बदलाव – प्राची अग्रवाल
सुभाष जी अपनी पत्नी को जैसे ही समझाने का प्रयास करते, उनकी पत्नी मीनू एकदम बिखर जाती। बहु-बहु होती हैं, बेटी-बेटी। बहुत फर्क है दोनों में। बहू कभी बेटी नहीं बन सकती और सास कभी माँ। घर का माहौल भी प्रभावित होता उनकी भेद भरी बातों से।
मीनू जी ज्यादा ही पुराने ख्यालातों की थी। कार्तिक नहा रही थी। सुबह 3:00 बजे से ही दिनचर्या शुरू कर देती। एक दिन लाइट नहीं आ रही थी। सुबह अंधेरे में ऐसी ठौर लगी कि कुल्हा ही टूट गया। बिस्तर पर लाचार पड़ गई। बेटी को बुलाने के लिए कॉल मिलाया तो उसने बच्चों की पढ़ाई की व्यस्तता बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
पति और बेटे को व्यापार और ऑफिस भी देखना होता। ऐसे में उनकी बहू निशा ही उनकी दिन रात सेवा करती। उनकी आंखों में बहते पश्चाताप के आंसू उनकी बदली हुई मन स्थिति को दर्शा रहे हैं। बदलते समय के साथ रिश्तो में भी बदलाव जरूरी है।
प्राची अग्रवाल
खुर्जा बुलंदशहर
सबके साथ – लतिका श्रीवास्तव
तनु .. कहां है ओहो वहां किचेन में क्या कर रही है । दो दिनों के लिए मायके आई है चैन से बैठ ले ।आ मेरे पास बैठ तब तक बहू गाजर हलवा बना कर यहीं ले आएगी रागिनी जी ने जोर से आवाज लगाई।
मां यही तो मैं भी कह रही हूं दो दिनों के लिए यहां आई हूं और भाभी हैं कि हमेशा किचेन में ही लगी रहतीं हैं इसीलिए मैं इनके साथ हलवा बनवा रही हूं फिर सब साथ में बैठेंगे।
बेटी की बात से रागिनी जी जैसे चौंक गईं।
ठीक कहा बेटी तूने.. फिर तो मैं भी वहीं आती हूं सब साथ मिलकर जल्दी काम खत्म कर पाएंगे फिर बैठेंगे क्यों बहू..!
हां मांजी और हलवा भी खत्म कर पाएंगे तीनों की समवेत हंसी ने आज बहू को भी बेटी ही बना दिया था।
लतिका श्रीवास्तव
प्यारा- सा रिश्ता – विभा गुप्ता
” माँ…समधी जी ने दस दिनों के अंदर ही शादी करने को कहा है..अब प्रभा का तो अपनी बहुओं से ज़रा-भी नहीं बनती…फिर..।” शशिकांत ने चिंता व्यक्त की तो अम्मा जी बोलीं,” तू समधी जी को हाँ कह दे..नीता बिटिया की शादी अच्छे-से हो जायेगी..ये सास- बहुएँ हैं ना…सब संभाल लेंगी।”
शशिकांत के दोनों बेटे विवाहित थें और बेटी नीता की शादी की तैयारियाँ चल रहीं थीं।उन्हें फ़िक्र थी कि घर की महिलाओं में तो अनबन होती रहती है तो फिर कैसे…।लेकिन वैवाहिक कार्यक्रमों को तीनों महिलाओं को एकजुट होकर करते देखा तो वो चकित रह गयें।बेटी विदा हो गई तब वो अपनी माँ से पूछे,” ये चमत्कार कैसे…।” अम्मा जी हँसते हुए बोलीं,” बेटा..सास- बहू के बीच एक प्यारा-सा रिश्ता होता है।ये सास-बहुएँ साथ रहकर कलाई की चूड़ियों की तरह खनकती हैं… एक- दूसरे से टकरातीं भी हैं लेकिन जब परिवार के सम्मान की बात होती हैं तो वे अपने ईगो को ताक पर रखकर अपना जी-जान लगा देतीं हैं।मेरी बहू और तेरी बहुओं ने भी यही किया है..।”
” अच्छा…!।” सुनकर शशिकांत को बहुत आश्चर्य हुआ और खुशी भी।
विभा गुप्ता
# सास- बहुएँ स्वरचित
बेटी_बहुएं – नीलम शर्मा
शांति जी के पोते का जन्मदिन था। उसमें कुछ मेहमान ऐसे भी थे जो एक-दो दिन पहले आते। वैसे तो सारी तैयारी में खूब पैसा खर्च किया जा रहा था। पर जब उनकी बहू ने एक-दो दिन पहले किसी को घर और रसोई के काम के लिए रखने को कहा तब शांति जी के पति बोले, अरे तुम और तुम्हारी नंदे मिलजुलकर, कर लेना। क्यों फिजूल खर्ची करनी। क्योंजी वे काम करेंगीं, सब मौज करेंगे।
पहले के लिए भी कुछ इंतजाम कीजिए। जिससे कि हमारी बेटी बहुएं भी प्रोग्राम का आनंद ले सकें।
नीलम शर्मा
बेटी बहुएं – खुशी
माला जी अपनी बेटी और बहु दोनो के साथ बाजार से घर आई।बड़ी गर्मी थीं घर में घुसते ही बेटी रेखा ने सामान फेका और चिल्लाई कुछ ठंडा लाओ प्यास लगी है।माला जी बोली रतना जल्दी से ठंडा बनाओ बाहर बड़ी गर्मी है। रतना सोच रही थी कि मैं भी तो बाहर से आई हूं। रतना ठंडा लाई तो माला जी बोली रतना ये सामान समेटो और खाना बनाओ भूख लगी है।रतना बोली मां में भी थक गई हु।माला जी बोली तुम क्या थकी सामान ढूंढा हमने और तुम थक गई।थकी तो मेरी बेटी है।खाना बना हम एसी में बैठे हैं मेरे कमरे में।रतना सोच रही थी कितना फ़र्क है बहु और बेटी में।
स्वरचित कहानी
आपकी सखी
खुशी
#बेटी_बहुएं – मीनाक्षी सिंह
आज रमाकांत की बहू की शादी थी …
आपने सही सुना बहू की शादी थी…
भई रमाकांत मिसाल पेश कर दी..
बेटे रोहन के दुनिया से विदा होने के बाद बहू को पढ़ाया, लिखाया ..
उसको पैरों पर खड़ा कर आज बेटी के रूप में अपने घर से विदा कर रहा है…
काश तेरा जैसा ससुर सबका हो …
तो इस दुनिया में कोई भी बहुत दुखी ना रहे ..
रमाकांत जी से उनकी बहू सीने से लगकर ऐसे रो रही थी..
जैसे अपने पिता से विदा ले रही हो..
रमाकांत जी की आंखें नम थी..
इतना ही बोल पाए..
खुश रह, मस्त रह …
मीनाक्षी सिंह की कलम से
आगरा
#100 शब्दों की कहानी
पारिवारिक वार्तालाप – डॉ बीना कुण्डलिया
“ ये मेरा घर है यहां सिर्फ मेरा हुकूम चलेगा मेरे बेटे मेरी सुनते, सुनेंगे “। मायावती का बहुओं को दो टूक जवाब।
बड़ीबहू -”बेटियांँ दिल का दर्द तो बहुएं दर्द की दवा, अपनी बेटी के लिए जैसे ससुराल की उम्मीद रखती हो वैसा ही व्यवहार हमसे कीजिए “।
छोटीबहू- “हम कोई सामान या गुलाम नहीं,किसी की बेटी ही किसी की बहू है ”।
बेटी -”अरी माँ…. रिश्तों में उतार चढाव आते रहते हैं, समझदारी से निर्णय लेकर ही घर स्वर्ग बनता है “।
( सभी में संतुष्टि के भाव दिखे)
आज जो बेटी,कल बहू बनेगी,बहू बनकर माँ बनेगी, बेटी जनेगी ।
लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया
बेटी -बहुएं
गागर में सागर
#बेटी – बहुएँ – संगीता अग्रवाल
” अरी सुमन की माँ जितने लाड लड़ाने बेटी के लगा लो फिर कल को ये चली जाएगी तो कोई लाड लड़ाने वाला ना होगा !”
” क्यो जी कल को दो दो बहुएं भी तो आएँगी इस घर मे उनको लाड लड़ाउंगी ना !”
” अरे बहुएं तो बहुएं होती है बेटी की तो बात अलग है ।”
” हर बेटी को बहू बनकर जाना होता है और हर बहू किसी की बेटी । तो बेटी – बहू दोनो को लाड दो तो हर घर मे खुशहाली रहती है और मैं अपना घर खुशहाल चाहती हूँ ।”
संगीता अग्रवाल
*घर की मालकिन* – बालेश्वर गुप्ता
शुभ्रा एक बात बोलूं-देखो बहू अब घर तुम्हे संभालना है,30 वर्षो से मैं संभाल रही हूँ, थक गयी हूँ, अब तुम आ गयी हो तो अब मुझे आराम मिलेगा।
कैसी बात कर रही हो माँ जी,मैं तो नूपुर जैसी हूँ।
नहीं-नहीं, नूपुर तो तुम्हारी ननद है,इस घर की बेटी है,जबकि तुम बहू हो।शुभ्रा,बहू को बहू बन कर ही रहना चाहिये,बहू घर की मालकिन होती है,जबकि बेटी होती है-पराये घर की धरोहर।धरोहर घर की मालकिन नही होती,बहू ही हकदार होती है।
आश्चर्य से शुभ्रा अपनी सासू माँ का चेहरा देखती रह गयी।उसने तो सुना था कि अच्छी सास बहू को बेटी मानती है,पर ये सास तो बहू को घर की मालकिन बता रही है,वह भी अपना हक छोड़कर।
शुभ्रा ने आगे बढ़कर अपनी सासू माँ के चरण स्पर्श कर लिये।
बालेश्वर गुप्ता,नोयडा
मौलिक एवम अप्रकाशित
बदलाव की बयार – मोनिका रघुवंशी
पापा देखो न भैया फिर अपने दोस्तों के साथ रात की पार्टी में जा रहा है और मां दादी मुझे दिन में भी सहेलियों की बर्थडे पार्टी में नही जाने देते।…. कंचन रिसाते हुए बोली।
तो का हुआ छोरी…इसमे इतना रिसियाने की का बात है, ऊ छोरा है, मौज मस्ती नही करेगा तो का घर में रसोई संभालेगा। तू ठहरी पराई अमानत कल को कोई ऊंच नीच हो गयी तो…..दादी सुकन्या जी पान चबाते है बोली।
ये कैसी बात कर रही है मां आप, हमेशा कंचन ही क्यों ‘समझौता’ करे। कुणाल लड़का है तो क्या हुआ उसे भी तो अपनी जिम्मेदारियां समझनी चाहिए।
दरवाजे पर कंचन के माता पिता खड़े थे। अब वो दिन नही नही रहे मां हम सभी को समय के साथ कुछ बदलाव अपने मे करने होंगे। लड़का हो या लड़की नियम दोनो को ही समझने और निभाने होंगे, तभी सुरक्षित और सुदृढ समाज बना पाएंगे।
मोनिका रघुवंशी
गागर में सागर
समझौता