सुपर हीरो का खिताब चाहिए तो… – डॉ बीना कुण्डलिया : Moral Stories in Hindi

आज सुमित सुबह जल्दी उठ गया वीकेंड था वैसे तो, और दिन तो वीकेंड पर देर तक सोता भला हफ्ते भर की थकावट उतारने का दिन जो होता ये.. उसने जल्दी जल्दी दो कप चाय बनाई उसको लेकर बेडरूम में पहुँचा । पत्नी सुलेखा बस उठ ही रही थी पति सुमित को हाथ में चाय की ट्रे लिए आता देख पहले तो आश्चर्य चकित हुए बिना नहीं रही, कुछ कहती मगर सुमित ने अनदेखा किया और  एक कप चाय सुलेखा की ओर बढ़ा दी..

सुप्रभात.  मैडम.. कहते हुए दूसरे कप से खुद चाय पीते हुए चुस्कियां लेते लेते सामने कुर्सी पर जमकर बैठ गया । 

मन अन्दर से बलियों उछल रहा आज तो पत्नी खुश हो जायेगी उसकी बनाई चाय पीकर… देखना सुपर हीरो का खिताब दे ही देगी ।

मगर ये क्या…?  सुलेखा ने जैसे ही चाय का एक घूंट भरा …थू. थू. थू ये चाय बनाई तुमने , क्या बकवास चाय…? 

अरे यार.. ढंग से चीनी पत्ती तो डाल देते, पत्ती तो लग रहा डाली ही नही और चीनी इतनी की चाय कहां शर्बत लग रहा..!

सुमित को बहुत क्रोध आता है। मन ही मन सोचता.… एक तो सुबह सुबह उठकर चाय बनाई ऊपर से दस नखरे मैडम के, महिने भर से राग अलाप रही घर में कुछ काम में हैल्प कर दिया करो, निकम्मे हो पूरे निकम्मे… घर की तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं देते मैं भी थक जाती हूँ घर में खटकते- खटकने रोज की एक ही दिनचर्या….

और जब मैंने आज चाय बनाई तो भलाई तो दूर बुराई ही सुननी को मिल रही। अरे भई अपनी हालत को कहा जाकर बखान करें हम जैसे मर्द …कुछ करो तो मुसीबत ना करों तो भी मुसीबत…रहना दुश्वार हो गया इस घर में..यार फंस गया मैं तो, इससे अच्छा तो मैं शादी ही नहीं करता, कुंवारा ही भला था।कम से कम अपनी इच्छा से जी रहा था । सारा दिन यार दोस्तों के साथ क्या दिन थे वो भी …आह हा हा अनेक बार तो लगता वापस उसी दुनिया में चला जाऊं…. अब तो खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे…

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 कुछ पल अपने उस दोस्त के बारे में सोचने लगा…. जिसने ये आइडिया दिया था बेवकूफ कहीं का ये रमेश भी… , इन दोस्तों से भी ना अपनी ख़ुशी देखी नहीं जाती वैसे अब गलती तो मेरी भी है ही, मुझे उससे पत्नी को खुश करने की राय लेनी ही नहीं चाहिये थी.. बड़ा आया बीबी का गुलाम सारा दिन उसकी ही खिदमत करता फिरता नाश्ता भी बना कर आता सुबह. अरे बनाने दो…

मुझे क्या.. ? आॕफिस भी तो लेट पहुँचता निकालेगा बास एक दिन बाहर तब पता चलेगा गुलाम को, करता रहना फिर जी भर गुलामी…रमेश को जी भर कोसने के बाद..

और ये मेरी बीबी की सहेलियां ये क्या कम है..? 

अपने पतियों को गुलाम बना कर रखती है सारी की सारी एक जैसी कोई तो ढंग की होती इस सुलेखा पर भी उन्हीं का प्रभाव पड़ रहा है अब खरबूजे को देख खरबूजा तो बदलेगा ही ।

अपना घर देखें मेरी बीबी को भी सिखा पढ़ा आग लगाने में तुली है मेरे घर में, हाँ नहीं तो …मिल जायें जरा एक बार… देखना कैसा मजा चखाता हूँ ? पर फायदा क्या…? तमाशा थोड़े करना उसे उसे घर में। आफ्त थोड़े न मोल लेनी बैठे बिठाए सुलेखा की प्रिय सहेलियों की उसके सामने बुराई करके..

 अपनी तो हालत ऐसी समझ नहीं आता किधर जाये एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाईं।

तभी पत्नी सुलेखा की आवाज सुनकर चौंका अरे कहां खो गये पता नहीं कहां खो जाते हैं ।

   अरे कहां खोऊंगा….? सोचा तो की खरी सी सुना दे.. पत्नी को आज, फिर कुछ सोचकर लहजे में नम्रता ला बोला –

सोच रहा आज पहली बार चाय बनाई सो अच्छी नहीं बनी देखना कल से परफेक्ट बनाऊंगा। हकीकत में सुमित, छुट्टी का दिन अपना मन खराब करने के पक्ष में नहीं था। सो बात आगे बढाने में भलाई नहीं लगी और सुलेखा के आगे हथियार डाल दिए ।

चलो ऐसा करता हूँ…आज नाश्ता बना देता हूँ वो क्या कहते तुम्हारी फेवरेट आलू की सब्जी और  पूरी।

 सुलेखा ने बुरा सा मुँह बनाया….

 ये क्या सुबह- सुबह मूड खराब करने पर तुले हो वज़न नहीं बढ़वाना मैंने आलू खाकर, वैसे भी आज से डाइटिंग की सोच रही हूँ।

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अरे यार अपनी मत चलाओ…हर बार अपनी चलाती हो..आज मेरी बात मान भी जाओ कल से कर लेना डाइटिंग आज तुम्हारी शिकायत दूर कर देता हूँ नाश्ता बना लेता हूँ । सुमित आज सुपर हीरो का खिताब ले ही लेना चाहता था ।

तभी सुलेखा झल्ला कर बोली क्या कहां…? मैं अपनी चलाती हूँ.. 

तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे ऐसा बोलने की ।

तुमको आलू पूरी खानी तो बनाओं जाकर,खाओ रोका किसने है।

 और सुलेखा उठकर वाशरूम की तरफ चली गई।

अब तो घर का माहौल खराब होता देख सुमित खुद को ही कोसने लगा पता नहीं मुझे भी क्या आफत सी आ गई जो मदद करने की चाह में ओखल में ही सर दे डाला । राय मांगे तो बुरा न मांगे तो भी बुरा अब तो उसके पास उस पल को कोसने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा…पत्नी की जली कटी सुन लेने में ही भलाई समझी कोई फायदा ही नहीं है कहकर कि गलती उसकी है…वो कौन सा मान ही लेगी..? शायद सुखी दाम्पत्य जीवन का यही आधार है।

और हाँ उसने याद किया उसकी माँ जब जिंदा थी वो कहती थी “बेटा.. जैसा मर्द होगा वैसे ही उसको औरत भी मिलेगी…इसलिए कभी भी औरत में सीता तलाश करने से पहले…खुद राम बनकर दिखाना “ ।

अभी सुमित इसी उधेड़बुन में तभी सुरेखा वाशरूम से फ्रेश होकर बहार आ गई.. बोली कौन सी सब्जी खाओगे..? 

मैं जल्दी से बना लेती हूँ आज रात खाने पर मेरी कुछ सहेलियां आने वाली है मुझे तैयारी भी करनी हम सबको साथ बैठकर किसी विषय में बात करनी है ‌।

ठीक है शाही पनीर बना दो । बहुत दिन से खाया भी नहीं।

एक घन्टे बाद सुरेखा खाने की प्लेट लिए हाजिर हुई लौकी की सब्जी, रोटी, सलाद ।

सुमित बोला ़… यार सुलेखा तुमको यही बनाना था तो पूछा क्यों था मुझसे क्या बनाना है..?

 अरे पूछा ही था , पूछना फर्ज था मेरा सो पूछ लिया।

 ये तो नहीं कहा था तुम्हारी बात मान भी जाऊंगी। 

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अरे समझा करो यार तुम आज अभी हल्का फुल्का खा लेते हैं शाम को थोड़ा बहार से भी मंगवाया तो ज्यादा हैवी ना हो जाये।

सुमित चुपचाप खाना खा लेता है वही लौकी..बेमन से ।अब कर भी क्या सकता है? करा भी क्या जाये..? जी तो कर रहा डस्टबिन में फेंक आये चूपचाप जाकर..मगर सुरेखा की निगाहें बराबर पीछा करती नजर आई उसे ।

वो तो इस रसोई के मामले में राय दे तो बुरा ना दे तो निकम्मा…उसकी खुद की इच्छा थी वो उसकी परेशानियों को समझे । इसलिए उसने सोचा इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता भला …? चुपचाप खालो… पत्नी को खुश करने का मौका गंवाना नहीं चाहता था । पत्नी पर हावी होने की कोशिश बेकार ही है।

देर शाम सुरेखा की सहेलियों का झुंड घर में प्रवेश करता है।कहकहे चहलकदमी खिलखिलाहट ठहाकों के दौर का सिलसिला चालू….

 बहुत कुछ बनाया सुरेखा ने एक दो बार सुमित ने मदद के लिए कहा भी और की भी…जैसे लाओ सब्जी काट देता हूँ कटलेट के लिए और फुर्ती से सब्जी काट भी दी…. सुरेखा ने कटी सब्जियां देखी…बोली हे भगवान ये क्या सब्जी काट डाली..? जरा आलू का साइज देखो और गाजर, मशरूम, गोभी इतनी बारीक आलू गलने तक तो चटनी ही बन जानी है। काम बढ़ा कर रख दिया।

सब सुनकर बेचारे सुमित के पास उन पलों को कोसने के सिवाय ओर कोई चारा ही नहीं रह गया था ‌जब उसने मदद करने की गुहार की और अपनी तरफ से काफी कुछ मदद कर भी दी थी अन्दर से सुरेखा भी जानती ही थी काफी मदद मिली उसे जैसे मसाले पीसना, चटनी बनाना, भूनना धोना छानना आदि ।मगर ये बात अलग है हर काम में नुक्स निकालना नही भूली वो ।

सहेलियां चटकारे लेकर खाती रहीं और तारिफों के पुल बांधती रहीं… उन्होंने सुमित को भी साथ बैठने खाने को आमंत्रित किया। हां हां क्यों नहीं सुमित बोला..? 

मै तो सुबह से ऑफिस का काम ही करने में लगा हूँ बहुत थक गया हूंँ कमरे में बैठे- बैठे 

बेचारी सुरेखा खुद ही लगी है दिनभर से, मैं तो चाहकर भी कुछ मदद नहीं कर पाया पता नहीं बेचारी सुरेखा भी क्या सोचती होगी….? ऐसा कहकर सुरेखा की तरफ देखा । 

अपनी तारीफ सुनकर सुरेखा के चेहरे पर जो मुस्कान नजर आई मानों सुमित को लगा उसे सुपर हीरो का खिताब से सम्मानित कर रही हो ,वो तो उस मुस्कान पर ही निहाल हो गया.. 

सुमित ने कसम खा ली अब आगे से वो काम में मदद करे या ना करे मस्का जरूर लगा दिया करेगा ।

वैसे भी आत्मविश्वास भी तो कितना बढ़ जाता जब कोई तारीफ करता है….? 

अपनी आलोचना में सच और तारीफ में झूठ ढूंढना ये दोनों ही बड़ी समझदारी के लक्षण है…आलोचना से हमारा अहंकार आहत होता और तारीफ तो झूठी भी हो तो कितनी अच्छी लगती है..!!

पत्नी की खूबियों और उसके प्रति प्यार व्यक्त करने में बुराई ही क्या है…? 

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और फिर उसमें जाता ही क्या है उसका..? 

ऐसा करके यदि पत्नी को लगता पति उसकी कद्र करता है,उसकी भावनाओं को समझता सुनता है ….!!

 हाँ, सही रहेगा मस्का लगाना जी हजूरी करना…वो भी उसकी सहेलियों रिश्तेदारों अपने दोस्तों के आगे। बस उसको ईमानदारी रखनी है उसके प्रति और वैसे भी उसकी प्रशंसा सच्ची ही है क्या बुराई है इसमें…? नहीं- नहीं कोई बुराई नहीं उसका मन खुद ही प्रश्न खुद ही उतार देने को तत्पर अपने को बड़ा ही सन्तुष्ट महसूस कर रहा था। 

पत्नी उसके आगे खुद को छोटा कमतर महसूस न करे…उसकी यही कोशिश रहेगी….आज से वो यही साबित करेगा सुरेखा पढ़ी लिखी सुघड़ है फूहड़ नहीं मेहनती हैं आराम तलब नहीं…उसका सम्मान, समर्थन सामर्थ्य खासियतों की चर्चा कर महसूस करवाता रहेगा वह ….

“वैसे भी अपनापन , परवाह,आदर, समय ये ही वो दौलत है जो हमारे अपने हम से चाहते हैं “…और वो सबके प्रति बड़ा लापरवाह रहा है।

“ किसी की तारीफ करने के लिए जिगर चाहिए..बुराई तो बिना हुनर के किसी की भी की जा सकती है “… 

और उसके पास वो हुनर है ही….यसऽऽ मैंने फार्मूला हासिल कर ही लिया उसने खुद का कन्धा थपथपाया हौले-हौले मुस्कुराया।

 अब तो वह पत्नी को विश्वास दिलाता रहेगा वो उसे सम्पूर्ण रूप से स्वीकार करता है और बदले में उसे सुपर हीरो का खिताब मिलना तो तय ही है।।

  दोस्तों इसमें मेरी थोड़ा हटकर अलग लिखने की कोशिश रही है आपकी दिल खोलकर प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं ।

  लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया 

  1. 4 .25

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