मान्या घर के काम खत्म कर बैठी थी कि मोबाइल बज उठा। देखा बड़ी बहन महिका का कॉल था। “हाँ दीदी, कैसी हो बड़े दिनों बाद कॉल की…”मान्या ने खुशी से चहकते हुये बोला।
“अरे मैंने नहीं किया तो तूने कौन सा फोन कर लिया, हमेशा मैं ही फोन करती हूँ “महिका थोड़े नाराजगी वाले स्वर में बोली।
“प्यारी दी, तुम तो जानती हो,बच्चों के साथ सासु माँ को भी मुझे ही देखना पड़ता, फिर तुम तो अपनी ही हो, चाहें तुम कॉल करो या मैं, बस बात हो जानी चाहिये, नहीं तो जहाँ संवाद मौन हुआ वहीं रिश्ते खामोश हो जाते हैं,”मान्या ने महिका को अपनी व्यस्तता बता दी। फिर सब कुछ भुला कर दोनों बहनें गप्पे मारने लगीं, मायके का जिक्र होते ही महिका बोली “सुन, शिखर अपनी बेटी सुहाना का एडमिशन कराने दिल्ली गया है “।
“क्या भैया यहाँ आये हैं, मुझे तो बताया नहीं “पहले खुश फिर मायूस होते मान्या बोली।
“अब मैंने तो भाई से कहा था, मान्या के घर रुकना उससे मिलना भी हो जायेगा और तुम्हें भी घर की सुविधा मिलेगी, कम से कम होटल में खर्च होने वाला पैसा भी बच जायेगा “महिका बोली।
“पर दी भैया और भाभी ने एक बार भी कॉल नहीं किया ना कोई सूचना दी, ऐसी क्या बात हो गई जो वो हमलोगों से मिलना नहीं चाहते “मान्या थोड़ी अनमनी हो कर बोली।
“मानू, तू नाराज मत हो, शेखर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, तुम भी जानती हो, मैंने जब शिखर से कहा था तब तनु बोली थी -दीदी, आप और मानू दोनों ही मान्य हैं घर के,फिर मान्या छोटी है, खाली हाथ कैसे जाऊँगी उनके घर “।
” मैंने समझाया भी, तनु तुम परेशान मत हो हर दिन एक से नहीं रहते, वैसे भी जब तुम्हारे पास था तुम करती थी आज नहीं है, फिर भी तुम करने की भावना रखती हो, मुझे और मान्या को इसकी समझ है, इसलिये तुम नि:संकोच हो कर मान्या के घर रुको, पर लगता है तनु को बात समझ में नहीं आई “। महिका ने मान्या से कहा।
इस कहानी को भी पढ़ें:
पैसे कमाती नहीं तो क्या.. पैसे बचाती तो है… – सविता गोयल : Moral Stories in Hindi
मान्या का मन उचट गया था थोड़ा बात कर फोन रख दी। मन उदास हो गया उसका, मान्या का मायका बहुत संपन्न था। जब भाई शिखर का बिजनेस भी उठान पर था सब अच्छा चल रहा था महिका और मान्या दो बहनें और दो भाई सोहम और शिखर यानि चार भाई -बहन थे। सोहम सबसे बड़ा था। पढ़ाई करने विदेश गया तो वहीं का हो गया। साथ पढ़ने वाली भारतीय लड़की से शादी कर वहीं सेटल हो गया, हाँ यहाँ भाई -बहनों और माता -पिता से पूर्णतया कट गया।
बड़े पुत्र के इस तरह अलग हो जाने से माता -पिता को बहुत धक्का लगा पर कहते हैं ना भगवान एक हाथ से कुछ छीनता है तो दूसरे हाथ से कुछ देता भी है। शिखर ने माता -पिता के पास रह कर उन्हें संभाला, उनको विश्वास दिलाया कि उनको छोड़ कर कहीं नहीं जायेगा। वहीं अपना बिजनेस शुरु किया जो
सब कि दुआओं से अच्छा चल रहा था। माँ की पसंद की लड़की तनु के साथ शादी कर खुशी से रह रहा था।तभी अकस्मात पहले पिता की फिर माँ की मृत्यु हो गई।तब सोहम एक हफ्ते के लिये आया था फिर वापस चला गया।शिखर- तनु ने महिका और मान्या को कभी माता -पिता की कमी नहीं महसूस होने दी।
पर उम्र बढ़ने के साथ भाई -बहन अपनी गृहस्थी में व्यस्त होने लगे, अब साल दो साल में मिलना होता था। बहुत कुछ बदलने लगा..। शिखर को बिजनेस में घाटा हुआ, बिजनेस बंद करना पड़ा। जो सेविंग्स थीं उन्हीं से काम चल रहा था। मान्या इधर जब से पोता हुआ तीन साल से मायके नहीं जा पाई।
फोन पर ही सब से बातचीत हो जाती थी। भाई का बिजनेस ठप हो गया ये जानकारी उसको थी पर स्थिति इतनी कमजोर हो गई कि एक भाई को बहन के यहाँ जाने के लिये सोचना पड़ रहा, ये पीड़ा देह स्थिति थी।
शाम सब घर लौटे तो पति संदीप ने मान्या को उदास देख,कारण पूछा, पहले तो मान्या ने नहीं बताया, फिर ज्यादा जोर देने पर बिलख पड़ी.. क्या सिर्फ लेन -देन से रिश्ता बनता है।आज एक भाई सिर्फ इसलिये बहन से कतरा रहा क्योंकि वो बहन को उपहार नहीं दे सकता। लेन -देन इतना प्रभावी हो गया कि स्नेह का बंधन ढीला पड़ गया। “
“देखो मान्या, रिश्ता आपसी विश्वास और प्रेम से चलता है, रिश्तों में समझदारी होनी चाहिये, रूढ़ियाँ नहीं, रूढ़ियों को तोड़ना है, तो क्यों ना पहल हम कर ले “संदीप ने मान्या के आँसू पोंछते हुये कहा।
आश्चर्य से मान्या बोली “मैं समझी नहीं “
“देखो मान्या, वो यहाँ आने में झिझक रहे तो क्यों ना हम लोग उनसे मिलने चलते हैं, उन्हें विश्वास दिलाते हैं रिश्ते में उपहारों का लेन -देन नहीं बल्कि स्नेह का लेन -देन होना चाहिये, पैसा महत्वपूर्ण नहीं है,मुझे यकींन है शिखर भाई समझ जायेंगे “संदीप ने समझाया।
इस कहानी को भी पढ़ें:
अगले दिन मान्या और संदीप उस होटल पहुँच गये जहाँ शिखर रुका हुआ था। मान्या को देखते ही शिखर की आँखों में आँसू आ गये। दोनों भाई -बहन का मिलन देख सबकी आँखों में आँसू आ गये।
“भैया ये कैसे सोच लिया की बहन के घर बिना उपहार के नहीं जा सकते हो, प्यार का जो उपहार आप मुझे और महिका को देते हो, वो बहुत अमूल्य है, उसकी कीमत हम अदा नहीं कर सकते। माँ -पापा के बाद हम बहनों का मायका आपने और तनु भाभी ने बना रखा है यही हमारा सबसे बड़ा उपहार है, अब सामान उठाओ और घर चलो “मान्या ने कहा।
“ओके हमारे घर की कमांडर, अभी आपके आदेश का पालन करते हैं “शिखर ने मान्या की नाक पकड़ते कहा।सब खिलखिला पड़े।मान्या ने फोन कर महिका को भी बुलवा लिया, एक हफ्ते मान्या के घर में खूब मस्ती हुई, फिर सब, साथ बिताये मधुर स्मृतियों का उपहार ले अपने घर लौट गये।
दोस्तों, परिस्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती, मान्या और संदीप ने समझदारी से काम ले अपने दूर जाते रिश्तों को समेट लिया। रूढ़ियों को तोडना तब जरुरी हो जाता जब वे रिश्तों को दूर करने लगती। रूढ़ियाँ या परंपरा वही अच्छी जिससे किसी को परेशानी ना हो, जो संबंधों को खोखला ना करें। आप सब क्या कहती हो, अपने विचार मुझे जरूर बतायें।
….. संगीता त्रिपाठी