तानाबाना – लतिका श्रीवास्तव : Moral Stories in Hindi

सोच सोच कर प्रमुदित हो जाती थी मैं … बस अब जल्दी से बेटे की भी शादी कर दूं फिर मेरी जिम्मेदारियां खत्म हो जाएंगी ….वह दिन भी आया और खूब धूमधाम उत्साह से बेटे पृथु की शादी हो गई बहू प्रीति भी जैसा नाम वैसा स्वभाव। निश्चिन्त थी मैं अब ।बेटे की जॉब दिल्ली में थी शादी के तुरंत बाद मैने बिना समय गंवाए बहू को उसके साथ भेज दिया ।अब मुझ पर कोई जिम्मेदारी नहीं है अपना और अपने श्रीमान जी का ख्याल मजे से रख लूंगी मर्जी की जिंदगी चलेगी।

सच में जिम्मेदारियां इंसान को ठीक ढंग से जीना भी सिखाती हैं और सही तरीके से निभा नहीं पाने की स्थिति में बोझ सदृष्य होकर मरना भी सिखा देती हैं।

……बचपन से ही ये जिम्मेदारी का ताना बाना मेरे चारों तरफ बुना जाता रहा ।मां पिता जी की जिम्मेदारियां पूरी करना ही मेरी जिम्मेदारी बनती चली गई।जब स्कूल पढ़ने जाती थी तब मां हमेशा कहती रहती थी रोज स्कूल जाया कर अच्छे से पढ़ाई कर ले अच्छा रिजल्ट लाना ही तेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।मैं पढ़ती गई अच्छा रिजल्ट लाती गई।

थोड़ी और बड़ी हुई तो मां कहने लगीं घर के काम काज भी सीख ले सिर्फ पढ़ाई काम नहीं आएगी घर की जिम्मेदारी भी समझनी पड़ती है।मैं समझदार हो गई पढ़ाई के साथ घर की भी जिम्मेदारी संभालने लगी।कॉलेज के बाद पापा कहने लगे अब तुझे अच्छी सी नौकरी मिल जाए तो हमारी जिम्मेदारी खत्म हो।नौकरी मिलने के बाद मैं खुश थी अब तो मां पिता जी की मेरे प्रति जिम्मेदारी खत्म हो गई अब ये वाक्य मुझे नहीं सुनना पड़ेगा।

लेकिन थोड़े ही दिनों में मां फिर कहने लगी अब तेरी शादी करना ही हम लोगो की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बच गई है ।बेटी का घर बस जाए बस इतना ही चाहिए।

मां पिता जी तो हाथ पैर धोकर मेरे पीछे ही पड़ गए जैसे अभी तक  मैने जो कुछ भी किया सब निरर्थक है अब तो केवल मेरी शादी ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।नौकरी भी मजे से करने को तरस गई।मां पिताजी की जिम्मेदारी पूरी करना मेरी ही जिम्मेदारी बन गया था।

खैर मेरी शादी भी हो गई बढ़िया घर और वर दोनों पाकर मां पिता जी निहाल थे और उन्हें खुश देख मैं भी खुश थी कि अब तो ये जिम्मेदारी से मुक्त हो ही गए।

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थोड़े ही सालों बाद मां की चिंता फिर शुरू हो गई अब छोटे से पृथु के साथ जॉब और घर दोनों जिम्मेदारी कैसे कर पाएगी । जॉब से ज्यादा जरूरी बेटे की परवरिश है उनकी चिंता महसूस करती मैं जॉब छोड़ कर बेटे के पालन पोषण में जुट गई सबको निपुणता से संभाल मैने उन्हें चिंता मुक्त कर दिया लेकिन अपने सिर ढेरों जिम्मेदारियां ओढ़ती चली गई।पतिदेव की पृथु की अनगिनत जवाबदारियां मेरी ही तो थीं।

मां पिता के जाने के बाद मेरी जिम्मेदारियां समझने समझाने वाला कोई नहीं था शायद इसीलिए मैं और भी जिम्मेदार हो गई।

लेकिन अब बेटे की शादी और फिर एक साल के अंदर ही पोते की किलकारियां सुन मैं पूर्ण सुकून और खुद को जिम्मेदारी से मुक्त समझने लग गई थी।

मुझे थोड़ी फुर्सत में देख पुरानी हॉबी गार्डेनिंग मुझ पर हावी होने लगी और मैंने उसी में अपना मन लगा लिया था थोड़े ही महीनों में मेरे घर के सामने बहुत ही सुंदर गार्डन दिखाई देने लगा ।आज पतिदेव से मैने ढेर सारे अलग अलग आकार के गमले मंगवाए थे जिनमें विविध पौधे लगा कर मैं घर के अंदर सजाना चाहती थी … तभी मोबाइल बज उठा पृथु का फोन था।

“मां एक बात कहना चाह रहा था उसकी सकुचाती आवाज से मैं आश्चर्य में पड़ गई ।

क्या हुआ बेटा इतना संकोच मुझसे क्यों कर रहा है बता क्या बात है !!

वो मां आप हमारे साथ यहां दिल्ली आकर रहो ना बेहद नर्म लहजे में कहा गया उसका यह वाक्य मेरे कानों को बेहद गर्म प्रतीत हुआ।

दिल्ली आकर!! मैं परेशान हो उठी क्यों बेटा अब यहां मेरी जिंदगी सही ढर्रे से चल रही है मैं उस अजनबी शहर में आकर क्या करूंगी फिर अब तो प्रीति भी तेरे साथ है..!!

लीजिए आप प्रीती से ही बात कर लीजिए झट से उसने फोन प्रीति को पकड़ा दिया।

मां आप आ जाओ ना यहां थोड़े दिनों के लिए आ जाओ ये छोटा पुरु मुझे बहुत तंग करता है जॉब के साथ इतनी सारी जिम्मेदारी अकेले मुझसे संभाली नहीं जा रही है ….

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प्रीति सुन अब ये सब तुम दोनों की जिम्मेदारियां है मिलकर ही संभालना पड़ेगा मैने भी संभाली थीं … जॉब क्या पुरु से ज्यादा जरूरी है तुम्हारे लिए …अब इस उम्र में मुझसे कोई उम्मीद नहीं रखो मैने उसकी बात बीच में ही काटते हुए फोन रख दिया था।

दिल में एक तूफान सा मचल रहा था।

प्रीति को तो डपट कर मना कर दिया लेकिन खुद से उलझ गई थी। मैंने अपनी जिम्मेदारियां किस तरह निभाईं थीं वो कठिन दौर वो जॉब छोड़ना सब कुछ चलचित्र की भांति मेरी आंखों के सामने आने लगा था।

जब मैने निभा ली तो ये लोग भी निभा सकते हैं अब मैं इनकी भी जिम्मेदारी क्यों उठाऊं !! मैंने तनिक रोष से अपने पति मेहुल से कहा तो वे हंसने लगे।

अरे पृथु की मां एक मां की जिम्मेदारियां कभी खत्म नहीं होतीं क्या तुम अभी तक अपने जॉब छोड़ने का अफसोस त्याग पाई हो ..अब तुम्हारी बहू को तुम्हारी जरूरत है…. ये भी तुम्हारी ही तो जिम्मेदारी है इससे तुम मुंह मोड नहीं सकतीं.. चलो दिल्ली चलने की तैयारी कर लो सहज स्वर में कह उठे।

और ये पौधे…. उनके हाथ में पकड़े विविध पौधों और उनके रोपण के लिए  तैयार गमलों की ओर इशारा करते हुए मैने धीमा प्रतिरोध करना चाहा।

क्या ये पौधे तुम्हारे नन्हें पौधे के समान पुरु से ज्यादा जरूरी है नीलिमा ..!! मेहुल के प्रति प्रश्न ने मेरी सारी व्याकुलताओं  और उभरते प्रतिरोध का जवाब देते हुए विराम चिन्ह लगा दिया था।

सही कहा आपने मेहुल एक जिम्मेदार मां की #जिम्मेदारियां कभी खत्म नहीं होतीं…. ट्रेन में बैठते हुए मैंने कहा तो मेहुल हंस पड़े .. हां और होनी भी नहीं चाहिए नीलिमा यही तो जिंदगी की आत्मा है..!!

जिम्मेदारियां कभी खत्म नहीं होतीं #वाक्य प्रतियोगिता

लतिका श्रीवास्तव

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