तेरा मेरा सपना – अभिलाषा कक्कड़

विवाह के सत्रह वर्ष बीत जाने के बाद भी सुमन और संतोष का आंगन बच्चों की किलकारियों से सूना ही था……

बहुत झाड़ फूंक ओझा बाबा सबको दिखा कर हार चुके थे और हैसियत से ज्यादा रूपया भी पानी की तरह बहा चुके थे।

दूर की रिश्ते की काकी ने उसे एक टोटका और कुछ उपाय करने को बताया,वह सब भी करके देख लिया गया निराशा और हताशा दोनों ही बुरी तरह से घेर चुकी थी।

संतोष अंधविश्वास से बुरी तरह से घिरा हुआ था….. औलाद की चाह में वो पुरी तरह टूट चुका था । सुमन चुपचाप पति को भटका हुआ देख रही थी.. मगर ख़ामोश थी । वो सच मानने के लिए तैयार नहीं था । उसकी ख़ुद्दारी उसका स्वाभिमान इस बात को अपनाने के लिए तैयार नहीं था कि कहीं कुछ कमी उसमें भी हो सकती है । सुमन अपनी माँ के घर गई तो एक अच्छी महिला चिकित्सक से अपनी जाँच करवाई तो पता चला कि उसके शरीर में गर्भ को धारण करने के लिए सभी सम्भावनाएँ मौजूद हैं । अब बारी उसके पति की थी जिसे सुनने भर से ही भारी तकलीफ़ थी तो डाक्टर तक ले जाना तो उसे नामुमकिन था ।

 उसका यह मानना था कि जिस परिवार से वह सम्बन्ध रखता वहाँ कभी मर्द की तरफ़ से ऐसी समस्या नहीं आई । उसके दोनों बड़े भाई शादी के साल भर बाद पिता के सुख से परिपूर्ण हुए तो फिर वो कही ओर से थोड़ा आया है । उसकी रगो में भी वही ख़ून दौड़ रहा है । पति पत्नी की इस बात को लेकर जब भी बात उठी तो संतोष ने यह सब कह कर सुमन को चुप करा दिया । सुमन बस ईश्वर से प्रार्थना करती थी कि हे ईश्वर किसी तरह इनकी सोईं हुई बुद्धि को जगा ,और देखो नवरात्रि का समय अष्टमी का पावन दिन…सुमन काम वाली की मदद से कई आसपास के घरों से छोटी बच्चियों को न्योता दे आई । संतोष भी कन्या पूजन की रस्म में पत्नी के साथ पुरी तरह आ खड़ा हुआ । सभी बच्चियाँ क़तार में बैठी है ।

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 तभी दरवाज़े की घंटी बजी तो सामने एक महाशय नन्ही सी गुड़िया को गोद में लिए खड़े हैं । अन्दर आते ही बोले … अरे जनाब आपकी श्रीमती हमारी बिटिया को तो भूल ही गई । संतोष ने बड़े आदर से उस महाशय को अन्दर बिठाया । उनकी नन्ही सी बेटी का पाँव धोकर अभिनन्दन किया । धीरे-धीरे सभी कजंक खा पी कर घर चली गई । सुमन चाय बना लाई । उस महाशय ने अपना नाम सौरभ बताया और बताया कि वो एक इंजीनियर है । अब वो अपनी निजी ज़िंदगी की बातें करने लगे ।

 बातों बातों में उन्होंने बताया कि उन्हें शादी के दस साल बाद सन्तान का सुख मिला । पहले कुछ वर्ष तो वो बच्चे से दूर भागते रहे और जब परिवार बनाने की अभिलाषा जागी तो बच्चा जैसे आने को तैयार नहीं । अजी पूछो मत क्या क्या हमने पापड़ बेले हैं । पंडित ज्योतिष टोटके झाड़फूंक सब किया । कई डाक्टरों से भी परामर्श किया लेकिन हर कोई बस यही कह रहा था कि सब ठीक है । आख़िर एक बहुत ही अच्छी डाक्टर साहिबा मिली है । जो कि किसी वक़्त हमारी सहपाठी थी । 

उसने हमारी समस्या को गंभीरता से लिया और बताया कि मुझे थोड़े से इलाज की ज़रूरत है । बस क्या था हमने अपनी कमी को सही करवाया और ईश्वर के आगे ढेर सारी प्रार्थना की तो देखो सुन्दर परिणाम हमारी नन्ही सी कली जो आपकी गोद में बैठकर सुन रही है सारी बात… थोड़ी देर में वो महाशय तो चले गये । जाते जाते संतोष के दिलो दिमाग़ को भी झँझोड़ गये । वो सोचने लगा एक अजनबी जो पहली बार हमारे घर आया और कितनी सादगी से अपनी कमी को भी बता गया । और  एक वो है जो ख़ुद को पकड़ कर बैठा है .. क्या मैं अपने बच्चे के लिए इतना भी नहीं कर सकता कि जाकर पता करूँ कि कहीं मुझमें ही कोई कमी तो नहीं । सुमन पति के चेहरे के बदलते रंगों को पढ़ रही थी । 

भागकर सौरभ के पीछे गई उस डाक्टर का पता लिया । संतोष को ही इलाज की ज़रूरत थी ऐसा डाक्टर ने जाँच करके बताया । इलाज के कुछ महीनों के बाद जब सुमन का खट्टा खाने का मन किया तो पति पत्नी दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे । नौ महीने बाद नन्हे से कन्हैया ने उनकी ज़िंदगी ख़ुशियों से भर दी । देवी माँ के दर्शनों के लिए अपने बेटे के साथ इस बार वो नवरात्रि पर वैष्णोदेवी पहुँचे और माँ के चरणों में माथा टेक धन्यवाद किया

स्वरचित रचना

अभिलाषा कक्कड़

 

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