क़ुसूर – स्नेह ज्योति
सुबह – सुबह के शोर में जब कृपाल ने आँखें खोली तो उसने देखा कि उसकी मकान मालकिन ज़मीन पर गिरी हुई है और आस-पास खून होली के रंग सा बिखरा हुआ है । थोड़ी देर में पता चला कि उसके नशेडी बेटे ने उसका ही गला काट दिया । आज वो पुलिस की गिरफ़्त में क़ैद ख़ुद को कोस रहा था । उसकी माँ उसकी ड्रगस की आदत की वजह से हमेशा दूसरो के आगे शर्मिंदा होती थी । लेकिन आज उसका वो ही बेटा अपनी इस हरकत की वजह से बहुत शर्मिंदा हो रहा था । लेकिन कहते है ना कि वक़्त गुज़र जाने पर कुछ हाथ नहीं लगता । किसी का किया गया क़ुसूर को कोई माफ़ नहीं कर सकता ।
#शर्मिंदगी
स्नेह ज्योति
शर्मिंदगी-शनाया अहम
आज शर्मिंदा होने की बारी उसकी थी जब उसकी बेटी ने सबके बीच उसे गंवार बोल दिया। निशि सिर्फ 5 साल की है और आज भरी महफ़िल में उसने अपने जन्मदिन पर अपनी माँ निराली को गंवार बोल दिया। निराली भौंचक्की रह गई अपनी बेटी के मुंह से अपने लिए ये शब्द सुनकर।
निराली ने निशि के एक चांटा लगा दिया।
लेकिन मम्मा आप भी तो दादी को बात बात में गंवार कहती हो, जब दादी हाथ से खाना या चावल खाती हैं या जब दादी सुर्र करके चाय प्लेट में पीती हैं।
जब मैंने आपसे पूछा था की गंवार क्या होता है तो आपने कहा था तेरी दादी जैसे होते हैं “गंवार” ।
दादी हाथ से खाती है चमचे से नहीं तो आप उन्हें गंवार बुलाती हो तो आज आपने भी तो अपने हाथ से मुझे केक खिलाया तो आप भी तो गंवार हुई न मम्मा।
“सुन लिया निराली, ये तुम्हारे ही सिखाये हुए बोल हैं जो आज तुम्हें ही सुनने पड़ रहे हैं, निराली के पति विशाल ने उसे आइना दिखाते हुए कहा।
मेरी माँ तो फ़िर भी अपनी बहु के मुंह से ये सुनती आई है लेकिन तुम, तुम्हें तो अपनी बेटी के मुंह से अपने लिए ये शब्द सुनने को मिल गया।”
निराली के पास कहने को शब्द नहीं थे लेकिन उसकी आँखें आंसुओ से भरी और शर्मिंदगी से झुकी हुई थी।
शनाया अहम
शर्मिंदगी – रश्मि झा मिश्रा
“आप यह क्यों नहीं सोचते… लड़का दसवीं पास हो गया…!”
” तुम सोचो… पास हो गया…दो नंबर गणित में और कट जाते… तो फेल हो जाता तुम्हारा लाडला…
मुझे तो सोचते हुए शर्म आती है…!”
” शर्मिंदगी एक एहसास है… जो इंसान की केवल अपनी सोच का परिणाम होती है…
इससे दूसरों का कोई लेना देना नहीं होता…
मैं तो खुश हूं…
गणित को छोड़… बाकी सब में तो बढ़िया है ना…!”
रश्मि झा मिश्रा
शर्मिंदगी – नीलम शर्मा
नितिन और रिया का बेटा लाड-प्यार में इतना बदतमीज हो चुका था कि किसी को कुछ भी कह देता। उसे समझाने की बजाए वे खुश होते। एक दिन नितिन के बॉस उसके घर डिनर पर आए तो नितिन ने अपने बेटे से कहा, बेटा अंकल को नमस्ते करो तो उसका बेटा बोला “मैं किसी गंजे को नमस्ते नहीं करता”,और टकला-टकला करता हुआ वहां से चला गया। शर्मिंदगी से नितिन अपने बॉस से नजरे नहीं मिला पा रहा था। आज उसे लग रहा था बच्चे को सही गलत का अहसास कराना कितना जरूरी है।
नीलम शर्मा
स्टैंडर्ड – लतिका श्रीवास्तव
रामू ये काजू कतली के डिब्बे कॉलोनी में बांट आओ शांता जी ने कहा।
जी मालकिन …!!और वो छोटा डिब्बा..!! .. सारे भारी बड़े डिब्बे उठाते हुए अलग रखे डिब्बे को देख रामू पूछ बैठा ।
ये लो.. ये लाई बताशा का डिब्बा सुमी के घर के लिए है.. उनका स्टैंडर्ड इसी लायक है हमारे और काजू कतली के लायक नहीं !!दर्प पूर्ण हंसी के साथ शांता जी ने डिब्बा रामू की ओर बढ़ाया।
आंटी जी …..!!आवाज सुनते ही शांता जी पीछे पलटी।
अरे सुमी … तुम!!अंदर आओ ये हाथ में क्या छुपा रही हो शांता जी सुमी को देख अचकचा गईं।
आंटीजी मां ने खोवे के लड्डू बनाए हैं आपके लिए भिजवाए हैं हाथ से बने सुंदर सफेद क्रोशिया कवर से ढंकी बड़ी सी प्लेट आगे बढ़ाते हुए बहुत शालीनता से सुमी कह रही थी और शांता जी हाथ में पकड़े लाई बताशा के डिब्बे में लिपटी अपनी मानसिकता छिपाती शर्मिंदगी महसूस कर रहीं थीं।
लतिका श्रीवास्तव
व्यवहार – रश्मि प्रकाश
“ कहाँ था ना बहू कांता से अच्छे से बात किया करो.. वो हमारे घर में काम करती है इसका मतलब ये तो नहीं उसकी कोई इज़्ज़त नहीं…तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है ये जानते हुए ही उसने तुम्हारी मदद की तुम्हारे बिखरे कमरे और अलमारी की सफ़ाई में पर तुमने कितने गंदे तरीक़े से उसे परे धकेल दिया और आज देखो तुम्हारे पैरों में दर्द जानकर तेल मालिश करने चली आई आज उसके छुअन से तुम्हें बुरा नहीं लगा अपितु आराम महसूस हुआ इसलिए तुम चुप रह गई ।”सुनंदा जी की बात सुन मानसी शर्मिंदगी से नज़रें झुका ली
“ अब से मैं कांता से अच्छे से बात करूँगी मम्मी जी जब वो हमारे घर में काम करती है हमारी तकलीफ़ समझती है तो मुझे उससे अच्छा व्यवहार करना चाहिए ।” मानसी की बातों में शर्मिंदगी दिख रही थी जिसे सुनंदा जी ने तो नोटिस किया है दरवाज़े के बाहर खड़ी कांता का भी हृदय गदगद हो गया
रश्मि प्रकाश
# शर्मिंदगी
शर्मिंदगी – मंजू ओमर
निर्मला की बेटी की शादी थी आज और सभी की नजरें निर्मला के पति जीवन को ढूंढ रही थी ।बारात दरवाजे पर लग चुकी थी जयमाल का समय हो रहा था लेकिन जीवन का कोई पता नहीं था। तभी लड़खड़ाते कदमों से जीवन ने स्टेज पर चढ़ने की कोशिश की । निर्मला जी पास जाकर धीरे से कहा अरे आज तो न पीते बेटी की शादी है आज रोज तो पीते ही हो ,क्या सोचेंगे बेटी के ससुराल वाले । सबके सामने निर्मला को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई । लेकिन पीने वाले कोई मौका नहीं छोड़ते क्या किया जाए ।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
1नवंबर
#शर्मिंदगी – संगीता अग्रवाल
” ये क्या कर रही हो तुम नितिका चलो घर !” सौरभ नितिका का हाथ खींचता शर्मिंदगी से बोला।
” सौरभ कोई काम छोटा या बड़ा नही होता तुम्हारी नौकरी चली गई तुम छोटी मोटी नौकरी करना नही चाहते तो मुझे ही कुछ करना होगा ना इसमे शर्मिंदगी कैसी वो तो भीख मांगने मे है ना मैं तो ये मोमबत्ती , फूल , दिये आदि ही तो बेच रही हूँ दिवाली पर इनकी डिमांड कितनी होती है !” नितिका बोली ।
सौरभ कुछ बोलने की जगह निकिता का हाथ बंटाने लगा क्योकि वो समझ गया काम करने मे कैसी शर्म।
संगीता अग्रवाल
फिजूलखर्ची – रूचिका राय
दीपावली के दिन काम वाली ने कहा मालकिन सौ रुपया दे दीजिए पगार में से काट लीजिएगा,मेरा बच्चा बीमार है
रमा ने झल्लाते हुए कहा तुझे आज ही एडवांस चाहिए मेरे पास नही है
तभी रमा का बेटा 2000 रुपये के पटाखे लेकर आया।
और बोला मम्मी मैंने तुम्हारे पर्स से 2000 रुपए ले लिए थे।
रमा ने अपनी काम वाली को देखा और शर्मिंदगी से नजरें चुरा लीं, ईलाज के लिए पैसे देने से इनकार कर रही थी और बेटा पैसा उड़ा रहा था।
रूचिका राय
सीवान बिहार
वो मेरी माँ हैं – विभा गुप्ता
रत्ना जी के बेटे ने अपनी पसंद की लड़की स्नेहा से विवाह कर लिया तो उन्हें बहुत गुस्सा आया।वो बात-बात पर स्नेहा के कामों में गलतियाँ निकालती और दूसरे की बहुओं से उसकी तुलना करती।परन्तु स्नेहा ने कभी उन्हें पलटकर जवाब नहीं दिया।
एक दिन रत्ना जी की अनुपस्थिति में उनकी रिश्ते की बहन रेवती आ गई।वो स्नेहा के बहुत प्रसन्न हुईं और बोलीं,” तुम इतनी सेवा करती हो, फिर भी रत्ना जीजी तुम्हारी इतनी बुराई करतीं हैं..तुम्हें अपमानित करतीं हैं। उन्हें ऐसा नहीं…।”
” बस मौसी जी…वो मेरी माँ हैं और उन्हें मुझे कुछ भी कहने का अधिकार है।आप कृपया उनके बारे में कुछ गलत न कहे।” बाहर से आती हुई रत्ना जी ने रेवती और स्नेहा की बातें सुनी तो बहुत शर्मिंदा हुईं। स्नेहा से माफ़ी माँगते हुए वो बोलीं ,” तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारी माँ ने तुम्हें अच्छे संस्कार दिये हैं।” कहते हुए उन्होंने स्नेहा को अपने गले से लगा लिया।
विभा गुप्ता
# शर्मिंदगी स्वरचित , बैंगलुरु