” वकील साहब, आप कल 11 बजे आकर सभी कागज़ात पर मुझसे दस्तख़त करवा लीजिए, इस काम में मैं और देर करना नहीं चाहती।” अपनी बात पूरी करके मानसी फ़ोन रख ही रही थी दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, ” लेकिन मैडम, इसमें आपने अपने बड़े बेटे को तो कुछ भी नहीं दिया है।” “ये सोचना आपका काम नहीं है।” उसने तीखे स्वर में जवाब दिया और फ़ोन पटक दिया।
अगले दिन जब वकील साहब कागज़ात लेकर आये तो मानसी ने उन्हें बैठक कक्ष में बिठाते हुए ‘एक मिनट में आती हूँ ‘ कहकर अपने बेटे मुदित को बुलाने उसके कमरे की ओर चली गई।
दरवाज़ा बंद देखकर उसने खटखटाना चाहा लेकिन कमरे के अंदर से बड़े बेटे अजित की आवाज़ सुनकर वह रुक गई।अजित कहा रहा था,” छोटे , हमें बड़ों के मामले में दखल नहीं करना चाहिए।आखिर वो हमारी माँ हैं।उन्हें जिंदगी का अनुभव है, सही-गलत को बहुत अच्छी तरह से समझती हैं।तुम बेवजह ही परेशान….।” ” आपकी तो सौतेली माँ हैं ना भाई, तभी तो पिताजी की सम्पत्ति से आपको बेदखल कर रहीं हैं।” भाई की बात को काटते हुए धीमे स्वर में मुदित बोला।” “नहीं-नहीं छोटे,ऐसा नहीं कहते।माँ कभी सगी-सौतेली नहीं होती है।वो तो सिर्फ़ ममता की वर्षा करने वाली माँ होती है।तुझे तो याद भी न होगा छोटे, बचपन में मेरे बीमार पड़ने पर माँ घंटों मेरे सिरहाने बैठे रहती थीं।दिन-रात अपने कृष्ण-कन्हैया से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करती रहतीं थीं।पिताजी के लाख मना करने के बावज़ूद वो मेरी रोटियों में मक्खन चुपड़ देती थीं।अब आज अगर कुछ नहीं भी देती हैं तो क्या हुआ, उनसे मिली ममता की दौलत बहुत है मेरे लिये।वैसे भी छोटे, मेरी सबसे बड़ी दौलत तो तू और माँ है।यही तो मेरी दुनिया….।” इसके आगे उससे सुना नहीं गया।
अनजाने में वह कितनी बड़ी भूल करने जा रही थी।वह कैसे भूल गई कि वह सिर्फ़ माँ है और माँ कभी अपने बच्चों का बुरा नहीं करती।हे भगवान! आपको लख-लख धन्यवाद, मुझे पाप करने से बचा लिया।मन ही मन उसने ईश्वर को हाथ जोड़कर धन्यवाद दिया और बैठक में बैठे वकील साहब को एक नई वसीयत बनाने को कहा जिसमें लिखा हो कि पूरी जायदाद दोनों भाईयों में बराबर से बाँट दिया गया है।
– विभा गुप्ता, बैंगलुरु
यह लघुकथा सभी माताओं को समर्पित है।