छोटी सोच – शिव कुमारी शुक्ला
योगेश जी रिटायर्ड आईएएस अधिकारी थे जो अभी कुछ माह पहले ही इस पॉश कालोनी में अपने स्वनिर्मित बंगले में रहने आये थे।
पड़ोसियों ने उनसे मेलजोल बढ़ाने की कोशिश की जिसे उन्होंने सिरे से नकार दिया। फिर किसी ने उनकी तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा।
वे बडा अकेलापन महसूस करते किन्तु अंहकारवश किसी से बात नहीं करते।
एक दिन विनय उनका दोस्त जो स्वयं भी रिटायर्ड आईएएस था मिलने आया।
शाम को वे पार्क में घूमने गए।उसे हैरानी हुई कि कोई भी योगेश से बात नहीं कर रहा था।
जब विनय ने कारण पूछा तो वे बोले कौन इन छोटे लोगों के मुंह लगे।
यह सुन विनय ठहाका लगा हंस पड़ा और बोला यार तू अभी भी ऑफिस की कुर्सी से चिपका पडा है। वहां से बाहर निकल और जिन्दगी के मजे ले इतना अंहकार भी ठीक नहीं अब तू एक आम वरिष्ठ नागरिक है और समाज में वही भूमिका निभा।
योगशजी अपनी छोटी सोच पर लज्जित हो गये।
शिव कुमारी शुक्ला
अहंकार का नतीजा विनाश होता है। – सीमा प्रियदर्शिनी सहाय
मैं सबसे शक्तिशाली हूं,मेरी बराबरी कोई नहीं कर सकता!”सरोवर की एक बड़ी मछली ने छोटी मछलियों से कहा।
जो मछली उसके पास जातीं उन्हें वह अपना विशाल मुंह खोल कर निगल जाती।
देखते-देखते सरोवर की अधिकांश मछलियां खत्म हो गईं।
बड़ी मछली और वृहताकार हो चुकी थी।
घमंड और अहंकार में भरकर वह सरोवर की सतह में तैर रही थी कि उड़ते हुए एक बाज की नजर उसपर पड़ी।
वह नीचे उतरा और उसे उठाकर पर्वत पर ले गया और उसका पेट फाड़ कर उसे खाने लगा।
जैसे उसका पेट फटा उसके भीतर से छोटी मछलियां नीचे गिरने लगीं।
नीचे एक छोटा सरोवर था।सारी मछलियां उसी में गिर पड़ी और एक दूसरे को देखकर हंसने लगीं
“अहंकार का नतीजा विनाश होता है।”
प्रेषिका -सीमा प्रियदर्शिनी सहाय
#अहंकार
अहंकार – संध्या त्रिपाठी
रोज-रोज के तू , तू -मैं ,मैं से तंग आ चुकी हूं…आज मैंने फाइनली फैसला ले ही लिया है मम्मी… तुषार से अलग होने का फैसला ….मेरी नौकरी है , अच्छा कमा लेती हूं , आत्मनिर्भर हूं ….फिर किसी का क्यों सुनु …?
तू ये कैसी बातें कर रही है तृषा… पति-पत्नी के रिश्ते में दोनों पक्षों की ओर से समझदारी , एहसास ,भावना ,प्यार के साथ-साथ थोड़ा बहुत समझौता भी जरूरी है… ताकि जिंदगी खूबसूरती से आगे बढ़ती रहे ….पर आज मुझे तेरी बातों से लग रहा है कहीं तेरी….” आत्मनिर्भरता अहंकार तो नहीं बन गई “…!
(स्वरचित)
संध्या त्रिपाठी
अंबिकापुर ,छत्तीसगढ़
अहंकार – डाॅक्टर संजु झा।
बिस्तर पर लाचार-बेबस रमेश जी सोचते हैं कि अगर उन्होंने अपना अहंकार त्यागा होता,तो आज उनकी ये दुर्दशा नहीं होती। शेर -सी दहाड़ रखनेवाले रमेश जी ने इस स्थिति की कभी कल्पना भी नहीं की थी।उनके अहंकार के बोझ तले दबी-बुझी उनकी पत्नी असमय ही काल-कवलित हो गई। बेटी शादी कर विदेश में बस गई।माँ के प्रति उनके निरंकुश व्यवहार के कारण बेटी ने भी उनके मुख मोड़ लिया।बेटे ने अपनी मर्जी से प्रेम-विवाह किया तो उसे भी घर से निकाल दिया।अब अस्वस्थ होने पर नौकरों के भरोसे असहाय और बेबसी की जिन्दगी जी रहें हैं।अब उन्हें एहसास हो रहा है कि अहंकार बहुत बुरी चीज है।इसी अहंकार ने सर्वशक्तिमान रावण को समूल नष्ट कर दिया था,तो आम इंसान की क्या औकात!
समाप्त।
लेखिका-डाॅक्टर संजु झा।
अहंकार – एकता बिश्नोई
अभी-अभी दफ्तर से लौटे रमेश बाबू के कानों में कमला फुसफुसाई.. ” जयचंद सट्टेबाजी में पकड़ा गया है।” तुम्हें किसने बताया.. “मोहल्ले की औरतें बतिया रही थीं”..” लेकिन तुम अपना मुंँह बंद रखो”..” मैं क्यों मुंँह बंद रखूंँ.. उसकी मांँ हमारे सचिन के बारे में कह रही थी..बहनजी आपका बेटा हर समय घोड़े पर सवार रहता है कभी ढंग से नमस्ते भी नहीं करता; इसको कुछ संस्कार सिखाइए… कैसे महंगी साड़ियांँ और गहने पहनकर अहंकार से लदी हुई इधर से उधर डोलती फिरती थी.आज पता चल गया होगा..संस्कार की जरूरत मेरे बेटे को नहीं बल्कि स्वयं के बेटे को है।
नाम – एकता बिश्नोई
अहंकार – मंजू ओमर
दीदी जीजाजी कार में तो बैठ कर घर तक आ गए लेकिन उनसे ये न हुआ कि गाड़ी में पेट्रोल डलवा ले , संध्या की छोटी बहन शशी ने कहा । कहीं से ये बात संध्या को पता लग गई तो संध्या और मुकेश जी को बहुत बुरा लगा।
भतीजे की शादी से लौट रहे थे दोनों लोग तो शशि ने संध्या से कहा गाड़ी से चलो जबकि उनके पास टे्न का टिकिट था फिर भी शशी उनको अपने साथ ले आई और फिर ऐसी बातें बोलने लगी । मुकेश जी संध्या के पति संध्या से बोले तुम्हारी छोटी बहन को बहुत अहंकार है गाड़ी का हमलोग तो ट्रेन से आते तुम्ही तैयार हो गई थी गाड़ी से आने को लो अब सुना दिया न उसने ।अब आगे से ध्यान रखना किसी की भी गाड़ी में नहीं जाना है समझी । बेइज्जत नहीं होना है हमें इतने गए गुजरे हैं क्या।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
16 नवंबर
*फर्क* – पुष्पा जोशी
सोहन और मोहन रमानाथ जी के बेटे थे। बचपन में ही मॉं का साया उठ गया,पिता ने ही परवरिश की। सोहन एक बड़ी कंपनी में ऑफीसर बन गया उसका लक्ष्य था बस पैसे कमाना। उसे पैसो का अहंकार था। मोहन पिता की सेवा में सुख अनुभव करता था, उनका आशीष उसकी दौलत था,उसकी छोटी नौकरी थी। रमानाथ के जन्मदिन पर उन्होंने मोहन का लाया कुर्ता पायजामा पहना तो सोहन नाराज हो गया। बोला- ‘मैंने इतना मेंहगा सूट आर्डर किया उसे छोड़ आपने यह हल्के कपड़े पहने।’ रमानाथ ने कहा-‘दोनों उपहार मे फर्क है तूने आनलाइन आर्डर किया उसमें न तेरा स्पर्श है, न तेरा प्रेम सिर्फ अहंकार है। मोहन के लाए कपड़ो में उसका सहज प्रेम है।’पिता की बातों से उसका अहंकार पराजित हुआ।
प्रेषक-
पुष्पा जोशी
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित
खर्चा – लतिका श्रीवास्तव
मोहन जी बधाई हो वाकई आपकी मेहनत ने और बेटे की पढ़ाई में किए खर्च ने ही उसे इस पद पर पहुंचा दिया है समर्थ जी खुश थे।
अंकल ये किस खर्चे की बातें कर रहे हैं आप !पापा ने किया क्या है मेरे लिए !इतना तो हर पिता करता है इनके मत्थे तो चपरासी भी नहीं बन पाता ये तो सब मेरी काबिलियत मेरी मेहनत है बधाई मुझे दीजिए पापा को नहीं शिशिर ने दंभ से कहा।
पिता मोहन जी के चेहरे पर आती मुस्कान उदास हो गई..! शिशिर की बातों में खौलते अहंकार के गरम छींटों ने समर्थ जी को गर्म कर दिया ..!
सब तेरी मेहनत से हुआ है शिशिर तो जा अपने पिता के गिरवी रखे मकान को छुड़ा ले और ओवरटाइम चौकीदारी करने में खर्च हुई उनकी अनगिनत रातों की नींद और सुकून भी वापिस लौटा दे। समर्थ जी की तेज झिड़की ने शिशिर का सिर शर्म से नीचे झुका दिया था।
लतिका श्रीवास्तव
अहंकार – नीलम शर्मा
नीरज जी के बेटे को पुलिस जुआ खेलने के जुर्म में पकड़कर ले जा रही थी। पूरा मौहल्ला उनकी पीठ पीछे हंसी उड़ा रहा था। ये वही बेटा था जिसके कभी कॉलेज टॉप करने पर ही उन्हें इतना अहंकार हो गया था कि उसे सही गलत के लिए टोकन ही बंद कर दिया। यह उसका गलत संगति में पड़ने का परिणाम था कि नीरज जी की अहंकार से अकड़ी हुई गर्दन आज सबके सामने झुकी हुई थी। पुरानी कहावत है “अहंकार तो राजा रावण का भी नहीं रहा”।
नीलम शर्मा
चार दिन की चाँदनी – विभा गुप्ता
काॅलेज़ में पढ़ने वाली नित्या ने अपना बैग कंधे पर डाला और आईने में अपना चेहरा देखने लगी कि पीछे-से आकर उसकी ताई की बेटी रश्मि अहंकार मिश्रित स्वर में बोली,” कितना भी निहार ले..तू काली की काली ही रहेगी..।” सुनकर वह खून का घूँट पीकर रह गई।बचपन में जब रश्मि उसके रंग को लेकर व्यंग्य कसती थी तो माँ उसे समझाती,” रूप तो चार दिन की चाँदनी है..उस पर इतराना मूर्खता है।”
एक दिन काॅलेज़ के एक मनचले ने रश्मि का हाथ पकड़ लिया तो उसने उस लड़के को थप्पड़ मार दिया।अगले दिन उस लड़के ने रश्मि के चेहरे पर तेज़ाब फेंक दिया।इलाज से उसकी जान तो बच गई लेकिन चेहरा….।महीने भर बाद जब उसने आईना देखा तो डर गई।जिस रूप के अहंकार में वो नित्या का मज़ाक उड़ाती थी, वो रूप तो क्षणभंगुर निकला…उसकी आँखों से दुख और ग्लानि के आँसू बहने लगे।
विभा गुप्ता
# अहंकार स्वरचित, बैंगलुरु