स्वार्थ ने अंधा कर दिया, – सुषमा यादव

एक गांव बड़ा प्यारा। उसमें एक आलिशान घर बना था, वहां के प्रतिष्ठित श्री लाल जी का,,वे म. प्र. के एक बड़े शहर में प्रिंसिपल थे। उनके दो बेटे राहुल और रमेश थे, और एक बेटी रंजना,, बेटी की शादी बड़ी धूमधाम से एक परिवार में हुई थी, परिवार तो कोई खास नहीं था,पर लड़का  डाक्टर था, देखने, सुनने में अच्छा,,

लाल जी के दोनों बेटे  दिल्ली में थे, बड़ा बेटा इंजीनियर था, उसके सुंदर सी पत्नी मीरा और एक बेटा और एक बेटी है। इन्हीं के साथ छोटा बेटा भी बचपन से ही रहता था।

कालांतर में लाल जी रिटायर्ड हो गये,, गांव में आकर रहने लगे,, उनके साथ उनकी पत्नी थीं। पिता और मां को अकेले देखकर बेटी भी अक्सर वहीं आकर रहने लगी, और वहीं शिक्षिका बन गई।

अब धीरे धीरे दामाद जी और उनके दो बेटे और एक बेटी पूरा परिवार ही रहने लगा।

लालजी के बेटे कभी कभी तीज़ त्योहार पर आते, और दीदी जीजाजी को मां, पिता जी, खेत खलिहान, बाग़ बगीचों की देखभाल करते खुश हो जाते,,

एक दिन लाल जी खूब बीमार हो गए,, अपने बेटों को बुलाने के लिए बार बार बेटी दामाद से कहते, पर उन्होंने कहा,, पापा जी, वो नहीं आ रहें हैं, उन्हें अवकाश नहीं मिल रहा है,,मां तो पढ़ी लिखी नही थी,सो इलाज कराने के लिए पासबुक, चेकबुक उनके हवाले कर दिया,

बार बार पिता जी से हस्ताक्षर करवा कर पैसे निकाल लेते,,

बेटी दामाद बहुत चालाक निकले,, उनसे अपने नाम प्रापर्टी करने पर जोर डालने लगे,पर पिता जी सब समझ चुके थे, नानुकर करते एक दिन वो सदा के लिए सो गए।

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बेटों को बुलाया गया,, अंतिम संस्कार करने के बाद वो सब वापस लौट गए।

अब पूरे घर बार के दीदी जीजाजी मालिक बन गये।  इन सबसे बेखबर बड़े भाई ने अपने छोटे भाई की शादी गांव में ही एक प्यारी सी लड़की निशा से कर दी।  वहीं गांव में कुछ दिन रहने के कारण उन्हें गांव वालों से अपने दीदी जीजाजी के चालाकियों के बारे में पता चला,, उनके कान खड़े हो गए,, और उन्होंने उनसे कहा,कि अब आप सब अपने घर चले जाईए,निशा और रमेश यहां रहेंगे,सब संभालेंगे, बहुत कहने पर भी वो लोग नहीं गये और लड़ाई झगड़े पर उतारू हो गए,



आखिरकार बड़ी भाभी ने उनका सामान बाहर फेंक दिया और उन्हें जाने पर मजबूर कर दिया।

अब गांव में मां के साथ छोटा बेटा और बहू रहते थे,, धीरे धीरे दीदी जीजाजी ने उसको अपने भैया भाभी के विरुद्ध भड़काना शुरू किया, और उसे अपने विश्वास में ले लिया।

रमेश ने अपने भैया भाभी से खेत और घर का बंटवारा करने को कहा,,वो दोनों गांव आये, बहुत समझाया,पर रमेश अपनी जिद पर अड़ा रहा,, बड़ा भाई तो समझ रहा था, ये सब दीदी जीजाजी की करतूत है,, आखिर वो बाद में आने को कहकर अपनी पत्नी को छोड़ कर शहर चला गया।

एक दिन रमेश और उसकी पत्नी में झगड़ा हुआ और रमेश ने उसको मार दिया,, रमेश की पत्नी ने बिस्तर पकड़ लिया,, रमेश अपने जीजा जी के घर गया जो ज्यादा दूर नहीं रहते थे, उनसे पत्नी के बुखार की दवा मांगी,, जीजाजी का दिमाग़ काम करने लगा, उन्होंने अंदर जाकर उसे दवा पकड़ा दिया और कहा शाम को दे देना, और देखो, वो तुमसे नाराज़ है ना, तो अपनी भाभी से दिलवा देना,, जी अच्छा,

शाम को भाभी ने पुचकार कर अपनी देवरानी को दवा पिला दी । थोड़ी देर में ही उसकी हालत बिगड़ने लगी और सुबह चार बजे तक वो ख़तम हो गई,, रमेश ने जीजा को फोन किया वो आये, मायके खबर की गई,, मां पिता तो थे नहीं,भाई बदहवास हालत में भागे पर आनन फानन में दाह संस्कार कर दिया गया था।

भाई बहुत बिगड़े और पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई, पुलिस आई,

पूंछताछ में पता चला कि जीजाजी ने दवाई दी थी।

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कमरे में सब गये, पूछा, किसने दिया था दवा, कौन सी है दिखाओ। बताया, भाभी ने दिया था, ये दवाई तो नहीं दी थी मैंने, जीजाजी ने उस दवा को देखते हुए कहा,, रमेश ने उनकी तरफ चौंक कर देखा तो चुपके से उसका हाथ दबा दिया, वो चुप हो गया,,



भाभी ने कहा, नहीं, रमेश ने मुझे यही दवा पिलाने को दी थी, मैं सच कह रहीं हूं,, कमरे में इधर उधर देखते हुए जीजाजी बोल पड़े, ये दवा मैंने दिया था,है ना रमेश,, रमेश भी कुछ कुछ समझते हुए बोला,, हां, हां यही दवा दिया था मुझे,,

भाभी के बार बार कहने और रोने बिलखने का किसी पर असर नहीं हुआ और पुलिस ने ज़हर देने के जुर्म में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।।

जीजाजी ने रमेश को खूब सिखाया पढ़ाया,,देखो,अब तुम सब जायदाद के मालिक बन जावोगे,अब तुम्हारे भैया किस मुंह से यहां आयेंगे, गांव वाले उन्हें

ताने मार मारकर उनका जीना दुश्वार कर देंगे। और तुम अकेले नहीं हो,हम सब साथ हैं।

रमेश घबराते हुए बोला,, जीजाजी आप दीदी को लेकर यहां रहने आ जाईए,मन ही मन खुश होते हुए वो बोले,, हां हां बिल्कुल,हम सब संभाल लेंगे। और तुम्हारी छोटी सी पांच महीने की बच्ची भी तो है, उसे तुम्हारी दीदी देख लेंगी। आखिरकार उनकी चाल कामयाब हो गई।

बड़े भाई को जब ख़बर लगी तो वो भागते हुए आया और हाईकोर्ट में अपील कर दिया,,केस चला, पूछताछ में रमेश दोषी पाया गया और उसे जेल हो गई। पर उसने अपने जीजा जी के खिलाफ कुछ नहीं कहा,,

अपने लालच और स्वार्थपरता के कारण सब कुछ बर्बाद हो गया,,लाल जी की प्रतिष्ठा तार तार हो गई,, रमेश निर्दोष होते हुए भी अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर जेल चला गया,, और एक मासूम बच्ची बिना मां के हो गई,,

लालच और स्वार्थ में अंधे हो कर जीजा इतना भयंकर बदला लेंगे, उन्हें घर से बाहर निकालने के कारण इतनी नीचता पर उतर आएंगे, ये सपने में भी उन दोनों ने नहीं सोचा होगा।

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आज़ बरसों बीत जाने पर भी किसी को बड़े भाई और भाभी के बारे में कुछ भी नहीं पता है, कि वो कहां है,किस हाल में हैं।

जीजाजी अपनी कुत्सित चाल में सफल हो गए, फिर से आकर आसन जमा लिया,पर उस बेचारी

रमेश की पत्नी का क्या कसूर था,जो उनकी लालच और स्वार्थ परता की बलि का बकरा बन गई।

क्या इस तरह स्वार्थ में अंधे हो कर रिश्ते हैवान बन जाते हैं????

सुषमा यादव, प्रतापगढ़ उ, प्र,

 

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