुआ था वह भी आर्ट सब्जेक्ट से लेकिन समीरा ने एमकॉम की हुई थी तो कुछ दिनों के बाद विनोद ने अपने बिजनेस की अकाउंटिंग संबंधी कार्य अपनी पत्नी को ही सौंप दिया विनोद को एक किराने का होलसेल का दुकान था। धीरे धीरे समीरा अपने पति की दुकान भी जाने लगी और बिजनेस में भी विनोद का हाथ बंटाने लगी।  लेकिन यह सब समीरा की  सास को पसंद नहीं आ रहा था उसे ऐसा लग रहा था कि समीरा का घर पर एकाधिकार होता जा रहा है।

समीरा उसके बेटे को अपने कब्जे में तो कर ही लिया है धीरे-धीरे इस घर को भी अपने कब्जे में कर लेगी। अब समीरा की  सास उसकी  हर काम में कोई ना कोई कमियां निकालना शुरू कर दी थी। विनोद कहने को तो समीरा से बहुत प्यार करता था। लेकिन वह अपनी मां के सामने एक शब्द भी नहीं बोल सकता है या यूं कहें कि अपने मां का  रट्टू तोता था जो मां कहती थी वही करता था। लेकिन समीरा फिर भी अपने काम को सही तरीके से करने का प्रयास करती थी। वह कभी भी पलट कर जवाब नहीं देती थी।



जब समीरा की सास ने देखा कि इस पर भी समीरा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो उसने अपने छोटे बेटे देवेश और बेटी देवकी के साथ मिलकर समीरा का कोई ना कोई काम खराब करती रहती थी ताकि विनोद समीरा को डांटे।

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एक बार तो ऐसा हुआ समीरा लैपटॉप में दुकान का कोई एकाउंटिंग का काम कर रही थी और वह थोड़ी देर के लिए फोन पर बात करने के लिए छत के ऊपर चली गई तब तक उसका देवर उसमें से कुछ  महत्वपूर्ण डाटा डिलीट कर दिया जिसकी वजह से समीरा को विनोद से बहुत ही डांट खाना पड़ा।

समीरा के देवर देवेश को भी  उससे थोड़ी सी इनसिक्योरिटी महसूस होने लगी थी उसको लगने लगा कि कहीं धीरे-धीरे भाभी घर का बिजनेस अपने नाम न करा लें फिर उसका क्या होगा। देवेश ने  एक दिन अपने भाई विनोद से कहा भैया मैंने भी अब ग्रेजुएशन कंप्लीट कर लिया है। 

अगर आपकी इजाजत हो तो कल से मैं भी दुकान पर आपका हाथ बटाने आ जाऊँ। विनोद बोला हां हां क्यों नहीं मैं तो इस दिन का इंतजार कर रहा था कि कब तुम अपना पढ़ाई खत्म करोगे और अपना बिजनेस जॉइन करोगे।  तुम्हारी भाभी को भी आराम मिल जाएगा अब उसे रोज दुकान नहीं आना पड़ेगा। 

देवेश यही तो चाहता था और वह अपने प्लान में कामयाब भी हो रहा था। देवेश अगले दिन से दुकान जाने लगा और कुछ दिनों के बाद अपनी भाभी को बोला भाभी आपको यहां अब आना जरूरी नहीं है।  मैं तो यहां का काम संभाल ही लेता हूं। आप घर में आराम कीजिए जब आप की जरूरत होगी तो आपको बुला लेंगे।



समीरा देवेश की मंशा समझ नहीं पाई और वह घर में आकर रहने लगी लेकिन  घर में उसका रहना अब उसकी सास को भी पसंद नहीं था दिन भर कोई ना कोई ताने मारती रहती थी।  वो  भी सोचती थी कि इससे तो अच्छा मैं दुकान पर ही रहती थी कम से कम दिन भर की चिक-चिक से तो बची रहती थी।

धीरे-धीरे शादी के 3 साल से भी ज्यादा बीत गए थे अब तो घर में उसको  इस बात का भी ताना  दिया जाने लगा कि पता नहीं कब मुझे दादी बनने का सुख प्राप्त होगा। कभी कभी तो उसकी सास यह भी बोल देती थी कि बहू अगर कोई प्रॉब्लम है तो डॉक्टर को दिखा लो क्योंकि 3 साल हो गए।  बगल में देखो मिश्रा जी की बहू के 1 साल ही हुए शादी के और उनके घर में कितना सुंदर सा पोता आ गया। समीरा जानती थी उसको कोई प्रॉब्लम नहीं है क्योंकि समीरा और विनोद ने खुद डिसाइड किया था कि वह 5 साल के बाद ही मां-बाप बनेंगे लेकिन घर में अपने सास के ताने सुन-सुन कर समीरा भी थक गई थी और उसने मां बनने का डिसाइड कर लिया और कुछ ही महीनों में वह  गर्भवती हो गई थी। एक दिन समीरा हॉस्पिटल से अल्ट्रासाउंड करा कर आई  समीरा की सास अपने बहु से पूछने लगी। समीरा, डॉक्टर ने क्या बताया है तुम्हारे गर्भ में लड़का है या लड़की।

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समीरा बोली माँ जी मुझे नहीं पता है कि मेरे गर्भ में क्या है डॉक्टर ने मुझे नहीं बताया और आजकल यह पूछना भी कानूनन जुर्म है। लेकिन समीरा की सास कहां मानने वाली थी उसने जबर्दस्ती एक जानने वाले डॉक्टर से पता करवा ही लिया कि समीरा के पेट में पलने वाला बच्चा लड़का है या लड़की। 

जब से उसकी  सास को यह बात पता चला कि समीरा के पेट में लड़की है समीरा को और टॉर्चर करना शुरू कर दी। समीरा की सास,  समीरा को अबॉर्शन कराने के लिए दबाव देने लगी लेकिन समीरा ने साफ शब्दों में मना कर दिया था कि माँ जी अब  चाहे लड़का हो या लड़की यह मेरा बच्चा है और मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है और मैं इसे जन्म दूंगी चाहे कुछ भी हो जाए। अब तो आए दिन घर में झगड़ा होना शुरू हो गया था।  उसकी सास तो उसको  सुनाती रहती थी साथ में उसकी ननद और देवर भी इस लड़ाई में आग में घी का काम करते थे।  

एक दिन तो ऐसा हुआ जब समीरा की सास ने यह कह दिया अगर तुम हमें पोते का मुंह नहीं दिखा सकती हो तो तुम इस घर से चली जाओ । ऐसा कहने पर भी विनोद चुपचाप सुनता रहा और एक शब्द भी अपनी मां को नहीं बोला।

आज समीरा को इस बात का एहसास हो गया था कि वह इतने दिनों से इतने गंदे सोच वाले लोगों को अपना मान कर बैठी थी जो जब मर्जी आए घर से बाहर निकल जाने की फरमान सुना दे रहे हैं। धीरे-धीरे समय बिता और समीरा ने एक सुंदर सी बच्ची को जन्म दिया जिसका नाम उसने प्यार से पिंकी रखा।

अब तो वह बिल्कुल ही दुकान पर नहीं जाती थी क्योंकि घर और बच्चे संभालने से उसे बिल्कुल भी समय नहीं मिलता था।  कोई भी उसके बच्चे को हाथ तक भी नहीं लगाता था बेचारा विनोद वह तो रात में 11 बजे घर ही आता था



वो करे भी तो क्या करें अपने मां का दुलारा अपनी मां के खिलाफ भी नहीं जा सकता था। इधर समीरा का देवर देवेश ने दुकान पर जाकर इतना अकाउंट में झोलझाल करता था कि दुकान में हर महीने घाटा ही होने लगा और पैसे चुरा कर अपने अकाउंट में जमा करते जाता था 

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धीरे धीरे विनोद की दुकान भी पहले की बजाए बहुत ही कम चलने लगा था और वह घाटे में जाने लगा था क्योंकि देवेश उसमें चिट करता रहता था। समय गुजरता रहा, समीरा दुबारा मां बनी और इस बार भी उसने फिर एक लड़की को ही जन्म दिया लेकिन इस बार घर में कलह इतना बढ़ गया था कि वह इस घर में अब नहीं रह सकती थी क्योंकि उसका पति विनोद भी समीरा का साथ नहीं देता था अब वह अकेली दो दो बेटियों को कैसे पाले। विनोद का बिजनेस भी बंद होने के कगार पर पहुंच गया था और वह समीरा को एक रुपये भी खर्चा के लिए नहीं देता था समीरा परेशान हो गई थी करें तो क्या करें।

समीरा ने  एक दिन अपने पति विनोद से यह घर छोड़ कर अकेले रहने की बात कही लेकिन विनोद ने इस बात से साफ इंकार कर दिया और बोला कि तुम्हें जाना है तो जा सकती हो मैं अपना परिवार नहीं छोड़ सकता। समीरा बोली ठीक है तुम अपने परिवार को संभालो। 

मैं अपनी बच्चियों की जिंदगी खराब नहीं कर सकती हूं। समीरा जब दुकान पर जाती थी उस समय कुछ पैसे बचा बचा कर जमा किए हुए थे और अपने भाई से उसने कुछ पैसे उधार लिए और उसी शहर में एक अलग कमरा लेकर रहने लगी। 

अब घर भी चलाना था बेटियाँ छोटी-छोटी थी वह जॉब भी नहीं कर सकती थी। समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या करें। समीरा पढ़ी-लिखी तो थी ही उसके मन में एक आईडिया आया कि वह क्यों ना एक मोबाइल एप्स बनवाएं और ऑनलाइन सब्जी बेचा जाए।

समीरा ने ऐसा ही किया उसने एक ऑनलाइन सब्जी बेचने की मोबाइल एप्स बनवाई और  अपने आस-पड़ोस के घरों में जाकर इस एप्स के बारे में सब को बताती और सब को चलाना भी सिखाती थी कि अगर आपको कभी भी हरी सब्जी मंगाना है तो आप ऑनलाइन इस ऐप के द्वारा मंगा सकते हैं।

आपको 1 घंटे के अंदर आपके घर पर सब्जी पहुंच जाएगी।  इस काम के लिए उसे एक लड़के को हायर कर रखा था। धीरे धीरे समीरा का सब्जी वाला बिजनेस चल पड़ा अब वह लोकल एरिया को छोड़ पूरे शहर में अपने ऐप्स के द्वारा सप्लाई देने लगी थी।  धीरे धीरे समीरा का नाम अखबार में भी छपना शुरू हो गया था 



क्योंकि यह छोटे शहर में एक क्रांति जैसा था क्योंकि यह काम बड़े शहरों में तो होता है लेकिन छोटे शहरों में ऐसा कोई काम  बहुत कम ही होता है। इधर विनोद की दुकान भी पूरी तरह से बंद हो गई थी विनोद पूरी तरह से बेरोजगार हो गया था और छोटे भाई देवेश की भी शादी हो चुकी थी और उसने अपना अलग से एक किराने की दुकान खोल ली और अपनी पत्नी के साथ अलग  रहने लगा था। इधर विनोद की छोटी बहन यानि समीरा की ननद की शादी भी करनी थी और विनोद का बिजनेस भी पूरी तरह से चौपट हो गया था

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अब शादी हो तो कैसे हो क्योंकि छोटा भाई देवेश बिल्कुल घर को सपोर्ट नहीं करता था। एक दिन बाजार में अचानक से समीरा की मुलाकात अपनी ननद देवकी से हो गई  उसने देवकी से हालचाल पूछा और उसे अपने घर के बारे में पता चला कि विनोद पुरी तरह से बेरोजगार हो चुका है 

और छोटा भाई अपना अलग कारोबार करता है और अपनी पत्नी के साथ अलग रहता है यह सुनकर समीरा को बहुत दुख हुआ क्योंकि है तो ये भी आखिर मीरा का  परिवार ही। देवकी ने बताया कि भैया बहुत बुरी तरह से टूट चुके हैं । भाभी आप उनको संभाल लो।

समीरा बोली  ठीक है देवकी मैं कल घर पर आऊंगी।  देवकी घर जाकर जब अपनी मां को बताई की भाभी कल यहां पर आएंगी  तो देवकी की मां यानी समीरा की सास भी बहुत खुश हुई क्योंकि अब  समीरा वह समीरा नहीं थी शहर की जानेमन बिजनेसमैन में से एक हो गई थी। और इनका हालत इतना खराब हो गया था कि घर का गुजारा भी सही से नहीं चल रहा था। अगले दिन समीरा अपने ससुराल आई और बहुत सारा गिफ्ट भी लेकर आई।  समीरा ने सब का हाल-चाल पूछा और विनोद से भी मिली विनोद तो अपनी पत्नी समीरा के गले लग कर रोने ही लगा  और उसने बोला कि समीरा मुझे माफ कर दो मैं तुम्हें समझ नहीं पाया आज अगर तुम साथ होती तो शायद हमारी यह हालत नहीं होती।  मैं तो बस यही कहूंगा कि तुम यहां लौट आओ। समीरा भी विनोद के गले लग कर रोने लगी और कहने लगी बोली मैं तो कब से इंतजार कर रही हूं कि कभी तो तुम आओगे मुझे लेने और कहोगे समीरा तुम लौट आओ। समीरा बोली तुम अपनी बेटियों से नहीं मिलना चाहोगे।  विनोद बोला कहां है। समीरा बोली नीचे गाड़ी में है। इतना सुनते ही विनोद  अपने बेटियों से मिलने के लिए दौड़ पड़ा और गाड़ी से निकालकर अपनी दोनों बेटियों को घर पर लाया

समीरा की सास ने भी दोनों को गले लगाया। अब सब मिलकर साथ रहने लगे और समीरा के बिजनेस में भी विनोद ने भी हाथ बटाना शुरू कर दिया था अब तो धीरे-धीरे समीरा के मोबाइल एप्स कई शहरों में भी लॉन्च हो चुका था।

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