Top Ten Shorts Story in Hindi – हिन्दी लघुकथा

मेरा फ़र्ज़ है –  विभा गुप्ता 

        ” क्या! तूने ज़ाॅब छोड़ दिया..इतनी मेहनत से पढ़ाई की और..।” दीपा ने अपनी सहेली मानसी से कहा तो मानसी मुस्कुराते हुए बोली,” सब बताऊँगी…तू घर तो आ..।” कहते हुए उसने दीपा के नंबर पर अपने घर का पता लिखकर सेंड कर दिया।

           दीपा जब मानसी से मिलने गई..तब वो बिस्तर पर लेटी एक बीमार महिला का स्पंज का रही थी।दीपा ने हैरत-से कहा,” मानसी..क्या यही सब करने के लिये तूने अपनी नौकरी के साथ समझौता किया है।तू तो सबसे बड़ी बेवकूफ़ निकली..।”

   तब मानसी हँसते हुए बोली,” बिस्तर पर लेटी महिला मेरी बड़ी ननद प्रभा दीदी हैं।माता-पिता के देहांत के बाद इन्होंने ही अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर प्रशांत(मेरे पति) की पढ़ाई पूरी करवाई।दिन-भर फ़ैक्ट्री में काम करती और रात में सिलाई करतीं।उन्होंने प्रशांत की पढ़ाई के साथ कोई #समझौता नहीं किया तो आज दीदी की असहाय अवस्था में उनकी सेवा करना मेरा फ़र्ज़ है, समझौता नहीं।नौकरी तो फिर मिल जायेगी लेकिन माँ समान दीदी तो नहीं..।” कहते हुए उसकी आँखें नम हो आईं।तब दीपा ने उसे साॅरी कहा और दोनों सहेलियाँ बातें करने लगी।

                                 विभा गुप्ता 

# समझौता             स्वरचित,बैंगलुरु 

 

समझौता – खुशी 

प्रीति अपनी चचेरी बहन के घर रह कर पढ़ाई कर रही थी। बहन जीजाजी उसे बहुत प्यार करते थे।बेटी की तरह मानते थे।इसलिए प्रीति के माता पिता भी निश्चिंत थे। एक दिन प्रीति की बहन को को किसी जरूरी काम से अपने मायके जाना पड़ा वो शाम तक आने वाली थी।दिन में प्रीति कॉलेज से आई तो घर में जीजाजी थे।प्रीति बोली आप घर पर वो बोले बस यही काम था इसलिए प्रीति खाना खाने बैठी तो उसके जीजाजी उसके पास आए और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। प्रीति डरकर बोली जीजाजी आप ये क्या कर रहे हैं।वो बोला जो कब से करना चाहता था।तुम मुझसे समझौता कर लो तुम भी खुश मै भी। प्रीति बोली आपको शर्म नहीं आती ये बकवास करते ।मै आपको पिता स्वरूप समझती हूं और आप।

प्रीति ने कमरे में आ कर दरवाजा बंद किया और अपना सामान समेटने लगी।शाम को अपनी बहन के आते ही वो अपने घर लौट आई।बहन ने बहुत पूछा वो बस इतना ही बोली मै समझौता नहीं कर सकती।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी

सैंडविच – भगवती सक्सेना गौड़

अमर आफिस से आकर हॉल में मम्मी के पास बैठा। तभी अक्षरा ने कमरे से आवाज़ दी, “सुनो जी, यहां आओ, मैं इतंजार कर रही और वहां जाकर बैठ गए अब कष्टों का जखीरा पलटेंगी, जल्दी उठने ही नही देंगी।

अमर उठे तो मम्मी ने रोका, “रुक जा ना, क्या जोरू का ग़ुलाम जैसे दौड़े चले जाता है।”

दोनों के बारे में विचार करने लगा, समझौता तुम आपस मे कर ना पाती हो,  जरा सा झुकना अपना अपमान बतलाती हो, जीना दुश्वार तुम पति और बेटें का बनाती हो।

हर घर मे बेटा सैंडविच बनकर रह जाता है।

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बेंगलुरु

 

दिल पिघल गया।। – अंजना ठाकुर

प्रतीक ने रंजना से अपने बेटे मोनू की खातिर शादी करी लेकिन रंजना मोनू के प्रति निष्ठुर ही रहती उसके दिल मै ममता जाग नहीं रही थी ।तीन साल का मोनू मीठी मीठी बातों से मां के पास आने की कोशिश करता पर रंजना दूरी बनाई रखती मोनू की दादी समझाती बहू अब तुम्हे अपनी ममता से समझौता कर इसे अपनाना चाहिए बच्चे को मां की जरूरत है मेरे बाद तुम्हे सम्हालना है ।पर रंजना जिद्द पर अड़ी रही कुछ दिन बाद रंजना चलते चलते गिर गई मोनू पास आ कर उसको सहलाने लगा उसकी मासूम हरकत पर कठोर दिल पिघल गया और रंजना ने अपनी जिद्द को छोड़ ममता से समझौता कर लिया ।।

अंजना ठाकुर

 

समझौता” – हेमलता गुप्ता

निशा बेटा.. तुम्हें आज तक  यही लगता है कि तुमने संचित के साथ  शादी बस समझौता करके निभाई है इसीलिए तुम अलग होने की सोच रही हो, बेटा बाहर ना जाने तुम्हें कितने समझौते करने पड़ेंगे, तब किस से शिकायत करोगी, संचित ने भी तो तुम्हारे लिए कितनी समझौते किए हैं तुम्हें उसके समझौते दिखाई नहीं देते? एक बार ठंडे दिमाग से सोच कर देखो हर इंसान को हर कदम पर समझौता करना ही पड़ता है चाहे घर हो या बाहर, तो सिर्फ पति-पत्नी ही  समझौता शब्द को इतना महत्व क्यों देते हैं ?? आखरी फैसला तुम्हारा है.. ऐसा कहकर निशा के पापा वहां से चले आए!

    हेमलता गुप्ता स्वरचित 

    शब्द प्रतियोगिता “समझौता”

 

#समझौता – डाॅ उर्मिला सिन्हा 

5/12/2024

पुलिस के साथ अपने अदना कर्मचारी को देख तथाकथित सफेदपोश का चेहरा सफेद पड़ गया। वे चीख पड़े” मेरे टुकडों पर पलने वाला तुम्हारी हिम्मत कैसे आई…मेरे खिलाफ पुलिस में शिकायत करने की।”

 ” साहब मैं गरीब जरूर हूं लेकिन देशद्रोही नहीं… अपने मातृभूमि के सम्मान के साथ समझौता नहीं कर सकता…” उसने पुलिस को दुसरी ओर इशारा किया।

भारी मात्रा में आपत्तिजनक जनक सामान और देशद्रोही गद्दार पकड़ा गया।

मौलिक रचना -डाॅ उर्मिला सिन्हा 

*सामंजस्य* – बालेश्वर गुप्ता

       शारदा देवी चुपचाप गांव चली गयी।ऑफिस से आने पर घर मे मां को न पा,राहुल ने पत्नी अवनी से माँ के बारे में पूछा तो अवनी ने अनभिज्ञता प्रकट कर दी।माँ के कमरे में उनका बक्सा भी नही था,साफ हो गया माँ घर छोड़ गयी है।अपने गांव के प्रधान से जानकारी मिली कि माँ तो गांव में है।राहुल ने समझ लिया कि अवनी के असम्मानजनक व्यवहार के कारण माँ हमे छोड़ कर चली गयी है।

         राहुल ने अवनी से स्पष्ट रूप से जता दिया कि अवनी तुम मेरा जीवन हो तो माँ मेरी सांस, अब तुम ही बताओ बिना सांस के जीवन कैसे जिऊँ?अवनी राहुल द्वारा दिल की गहराई से कही बात को सुन कांप गयी।वह कैसे निष्ठुर हो गयी थी,जो अपनी उसी सास को सम्मान न दे सकी जो उसे बड़े अरमान से इस घर मे लायी थी।

      अचानक अवनी बोली-सुनो राहुल हम अभी गाँव जा रहे हैं, माँ को लेने।मैं ही अपराधन हूँ, मुझे माफ़ कर देना।

     राहुल और अवनी दोनो ही गावँ की ओर जा रहे थे।

बालेश्वर गुप्ता,नोयडा

मौलिक एवम अप्रकाशित

 

आईना सच्चाई का – प्राची अग्रवाल 

महिलाओं की किट्टी पार्टी एक रेस्टोरेंट में चल रही थी। सभी महिलाएं घर से अच्छी तरह से तैयार होकर पार्टी करने के मूड से बैठी हुई थी। ठहाके लग रहे थे। सभी आपस में मित्र थी।

मासिक पैसे देने का काम चल रहा था। एक महिला जो अपने को ज्यादा स्मार्ट बनती है सभी के पैसों का कलेक्शन कर रही थी। पर गड़बड़ किसी से भी हो जाती है। सभी महिलाओं के पैसे आने के पश्चात एक पेमेंट कम रह जाती हैं। थोड़ी देर में ही महिलाओं में आपस में छींटाकशी और आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है। सभी एक दूसरे का विरोध करने लगी। जो महिलाएं थोड़ी देर पहले मित्र थी अब एक दूसरे के ऊपर इल्जाम लगा रही थी। सभी अपने को सच्चा साबित करने की कोशिश कर रही थी। अपनी औकात बता बता कर एक दूसरे को नीचा भी दिखाया जा रहा था।

जिस महिला पर संदेह हो रहा था वही सबसे ज्यादा दूसरों का गला पड़कर अपने आप को सच्चा साबित करने की कोशिश कर रही थी। 

किट्टी का उस दिन का कार्यक्रम रंग में भंग के चलते खराब हो जाता है। हुआ सो हुआ लेकिन कई चेहरों की हकीकत सामने जरूर आ गई।

अपने ऊपर बात आती है तो सभी को बुरा लगता है। दूसरों पर इल्जाम लगाने में सभी को मज़ा आता है।

हम बाहरी रिश्तो के लिए अपनों से दूर होते हैं जबकि यह दिखावे के रिश्ते केवल आपकी औकात से बने हुए होते हैं।

गिरगिट की तरह रंग बदलते चेहरों को देखा है मैंने।

आंख दबाकर फितरत बदलते चेहरों को देखा है मैंने।

परिस्थितियों विपरीत क्या हुई जरा सी किसी की, 

कितने की शरीफ चेहरों से नकाब उतरते देखा है मैंने।

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित 

प्राची अग्रवाल 

खुर्जा बुलंदशहर उत्तर प्रदेश 

#विरोध करना पर आधारित लघु कथा

विरोध – सुभद्रा प्रसाद

         ” सुनो कंचन, मैंने सोनम की शादी बहुत शानदार ढ़ंग से करने का प्लान बनाया है | ” राजन अपनी पत्नी से बोला | 

        ” मैं आपके इस शानदार प्लान का विरोध करती हूँ और चाहती हूँ कि शादी  सादे ढंग से किया जाय |” कंचन बोली | 

        ” ऐसा क्यों भला, क्या कमी है हमारे पास और सोनम तो हमारी इकलौती बेटी    है | “

       ऐसा इसलिए कि मैं चाहती हूँ कि शादी के तामझाम में पैसे खर्च करने के बदले हम सोनम के नाम से एक फ्लैट खरीद कर उसे दे दें, ताकि उसे मेरी तरह बार- बार ” यह तुम्हारा घर नहीं है ” का ताना न सुनना      पडे | ” कंचन एक सांस में बोल गई |

       राजन से कुछ कहते नहीं बना |उसे अपने और अपनी माँ द्वारा कंचन को दिये ताने याद आने लगे और वह कंचन की बात मानने को तैयार हो गया |

# विरोध – सुभद्रा प्रसाद

स्वलिखित और अप्रकाशित

सुभद्रा प्रसाद

पलामू, झारखंड

 

विरोध – जागृति वैदेही

अपनों के विरुद्ध नशेड़ी पति से तलाक लेकर मानसी ने जब अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए के लिए पार्ट टाइम जॉब

ज्वाइन करने का फैसला किया तो ससुराल वालों ने उसकी बेटी छीन ली थी । रोती- बिलखती बच्ची को देखकर वह

सहम गई थी लेकिन उसकी मां ने उसे रोक लिया ।आज पूरे तीन साल बाद वर्दी में सजी वह अपनी बेटी को लेने

ससुराल आई थी तब किसी में उसके विरोध की हिम्मत नहीं थी। उसे अपने फैसले पर गर्व हो रहा था कि सही समय

पर किये गए विरोध से वह अबला से सबला बन गई थी।

स्व रचित

जागृति वैदेही

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